स्त्री और वैकल्पिक विकास - women and alternative development

स्त्री और वैकल्पिक विकास - women and alternative development


भूमंडलीकरण का दावा है कि उसने स्त्रियों की चहुँमुखी विकास की ओर उन्मुख किया है। निश्चित तौर पर बाज़ार के बढ़ते प्रसार ने स्त्री के लिए पहले की अपेक्षा रोज़गार के अनेकानेक अवसर मुहरय्या करवाए हैं। लेकिन यदि स्त्री दृष्टि से इस विकास का विश्लेषण किया जाए तो हमें निम्ननिखित बिंदुओं पर विचार करना होगा, जिसमें सबसे पहला बात ता यह है कि क्या बाज़ार और भूमंडलीकृत व्यवस्था स्त्री को पहले से ज्यादा ताकतवर बनाती है या नहीं। आर्थिक विकास के अवसर क्या स्त्री को अनिवार्यतः स्वायत्ता प्रदान करते हैं? क्या स्त्री को जीवन के अन्य क्षेत्रों में स्त्री होने की वजह से सुविधा मिलती है? विकास की प्रक्रिया में, जहाँ तक फाक्टरी मालिकों और व्यवस्थापकों की भूमिका का प्रश्न है, वे चाहते हैं कि कामगारों में आपसी भेदभाव बना रहे, वे समान श्रम के लिए समान पारिश्रमिक या वेतन नहीं देना चाहते। छोटे और बड़े फैक्ट्री मालिक स्त्रियों को सस्ते और झंझट रहित उपलब्ध श्रम के रूप में देखते हैं। स्त्रियाँ यूनियन और संगठन के पचड़ों में नहीं पड़ा चाहती, इसलिए वे मैनेजमेंट के लिए आसान श्रमिक' बनती हैं। श्रमिक आंदोलनों का नेतृत्व अधिकांशत: पुरुषों के हाथ में ही होता है। इसलिए श्रमिक आंदोलनों और नेतृत्व की सोच स्वभावतः पितृसत्तात्मक ( पुरुषवर्चस्ववादी) होती है, ऐसा देखा गया है। ऐसे में, भूमंडलीकरण के इस दौर में भी स्त्री श्रम का दोहन होता है.

कहीं-कहीं विभिन्न मनोसामाजिक कारणों से स्त्रियां स्वयं भी आगे नहं आना चाहतीं। हार्टमैने पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री के शोषण पर टिप्पणी करते हुए लिखा है-पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री कभी अपनी अधीनस्थ स्थिति से मुक्त नहीं होगा। मालिक वर्ग कई कारणों से स्त्री श्रमिकों को नहीं रखना चाहते।" श्रम के क्षेत्र में शिक्षा के कारण स्त्री और पुरुष में भेद किया जाता है। ऐसे कई क्षेत्र जहां खासतौर पर स्त्री-श्रमिकों की ही माँग रहती है जैसे 'कॉल सेंटर या रिसेप्शनिस्ट, एयर होस्टेस आदि की नौकरियाँ इन क्षेत्रों में भी स्त्रियों को समुचित वेतन नहीं दिया जाता, क्योंकि भूमंडलीकरण के इस दौर में आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। ऐसे में महंगा श्रम लागत को बढ़ाता है, जिससे बचने का उपाय है स्त्रियों से सस्ती दर पर श्रम खरीदना।


इस परिस्थिति में हमारे सामने प्रश्न उठता है कि इय स्थिति का विकाल्प क्या है? इन दिनों ग्रामीण केवल कुछ राज्यों में, मसलन आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पंजाब) और शहरी मध्यवर्ग में एक आम राय बनती जा रही है कि स्त्रियों के लिए स्वतंत्र केरियर होना पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को दृढ़ बनाने की दिशा में कारगर हो सकता है।

इसलिए माता-पिता अपने खर्च से, स्वयंसेवी संस्थाओं ओर सरकार के कुछ प्रयासों से अपनी पुत्तियों की शिक्षा-दीक्षा पर पहले की अपक्षा कई गुना अधिक ध्यान दे रहे हैं। इसके दो परिणाम हो रहे हैं:


(1) पितृसत्तात्मक भाव-भूमि कमज़ोर पड़ रही है।


(2) स्त्री का अपने श्रम पर नियंत्रण प्रकारांतर से स्वावलंबन बढ़ रहा है। 


इनमें से सबसे पहले हम पितृसत्तात्मक भावभूमि के कमज़ोर होने को वैकल्पिक विकास से जोड़कर देखें तो पता चलता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी कोई संस्था संगठित रूप में पितृसत्ता को चुनौती नहीं देना चाहती। नौकरशाही, प्रशासन, राजनेता, श्रमिक, यूनियन के कार्यकर्ता और पार्टी के सदस्य पितृसत्तात्मक व्यवस्था कदम-कदम पर इनके स्वार्थों के अनुकूल पड़ती है, ऐसे में मानवधिकार को लेकर बोलने वाले लोग कम हैं और उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह जाती है। कई बार स्त्रियाँ सव्यं भी पितृसत्ता के एजेंट के रूप में कार्य करने लगती हैं। इसलिए समाज में पुत्र जन्म के अवसर पर प्रसन्नता,

दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या जैसी बातें सहज सामान्य हैं, जिनको लेकर कहीं भी किसी को भी कोई आश्चर्य नहीं होता। जहां तक राजनीति का सवाल है, उसमें सबको अपनी-अपनी पड़ी है, किसी भी दल को स्पस्ट बहुमत नहीं मिल पाता। ऐसे में गठजोड़ की सरकारें केंद्र में आती हैं, केंद्र के लिए कठोर फैसले लेना अब पहले की तरह आसान नहीं, क्योंकि सभी दल अपनी राजनीति में लगे रहते हैं। ऐसे में किन्हीं मुद्दो पर ठिक कर बात करना या कुछ मूल्यों के लिए अड़िग रहना उन्हें कई बार विशेष रूप से लाभ कर नहीं लगता। भूमंडलीकरण के व्यापक प्रभाव के कारण सरकार के पास पहले जैसे अधिकार भी नहीं रहे। ऐसी स्थिति में स्त्रियों को अपने विकास के वैकल्पिक कार्यक्रम स्वयं तय करने होंगे, क्योंकि स्त्रियों के हितों के प्रति सरोकार राज्य के लिए लाभ का विषय नहीं हैं, इसलिए ये सरोकार कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं। विकास की तमाम योजनाएँ कागज़ पर बनती बिगड़ती है, व्यावहारिक रूप में उनका लाभा किसी-किस स्त्री को ही मिल पाता है, अधिकांश स्त्रियाँ विकास की योजनाओं से अपरिचित रह जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में स्त्री हित समूहों का संगठनात्मक एवं आंदोलनात्मक रूप ही वैकल्पिक विकास की भूमिका,

प्रस्तावित करने स्त्री हितों की रक्षा करने में सक्षम हो सकता है। स्त्री को अपने उपर संदेह नहीं, बल्कि आत्मविश्वास करना होगा, इसके लिए स्त्रियों को राजनीतिक प्रक्रिया में रुचि लेनी होगी, जहां संभव हो सक्रिय भागीदारी भी करनी होगी। नए दौर में स्त्रीवादी आंदोलन को अमानवीय विकास का विरोध करना होगा। प्रगति के नाम पर विकास की उचित-अनुचित चालों को, पूंजीवादी हथकंडों को समझना-बूझना होगा, उचित-अनुचित का विवेकसम्मत निर्णय करना होगा। कई बार स्त्रियाँ पुरुषसत्ताक व्यवस्था के हथकंडों को समझ नहीं पतीं, चाहे वह कार्यस्थल हो या निजी जीवन वे पुरुष को अपना जीवन सुचारू रूप से चलाने के लिए अनिवार्य मानती हैं। कभी प्रेम तो कभी परूष ‘बॉस' की मातहती उन्हें इतनी रास लाने लगती है कि वे कार्यस्थल या निजी जीवन के निर्णयों का पुरुषों के हवालेकर देती हैं और स्वयं कर्तव्यशील दासियाँ बन जाती हैं। सीमोन द बोउवार ने द सेकेंड सेक्स में कहा है कि स्त्री और पुरुष दो स्वतंत्र सत्ताएँ होती है, दोनों का अंबंध तभी स्वस्थ रूप में चल सकता है, जब वह पारस्परिक ये दोनों में से कोई एक साथ अपनी-अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके सर्वोपरिता की ओर उन्मुख हों। इसके साथ ही स्त्री पुरुष की मुखापेक्षी न रहकर यदि बिना पुरुष को अपकरण बनाए अपने उद्देश्यों, अपनी परियोजनओं की पूर्ति की दिया में निरंतर प्रयत्नशील रहे तो वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल हो सकती हैं। पुरुष अपने अस्तित्व की सीमाओं के अतिक्रमण की क्षमता से सर्वोपरिता की ओर अग्रसर होने के कारण जिस पूर्णता का बोध हासिल करलता है,

वह स्त्री के लिए संभ्जव नहीं, क्यों कि स्त्री को स्वयं को ना की वस्तु बनाए रखना पड़ता है। अतः उसकी चेतना में घटित द्वंद्व हमारी बहस का केंद्रीय विष्य हे आज की स्त्रीपारंपरिक नारी की भूमिका में स्वयं को पंगु नहीं बना देना चाहती, किंतु इससे बाहर जाते ही उसे अपने नारीत्व का उल्लंघन करना पड़ता है। स्त्री भी पुरुष बराबर अपनी पहचान नारीत्व को बनाए रखकर ही हासिल कर सकती है। व्यस्त जिंदगी शुरू करने वालीस्त्री को पुरुष की भाँति सफलता की कोई परंपरा नहीं मिलती, समाज उसे नए अध्यवसायी पुरुषों के बराबर महत्व नहीं देता। उसके साथ यह दुनिया एक नए परिप्रेक्ष्य में पेश आती है। एक स्वतंत्र मानव व्यक्ति की हैसियत से स्त्री होना आज भी विलक्षण समस्याओं से भरा हुआ है।” (पृष्ट 315, द सेकेंड सेक्स, अनुवादः प्रभा खेतान, सं. 1998 हिंद पॉकेट बुक्स) इसी संदर्भ में वे आगे लिखती हैं। यदि स्त्री और पुरुष एक दूसरे को बराबर का साथी समझें, थोड़ा विनय और आदार्य रखें और वे अहमन्यताजनित हार-जीत की प्रवृत्ति का उन्मूलन कर सकें, तो पर-पीड़न या आत्म-पीड़न की प्रवृत्तियों से छुटकारा पा सकते हैं।" ( वही पृ. 326)


जॉन स्टुअर्ट मिल ने 'द सब्जेकशन ऑफ विमेन' में कहा था कि स्त्रियों और पुरुषों के बीचजो विषमताएँ हैं

वे जीवशास्त्रीय हैं, पर दोनों की बौद्धिक और नैतिक समताएँ बराबार हैं-आगे चलकर उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष कर मानसिक और स्वभावगत जो विशेषताएँ हैं वे साझे की होनी चाहिएं पुरुषों में स्त्रियोचित और स्त्रियों में पुरूषोचित गुणों का भी समावेश हो तो व्यक्तित्व आदर्श बनता है और ऐसा न भी तब भी हो, तब भी स्त्रियों को व्यक्तित्व के समुचित विकास के अवसर दिए जाने चाहिए।


जेम्स स्टर्बा ने फेमिनिस्ट जस्टिस एंड फैमिली (261-70) में कहा है कि जब तक स्त्री-पुरुष को विकास के समान अवसर नहीं मिलतेतब तक जान स्टुअर्ट मिल द्वारा प्रस्तुत आदर्श व्यक्तित्व की कल्पना साकार नहीं हो सकती। जेम्स स्टर्बा स्त्री के विकास के कुछ रास्ते सुझाते हैं, मसलन फैक्टरी, दफ्तर, दुकान आदि पर जो स्त्रियां कार्यरत होती हैं, उनके काम के घंटे लचीले होने चाहिएं, ताकि माँ बाप बारी-बारी से बेबी सिटिंग कर सकें ऐसा न हो कि बच्चे की सारी देखभाल सारी माँ के ज़िम्मे हो। स्टैलनी, ग्लोरिया स्टीनेम, सूसन ऐथेनी, लूसीस्टोन, एलिज़ाबेथ हूकर, एलिज़ाबेथ केडी स्टैटन आदि ने स्त्रियों को संपत्ति तथा राजनीतिक समानता के लिए संघर्ष में अति महत्वपूर्ण बौद्धिक भूमिका अदा की और सरकारों को यह समझाने में सफलता पाई कि समाज में किसी भी वर्ग के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा, संपत्ति और मताधिकार का होना ज़रूरी है, जिसके अभाव में न सिर्फ अभाव ग्रस्त वर्ग विशेष,

बल्कि समूचे समाज एवं राष्ट्र के विकासकी अवधारणा खंडित हो जाती है। ऐसी ही स्थिति में ही कोई वर्ग विशेष विद्रोह पर उजारू हो जाता है। शिक्षा एवं विकास के समान अवसरों का अभाव समाज में स्त्री पुरुष विद्वेष के रूप में उभरता देखा गया है। जर्मेन ग्रीयर ने इस संदर्भ में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है कि अगर स्त्रियाँ यह सोचो पाएं कि संस्कृति उनके उसमें पूरी तरह से जुटने पर ही परिपक्व होगी तब शायद वे परिवर्तन और नए विकास की संभावना को लेकर ज़्यादा आशावान हों..." (बधिया स्त्री; जर्मेन ग्रीयर, पू. 19 अनुवाद मधु बी. जोशी, राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण-2005)


स्त्री के विकास के लिए अनिवार्य तत्वों के रूप में स्वयं स्त्री के व्यक्तित्व में कुछ परिवत्रनों और सुधारों की भूमिका को पहचाना जाना ज़रूरी है। मादा-द-स्ताल सामाजिक संस्थाओं से साहित्य के संबंध पर विचार' (1800 ई.) पुस्तक में समाज में स्त्री की स्थिति पर साहित्य के संदर्भों में विचार किया और कहा कि आखिर प्रेम करने की क्षमता के अतिरिक्त स्त्रियों को जीवन के बारे में कोई जानकारी नही होती। स्त्रियों के विकास में प्रेम का अधिक्य ही उनके विकास की राह में बाधक बनता है। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि हद तक पहुँच गए मामलों में यह परपीड़न, तुनकमिज़ाजी और अपराध बोध से पैदा हुई घृणा और जुगुप्सा का रूप ले लेता है और स्त्रियों के शारीरिक शोषण का कारण बनता है।


विकास के नाम पर विद्रोह या पुरुष द्वेष की भूमिका में उतरी स्त्रियाँ कभी-कभी स्वयं भी शोषक की भूमिका जाने-अनजाने ग्रहण कर लेती हैं। हालांकि स्त्रियों पर होने वाली घरेलू हिंसा की तुलना में पुरुषों पर होने वाली घरेलू/सांस्थानिक हिंसा के प्रमाण बहुत आसानी से नहीं मिलते, फिर भी व्यावहारिक जगत में स्त्रियाँ विद्वेष की कार्रवाई करती देखी जा सकती हैं। अक्सर इसमें विकास और समान अवसर के प्रमुख बिंदुओं की जगह व्यक्तिगत राग-द्वेष, बदले की कर्रवाई ही प्रमुख हो जाती है और समाज का पुरुषवर्ग बनाम स्त्री की लड़ाई की सतह पर दिखाई पड़ती है।