स्त्री आयोग - women commission

स्त्री आयोग - women commission


संयुक्त राष्ट्र संघ के आयोग की 25वीं रिपोर्ट में दुनिया के तमाम देशों से पुरूषों और स्त्रीयों के बीच समानता स्थापित करने, राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की स्त्रीयों के कार्यों की समीक्षा करने, उनकी स्थितियों की आकलन करने, आवश्यक पहल करने और प्राथमिकताओं के सुझाव देने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग या इसी तरह का कोई अन्य निकाय गठित करने की अपील की गई थी। भारत ने उस रिपोर्ट की सिफ़ारिश को स्वीकार करते हुए सन 1971 में समिति बनाई। इस समिति ने 1974 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए स्त्रीयों की मौजूदा स्थिति में सुधार लाने और समर्थ रूप से सुनियोजित ढंग से काम करने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर एक वैधानिक स्वयंशासी आयोग के गठन करने की सिफ़ारिश की।


इस रिपोर्ट के 16 वर्ष बाद सन 1990 में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने प्रस्तावित आयोग की संरचना, कार्यों और अधिकारित के लिए गैर-सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की राय मांगी और मई 1990 में एक प्रस्ताव संसद में लाया गया।

जुलाई 1990 में मानव संसाधन मंत्रालय की पहल पर आहूत एक देश स्तर के राष्ट्रीय सम्मेलन में इस पर सुझाव मांगे गए और अगस्त 1990 में सरकार ने अनेक संशोधन करते हुए आयोग को दीवानी अदालत के अधिकार प्रदान करके प्रस्ताव पारित कर दिया और 30 अगरस्त, 1990 में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से देश के अंदर राष्ट्रीय स्त्री आयोग एक नया निकाय अस्तित्व में आया । इस तरह से एक अध्यक्ष और पाँच सदस्यीय राष्ट्रीय स्त्री आयोग का गठन किया गया। इसका प्रशासनिक कार्य संभालने के लिए एक सदस्य सचिव को भी नामित करती हैं।


यह आयोग की शिकायत एवं परामर्श कक्ष दो प्रमुख इकाईयाँ हैं, जो स्त्रीयों के हितों से संबंधित क़ानूनों की समीक्षा, अत्याचार, उत्पीड़न व अन्य विषयक मामलों में हस्तक्षेप करती हैं। आयोग एनसीडब्ल्यू अधिनियम 1990 के अनुच्छेद-10 के अंतर्गत स्त्री से संबंधित मामलों का स्वतः संज्ञान ले सकता है।


स्त्री आयोग अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्त्रीयों की दक्षता के निर्माण व आय आधारित रोज़गार के जरिए आर्थिक सशक्तिकरण करना, जीवन के हर क्षेत्रों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए वातावरण सृजन करने और प्रशिक्षण के द्वारा राजनीतिक सशक्तिकरण, क़ानूनी सुधार और क़ानूनों का संवेदी रूप में लागू कराकर घर और घर से बाहर स्त्रीयों के विरूद्ध हिंसा तथा भेदभाव की रोकथाम के लिए प्रयास करना हैं।


केंद्र के राष्ट्रीय स्त्री आयोग की तरह ही देश की विभिन्न राज्यों में राज्य स्त्री आयोग का गठन किया है। इनकी स्थापना स्त्रीयों के अधिकारों एवं हितों के संरक्षण एवं निगरानी करने के लिए विधान मंडलों द्वारा पारित अधिनियमों द्वारा किया गया है।