स्त्री और विकास- विचार धाराएँ -Women and Development - Thoughts

स्त्री और विकास- विचार धाराएँ -Women and Development - Thoughts


सन 1971 में पहली बार भारत में स्त्रियों की हालत जानने के लिए स्टेटस ऑफ वूमेन नाम कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी की रिपोर्ट में जिन मुद्दों पर ध्यान दिया गया था वे थे: 


(1) आर्थिक और सामाजिक असमानता


(2) सामाजिक संरचना में स्त्री की मातहत स्थिति 


(3) सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवर्तनों का स्त्रियों पर प्रभाव


इस रिपोर्ट में माना गया कि राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए स्त्रियों का बराबरी में योगदान अनिवार्य है।

स्त्रियों को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होना चाहिए, जिसके लिए उन्हें रोज़गार के समुचित अवसर दिए जाने चाहिए। संतान की ज़िम्मेदारी माता-पिता दोनों की होनी चाहिए। घरेलू स्त्रियों के योगदान को भी राष्ट्रीय बचत और विकास के रूप में आंका जाना चाहिए। विधवाओं की स्थिति पर विचार करते हुए इस कमेटी ने बताया कि 1971 की जनगणना में दो करोड़ तीस लाख विधवाएँ थी। विधवाओं की स्थिति और रहन सहन में परिवर्तन महसूस किया गया, लेकिन ऐसी हज़ारों विधवाएँ थी जो परित्यक्ता का जीवन जी रही थी। वे भीख मांगकर या वेश्वावृत्ति करके अपना भरण-पोषण कर रही थी। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि स्त्रियों की दशा सुधारने में हमारा समाज असफल रहा है। तकनीक के विकास ने दहेज की प्रथा को बढ़ाया। स्त्री की नौकरी भी दहेज का हिस्सा बन गई है। नेखनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 1998 की रिपोर्ट में बढ़ती दहेज हत्याओं पर गंभीर टिप्पणी की गई। सन 2000 में जारी यूनिफेम की रिपोर्ट में कहा गया कि “स्त्रियों को यह समझ में आ गया है कि जब तक उनकी अर्थिक स्थिति नहीं सुधरती तब तक उनका विकास नहीं हो सकता, क्योंकि संसार के अधिकांश संसाधनों पर पुरुषों का आधिपत्य है। इसलिए स्त्रियां वित्तीय बाजार में रुचि लेने लगी हैं और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहल को देखा जा सकता है। मार्क्स ने समाज में नारी की स्थिति को सामाजिक प्रगति का सूचकांक माना था।

एंगेल्स ने अपनी पुस्तक परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति' में मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांत का प्रयोग करते हुए प्रसिद्ध नृतत्वशास्त्री लुईस मार्गन की पुस्तक के आधार पर प्रारंभिक कबीलाई समाज से लेकर वर्तमान के परिवार के उदय के पूरे इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने रखी। एंगेल्स ने कहा कि विवाह में पुरुष की श्रेष्ठता उसकी आर्थिक श्रेष्ठता का सीधा परिणाम है। आर्थिक श्रेष्ठता समाप्त हो जाने पर वैवाहिक जीवन में पुरुष की श्रेष्ठता भी समाप्त हो जाएगी।" इस पुस्तक के प्रकाशन से पहले 1845 में एंगेल्स ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था 'इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा (The condition of working class in england) इस पुस्तक में वे जिन निष्कर्षों तक पहुंचे थे, उससे मालूम होता है कि उनपर 1845 तक ऐतिहासिक भौतिकवाद के वैज्ञानिक सिद्धांत ने विशेष प्रभाव नहीं डाला था। इस पुस्तक में स्त्री-कामगारों और श्रमिकों के कठोर श्रम के संदर्भ में उनकी टिप्पणी थी कि इस प्रकार के रोज़गार का पारिवारिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है और स्त्रियों से उनका औरतपन या स्त्रीपन छिन जाता है। बाद में चलकर परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति (1884) में स्त्रियों के रोज़गार को, उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को एक आदर्श स्थिति बताया। उनका कहना था कि परिवार के दायरे में पुरुष बुर्जुआ की भूमिका में होता है तथा स्त्री सर्वहारा एंगेल्स ने लिखा है कि शुरू में जंगली जानवरों को पकड़कर पालतू बनाना और फिर उनका पालन पोषण करना पुरुष का ही काम था। इसलिए वही जानवरों का मालिक होता था और उनके बदले में मिलने वाले तरह-तरह के मालों और दासों का भी।

इसलिए उत्पादन से प्राप्त अतिरिक्त पैदावार पुरुष की संपत्ति होती थी। स्त्री उसके उपभोग में हिस्सा बँटाती थी पर उसके स्वामित्व में उसका कोई भाग नहीं होता था। 'जंगल' योद्धा और शिकारी की घर में प्रमुख स्थान देकर स्त्री को खुद गौण स्थान से ही संतुष्ट रहना था अब 'सीधे-सादे' गड़रिये ने अपनी दौलत के बल पर मुख्य स्थान पर खुद अधिकार कर लिया और स्त्री को गौण स्थिति में धकेल दिया। स्त्री कोई शिकायत नहीं कर सकती थी। पति और पत्नी के बीच संपत्ति का विभाजन परिवार के अंदर के श्रम विभाजन से संचालित होता था । श्रम विभाजन पहले जैसा था, फिर भी अब उसने घर के अंदर के संबंधों को एकदम उलट-पलट दिया, क्याके कि परिवार के बाहर श्रम विभाजन में परिवर्तन आ गया था। जिस कारण से पहले घरमें स्त्री सर्वेसर्वा थी, यानी घरेलू कामकाज तक सीमित रहकर उसी ने अब घर में पुरुषका वर्चस्व सुनिश्चित किया। पुरुष के जीविका कमाने के काम की तुलना में स्त्री के घरेलू काम का महत्व जाता रहा। अब पुरुष का काम सब-कुछ बन गया और स्त्री का काम एक महत्वहीन योगदान मात्र रह गया। "हमें ये स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि जब तक स्त्रियों को सामाजिक उत्पादन के काम से अलग और केवल घर के निजी कामों तक सीमित रखा जाएगा, तब तक स्त्रियों को स्वतंत्रता और पुरुषों के साथ बराबरी का हक पाना असंभव है और असंभव ही रहेगा। स्त्रियों की स्वतंत्रता केवल तभी संभव होती है जब वे बड़े पैमाने पर उत्पादन में भाग लेने में समर्थ होती हैं और जब घरेलू काम उनसे बहुत कम ध्यान देने की माँग करते हैं। यह सब केवल बड़े पैमाने के आधुनिक उद्योग के फलस्वरूप ही संभव हुआ है,

जो न केवल स्त्रियों के लिए बड़ी संख्या में उत्पादन में भाग लेना संभव बनाता है, बल्कि जिसके लिए स्त्रियों को उत्पादन में खींचना जरूरी भी होता है और जिसमें घरेलू कामकाज को भी एक सार्वजनिक उद्यम बना देने की प्रवृत्ति होती है।” (परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पति-एंगेल्स, अनुवाद- नरेश नदीम, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली संस्करण - 2006 पृष्ठ 173)


स्त्रियों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्त्री मुक्ति से जोड़कर देखने की प्रक्रिया में मार्क्स, एंगेल्स आदि विचारकों ने सामाजिक विकास का अत्यंत सुसंगत वैज्ञानिक विश्लेषण किया और सामाजिक उपादन को स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न से जोड़ा। इन्होंने सामाजिक व्यवस्थाओं के इतिहास को विकास के साथ जोड़कर देखने-समझने की पूर्णत: विकसित अवधारणा दी। इससे स्त्री को देखने की एक भिन्न दृष्टि का विकास हुआ, जिसमें वह पुरुष की मातहतया सर्वहारा न रहकर परस्पर एकता और सौमनस्य की भावना से एक नूतन समाज के विकास की ओर उन्मुख थी। बाद में चलकर कई विचारकों ने मार्क्स वादी चिंतन को इस आधार पर खारिज करना आरंभ किया कि यह चिंतन दृष्टि सभी सामाजिक प्रश्नों को मात्र आर्थिक प्रश्न बना देती है।

लेकिन स्त्री-मुक्ति की विचारधारा का मूल आधार मार्क्स की भौतिकवादी विचारधारा ही है- यह आधुनिक समीक्षकों और चिंतकों ने माना। मार्क्सवाद इस समझ पर आधारित है कि मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती, बल्कि उसका अस्तित्व ही उसकी चेतना का मुख्य कारक तत्व होता है, इसलिए मनुष्य की मुक्ति भौतिक और आत्मिक दोनों स्तरों पर उसकी सामाजिक परिस्थितियों से संबंद्ध होती है "मनुष्य अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं पर अपने मनचाहे ढंग से नहीं, अपितु ऐसी परिस्थितियों में बनाते हैं जो उन्हें अतित से प्राप्त और अतीत के द्वारा संप्रेषित होती है और जिनका उन्हें सीधे-सीधे सामना करना पड़ता है” (मार्क्स-एंगेल्स संकलित रचनाएँ, लुई बोनापार्त की अठारहवी ब्रूमेर, भाग-1, प्रगति प्रकाशन, मास्को, पृष्ठ 133 ) यह विचार धारा स्त्री और स्त्री की पारिवारिक स्थिति को, लैंगिक संबंधों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करती है। स्त्री-पुरुष संबंधों की तरह विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज होती है तथा इतिहास के प्रत्येक नए मोड़ पर स्त्री-पुरुष और परिवार के संबंधों के नए रूप सामने आ सकते हैं। साथ ही, उत्पादन की परिस्थिति में परिवर्तन करके ही स्त्र-पुरुष संबंधों में मौलिक परिर्वतन किया जा सकता है। अंतः उत्पादन की उत्कृष्ट परिस्थितियां वे हैं, जिनमें स्त्री-पुरुष समानता हो और यही परिस्थितियां किसी भी सभ्य समाज के विकास के लिए उत्तरदायी होती हैं।


एंगेल्स के विचारों को अगस्त बेबेलकी पुस्तक स्त्री और समाजवाद में अधिक ठोस रुप मिला।

जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए कार्यक्रम तय करने में अगस्त बेबल के अलावा क्लारा जेटकिन, रोज़ा लक्ज़मबर्ग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जो सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी 1890 के दशक के शुरूआती वर्षों में ट्रेड यूनियनों पर ही केंद्रित थी, उसने स्त्रियों के बीच व्यापक राजनीतिक गतिविधियों के विशेष संगठनों के विकास में रुचि दिखाई। इन संगठनों ने राजनीतिक समानता, प्रजनन तथा स्वास्थ्य, श्रमिक स्त्रियों को संरक्षण देनेके लिए कानून बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा तथा स्त्रियों की राजनीतिक शिक्षा जैसे मुद्दों पर कार्य करना शुरू किया। इसी दौरान क्लारा जेटकिंस के संपादन में स्त्री केंद्रित पत्रिका 'इक्वेलिटी' (Gleichheit) का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। समाजवादी विचारों के प्रभाव से जर्मनी ही नहीं, पूरे यूरोप और अमेरिका में स्त्री-मुकित संबंधी विचारों का प्रचार-प्रसार होने लगा। रूस में समाजवादी क्रांति के बाद लेनिन ने तीसरे कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जो विचार व्यक्त किए उन्हें क्लारा जेटकिंस ने 'लेनिन की स्मृतियाँ' शीर्षक पुस्तक में रखा। लेनिन ने स्त्रीयों की मानवीय और सामाजिक परिस्थिति तथा उत्पादन के साधनों की निजी मिल्कियत के बीच अविभाज्य संबंध बल दियातथा स्त्रियों की गुलाम स्थिति को सामाजिक-आर्थिक विकास के बाधक तत्व के रूप में रेखांकित किया और साम्यवाद को स्त्री-आंदोलन और सर्वहारा के वर्ग-संघर्ष से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। लेनिन ने साम्यवादी पार्टी में स्त्रियों को पुरुषों से अलग देखने की दृष्टि से परहेज करते हुए कहा कि “हमारी विचारधारात्मक अवधारणाओं से ही हमारे सांगठनिक विचार उत्पन्न होते हैं। हम कम्युनिस्ट स्त्रियों का कोई पृथक संगठन नहीं चाहते, जो स्त्री कम्युनिस्ट है वह, अन्य कम्युनिस्टों की भाँति ही पार्टी की सदस्य है, उन्हें वही अधिकार तथा कर्तव्य हासिल हैं।"


लेनिन का मानना था कि समाज के समग्र विकास के लिए श्रमिक स्त्रीयों के आंदोलन की आवश्यकता है- स्त्रियों के लाभ के लिए, श्रमिक स्त्रियों, किसान स्त्रियों और यहां तक कि धनी स्त्रियों के लिए भी विशेष मांगे उठाने की जरूरत है।


मार्क्सवाद और समाजवादी विचारधारा ने स्त्री के विकास को समूचे समाज के विकास से जोड़कर देखा और इसके लिए व्यापक जनांदोलन की आवश्यकता पर बल दिया। स्त्री प्रश्न को नए वैश्विक दृष्टिकोण से देखने का सूत्तपात हो चुका था आगे आने वाले वर्षों में पूरे विश्व में स्त्री मुक्ति आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में मेरी बॉल्स्टनक्राफ्ट, विलियम थामपसन, जेम्स मिल तथा जॉन स्टुअर्ट मिल ने स्त्रियों के जनतांत्रिक अधिकारों की माँग उठाई, सदी के अंत तक ब्रिटेन तथा अमेरिका में, उनमें से अधिकांश मांगों को कानूनी तौर पर मान लिया गया। इससे स्त्रियों में शिक्षा की दर बढ़ी और सैद्धांतिक तौर पर स्त्रियों को बौद्धिक स्तर पर पुरुषों के समकथा समझा जाने लगा। आगे चलकर स्त्री-मुक्ति से संबंधित अनेक आंदोलन और वाद प्रकाश में आए, उदाहरण के लिए उग्र स्त्रीवादी विचार धारा ने मार्क्सवादी विचारधारा का विरोध किया।

जहाँ मार्क्सवाद ने माना कि स्त्रियों को पुरुषों के समान विकास के अवसर दे सकता है, सिर्फ आर्थिक परिवर्तन से समाज नहीं बदल सकता और समाजवादी क्रांति कोई क्रांति नहीं, बल्कि पुरुषों द्वारा सत्ता हड़पने का एक और विद्रोह मात्र होगा।' (सिस्टरहुड इज़ पावरफुल, एन एंथोलॉजी ऑफ राइटिंगस फ्रांम द वुमेन्स निबरेशन मूवमेंट सं. आर मार्गन, 1927 पृष्ठ 36) जहां तक स्त्रियों के आर्थिक शोषण का प्रश्न है तो तमाम विकसित और विकासशील देशों में स्त्रियों के साथ भेदभाव बरता जाता है। सिया 1980 की आबादी का आधा हिस्सा है। कुल काम का दो-तिहाई हिस्सा वे करती हैं। लेकिन दुनिया की आमदनी का सिर्फ दसवां हिस्सा उन्हें मिलता है और दुनिया की संपत्ति के सौ वें हिस्से से भी कम संपत्ति स्त्रियों के पास है। दूसरी ओर विश्व बैंक की रिपोर्ट 'जेंडर पावर्टी इन इंडिया' में बाज़ारीकरण के दौर में स्त्रियों की कीमत बढ़ने की संभावनाओं के संकेत दिए बए हैं। समाज में स्त्रियों की स्थिति को देखने के लिए हमें 1901 के भारत में जनगणना आँकड़ों को भी देखना चाहिए जहाँ 1000 पुरुषों के पीछे 997 स्त्रियाँ थी और सन 1999 तक इनका अनुवपात घटकर 900 रह गया। दूसरी ओर भारत में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों पर लागू किया गया आर्थिक उदारीकरण या संरचनात्मक समायोजन में स्त्रियों के विकास के अवसरों पर ध्यान देने की बात की गई है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार सन 2011 तक स्त्रियों को रोज़गार के इतने मौके मिल हैं, जितने पहले कभी नहीं मिले। इसका सिधा सा अर्थ है कि भारतीय स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता अन्य सदियों की तुलना में बेहतर स्थिति में है। ऐसा नहीं है कि आर्थिक उदारीकरण की नीतियां स्त्रियों के पक्ष में है, बल्कि संरचनात्मक समायोजन या स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट में परिवार की आय संकुचित होने के कग़ार पर है, जिसकी पूर्ति के लिए परिवार के पुरुषों के साथ त्रियों को श्रम बाज़ार में खड़ा होना पड रहा है। ग्राम्शी ने ज्ञान के उत्पादन और वितरण की प्रक्रियासे जुड़े हुए प्रत्येक व्यक्तिको बुद्धिजीवी माना था। पूंजीवादी व्यवस्था में बुद्धिजीवीयों का एक ऐसा वर्ग पैदाहोता है जो औद्योगिक और राजनीति शास्त्र का विशेषज्ञ होता हैं, इन्हें पूंजीवादी संस्कृति के प्रबंधन और नूतन कानून-व्यवस्था की जानकारी होती है, जो उपभोक्ता वस्तुओं के बिक्रम और बाज़ार पर नियंत्रण करने और उस नियंत्रण को बनाए रखने में इस्तेमाल की जाती है। लेकिन भूमंडलीकरण के इस दौर में स्त्री की स्थिति, विशेषकर पूंजीवादी बौद्धिक की दृष्टि में क्या है इसे 8 मार्च 1983 को महिला दिवस के अवसर पर दिए एक साक्षात्कार में त्रिवादी चिंतक सीमोन द बोडवार ने व्यक्त किया- "मानव अधिकार उतने विश्वव्यापी नहीं है, जितना उन्हें होना चाहिए और अब भी मानव अधिकारों में महिलाओं के विशेष अधिकारों का विपरण नहीं है। स्त्रियों के शोषण को समाप्त करने की मांग अधिकतर संस्थाएं केवल अनसुनी ही नहीं कर रही, बल्कि स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों की ओर ध्यान भी नहीं देतीं।”