भारतीय संविधान में स्त्रियाँ और उनके अधिकार - Women and their rights in the Indian Constitution
भारतीय संविधान में स्त्रियाँ और उनके अधिकार - Women and their rights in the Indian Constitution
1. समानता का अधिकार
भारत का प्रत्येक व्यक्ति संवैधानिक रूप से समान समझा जाएगा तथा वह 'विधियों के समान संरक्षण वंचित नहीं किया जाएगा। उसके साथ किसी भी आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। संविधान के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार समानता के अधिकार उपलब्ध हैं।
2. विधि के समक्ष समता तथा विधियों का समान संरक्षण
संविधान के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति भारत के राज्य क्षेत्र में विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जाता है। यह प्रावधान सिर्फ नागरिकों पर ही नहीं, बल्कि सभी व्यक्तियों पर लागू होते हैं। इस प्रावधान का सैद्धांतिक आधार है कि विधि के समक्ष सभी समान है और बिना किसी विभेद के विधि के समान संरक्षण के हकदार हैं।"
3. धर्म मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता और विधियों के संरक्षण को उद्घोषणा करता है, और अनुच्छेद 15 से 18 भारत के नागरिकों के संबंध में सामान्य सिद्धांत को प्रवर्तित करने के लिए कुछ दिशा निर्देशन करते हैं।
अनुच्छेद 15 राज्य को आदेशित करता है कि किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के किसी के आधार पर कोई भेदभाव न बरता जाए। कोई भी नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर (क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश या (ख) पूर्णतया या भागतया राज्य विधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के बारे में किसी भी निर्योग्यता, दायित्व निबंधन या शर्त के अधीन नहीं होगा; यानि वर्जित नहीं किया जा सकेगा। यह प्रावधान राज्य और साधारण जनता पर समान रूप से लागू होता है। परंतु अनुच्छेद 15 (3) और (4) में इन सामान्त सिद्धांतों के अफवाह है कि राज्य को क्रमशः स्त्रियों तथा बच्चों के लिए और सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के कुछ वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार होगा।
4. लोक नियोजन में अवसर की समानता
अनुच्छेद 16(1) और (2) भारत के सभी नागरिकों को राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति या नियोजन के संबंध में समान अवसर उपलब्ध कराए जाने के बारे में प्रावधान करता है, और किसी भी नागरिक के साथ केवल धम्र, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्म-स्थान या निवास के आधार राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के मामले में कोई भेद-भाव नहीं किया जा सकेगा या अपात्र नहीं होगा।
5. अस्पृश्यता का उन्मूलन एवं उपाधियों का अंत
अनुच्छेद 17 और 18 में अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है तथा इसके आचरण को दंडनीय अपराध बनाया गया। अनुच्छेद 18 भारतीय नागरिक या विदेशी राष्ट्रीय दोनों ही स्थितियों में किसी भी व्यक्ति को उपाधियां प्रदान करने का निषेद करता है, किंतु सेना तथा विद्या संबंधी विशिष्ट सम्मान के मामले में या विशिष्ट सराहनीय सेवा के एिल गणतंत्र दिवस को राष्ट्रपति द्वारा भारत रत्न, पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री आदि दिए जाने वो सम्मान इस अनुच्छेद के विपरीत नहीं माने जाएंगे।
6. स्वतंत्रता का अधिकार
संविधान का अनुच्छेद 19 भारत के नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति बिना हथियारों के शांतिपूर्वक सम्मेलन, संगत बनाने, भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत आने-जाने भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने और कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। किंतु ये अधिकार निर्बाध नहीं है। भारत की संप्रभुता तथा अखंडता, राज्य की सुरक्षा विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टा चार या सदाचार के हिमों में या न्यायालय की अवमानना, मानहानि या अपराध के लिए प्रोत्साहन के आधार पर इन अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
अनुच्छेद 20 अपराध के लिए दोषी व्यक्तियों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करता है तथा इन्हें आपात्त स्थितियों के अंतर्गत भी अनुच्छेद 359 के अंतर्गत निलंबित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 20 (1) के अनुसार “किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि किसी उसने ऐसा कार्य करने के समय किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण न किया हो। वह उससे अधिक शास्त्रि का भागी नहीं होगा जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन लगाई जा सकती थी । " इसी दृष्टि से विधानमंडल को भूतलाक्षी दंडिक विधि बनाने से प्रतिषेध है, और इस बात का प्रावधान किया गया है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक 'अभियोजित' और 'दंडित नहीं किया जाएगा। किसी न्यायालयी विचारण के दौरान प्रत्येक व्यक्ति न्यायालय की दृष्टि में निर्दोष माना जाएगा और उसकी दोष सिद्धी का भार अभियोग पक्ष पर होगा।
अनुच्छेद 21 यह व्यवस्थापित करता है कि कोई व्यक्ति विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा अन्य किसी भी तरीके से जीवन या वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। यह अधिकार सभी प्रकार के नागरिकों एवं गैर नागरिक लोगों को प्रदान किए गए हैं।
7 जून, 1993 को डी. के. यादव बनाज जे. एम.ए. इंडट्री लि. के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जीवन के अधिकार में आजीविका के अधिकार को भी शामिल हैं, और अनुच्छेद 21 (क) 6 से 14 वर्ष की आयु वाले बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए कहता है।
अनुच्छेद 22 का प्रावधान किसी भी निरूद्ध व्यक्ति के हक में निरूद्ध व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी से अवगत कराना, वकील से परामर्श करने तथा बचाव कराने की इजाजत देना और उसे निकटतम मॅजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य बनाता है तथा यह प्रावधान आदेशात्मक अपेक्षाएं हैं।
7. शोषण के विरूद्ध और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
राज्य या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति की इच्छा के विरूद्ध उसे कोई कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही किसी को किसी तरह मानव देह का दुरूपयोग करने की इजाजत होगी।
कारखानों या खानों में या अन्य किसी खतरनाक जगह पर कार्य करने से 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्रविरत किया जाएगा।
संविधान की उद्देशिका में पंथनिरपेक्ष गणराज्य की अवधारणा स्थापित की गई है। पंथनिरपेक्ष से तात्पर्य है कि राज्य का कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों को समान सम्मान तथा संरक्षण देगा। धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेद-भाव नहीं होगा तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए धर्म की पूरी स्वतंत्रता की प्रत्याभूमि होगी। अनुच्छेद 25 से 28 के अनुसार धार्मिक मामलों में स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी का उपबंध करते हैं।
8. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार
इसके अंतर्गत, नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है,
उसे बनाए रखने के अधिकार की गारंटी है। किसी भी नागरिक को राज्य द्वारा पोषित या उससे सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्था में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के कारण प्रवा देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
9. संवैधानिक उपचारों का अधिकार
भारतीय संविधान अपने नागरिकों के मूल अधिकार का प्रवधान करता है वहीं इनके व्यक्तिक्रम की के स्थिति में उच्चतम न्यायालय द्वारा मूल अधिकारों को लागू कराने की व्यवस्था भी प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीगण परमादेश, प्रतिषेप, अधिकारपृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी करके मूल अधिकारों के संरक्षण के लिए कह सकता है। इस तरह के अधिकार संसद द्वारा अन्य न्यायालयों को दिए जा सकते हैं। अनुच्छेद 32 इसके लिए पर्याप्त उपबंध करता है। ये उपर्युक्त सारे अनुच्छेद व इनके उपबंध महिला नागरिकों पर भी प्रभावी होते हैं तथा उनके अधिकारों को संरक्षण प्रदान करते हैं।
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