भारतीय संविधान में स्त्रियाँ और उनके अधिकार - Women and their rights in the Indian Constitution
भारतीय संविधान में स्त्रियाँ और उनके अधिकार - Women and their rights in the Indian Constitution
भारत के संविधान का उद्देशिका में कहा गया है, “हम भारत के लोग भारत को एक प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए उसके समस्त नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता दिलाने और उन सब में बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प करते हैं। न्याय की परिभाषा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के रूप में की गई है। स्वतंत्रता में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सम्मिलत हैं और समानता का अर्थ हैं प्रतिष्ठान तथा अवसर की समानता ।" सन 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा समाजवादी' तथा पंथनिरपेक्ष शब्द जोड़े गए।
इस उद्देशिका में भारत के लोगों द्वारा भारत को प्रभुत्व संपन्न पंथ निरपेक्ष', 'समाजवादी' लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की संकल्पना की गई तथा प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय के साथ-ही-साथ सिचार अभिष्ट अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपसना की स्वतंत्रता तथा समानता की प्रत्याभूति देती है। संविधान की इस उद्देशिका में नागरिक' शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसके अंतर्गत स्त्री, पुरुष और वे सारे लोग, जिन्हें भारत सरकार नागरिक' मानती है आते हैं।
दूसरे अर्थों में संविधान के समक्ष स्त्री-पुरुष के बीच कोई विभाजन नहीं है, इसलिए संविधान द्वारा प्रदत्त अपने नागरिकों के लिए समस्त अधिकारों की चर्चा महिलाओं के संदर्भ में करना समीचीन होगा।
संविधान के भाग-3 के अंतर्गत आने वाले मूल अधिकार भाग-4 के निदेशक तत्व और बाद में जोड़े गए भाग 4 (क) के मूल कर्तव्य वास्तविक रूप सो समूची व्यवस्था के हिस्से हैं और इनका मूल स्रोत उद्देशिका है। ये संयुक्त रूप से उद्देशिका में उल्लिखित मूलभूत मूल्यों की अभिव्यक्ति हैं तथा संविधान के आदर्शों को प्रतिष्टित करते हैं। संविधान में दिए गए मूल अधिकारों के जरिए व्यक्ति की गारिमा को सैद्धांतिक रूप दिया गया है तथा भाग-3 और भाग-4 में उल्लिखित उपबंधों के माध्यम से उसे कार्यान्वित कराने के लिए कहा गया है, और व्यक्ति की गारिमा के अनुरूप स्वतंत्रता और समानता पर काफी बल दिया गया है। आर्थिक तथा सामाजिक न्याय के आदर्शों द्वारा उन्हें और अधिक पूर्णता तथा स्थायित्व प्रदान किया गया है तथा और विशद रूप से मूल अधिकारों तथा निदेशक तत्वों में प्रस्तुत किया गया है।
भारतीय संविधान अपने नागरिकों को मोटे तौर पर छह प्रकार के मूल अधिकार की प्रत्याभूमि (गारंटी) करता है:
1. समानता का अधिकार, अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता तथा विधियों का समाना संरक्षण प्रदान करता है तथा अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार किसी पर किसी भी भेदभाव से निषेध का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 16, 17 व 18 लोक नियोजन के मामले में अवसर की समानता, अस्पृश्यता और उपाधियों के अंत प्रावधानित है।
2. स्वतंत्रता का अधिकार, अनुच्छेद 32 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण का अधिकार, अनुच्छेद 21 क शिक्षा का अधिकार और भाषण तथा अभिव्यक्ति, सम्मेलन, संगम या संघ बनाने, भारत के किसी भाग में जाने और निवास करने तथा बस जाने का स्वतंत्रता का अधिकार और कोई पेशा या व्यवसाय करने का अधिकार (अनुच्छेद 19) दिया गया है;
3. शोषण के विरूद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23 तथा 24 सभी प्रकार के बातश्रम, बाल श्रम और मानव दुर्व्यवहार का निषेध करते हैं।
4. अनुच्छेद 25 से 28 अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता।
5. अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि को बनाए रखने तथा अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान करते हैं। 6. अनुच्छेद 32 उपर्युक्त मूल अधिकारों का प्रवर्तित करने के लिए संवैधानिक उपचारों का अधिकार विहित करता है।
ये मूल अधिकार लोगों को अनेक परिसीमाओं तथा प्रतिबंधों के अधीन प्राप्त है, किंतु पश्चिम बंगाल राज्य बनाम सुबोध गोपाल बोस ए.आई.आर. 1954 एससी के मामले में न्यायमूर्ति श्री पतंजली ने कहा कि, · संविधान के भाग-3 का एकमात्र उद्देश्य यह है कि उसमें वर्णित स्वतंत्रताओं तथा उनका अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया जाए ताकि राज्य मनमाने ढंग से उनका से उनका उनका अतिक्रमण न कर सकें।" सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन ए. आई. आर 1978 एससी 1675 तथा अन्य कई मामलों में उच्चतम न्यायालय का विचार उभर कर आया कि मौलिक अधिकार केवल नकारात्मक या राज्य विरुद्ध' नहीं है। वह 'राज्य' के ऊपर कुछ दायित्व भी सौंपते हैं।
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