स्त्री विकास - भूमंडलीकरण, तकनीक एवं श्रम - Women Development - Globalization, Technology and Labor

विकास - भूमंडलीकरण, तकनीक एवं श्रम - Women Development - Globalization, Technology and Labor


भूमंडलीकरण की प्रक्रिया हाल के वर्षों में तेजी से बड़ी है। औद्योगिक विकास को गति के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठेके पर कार्य करवाने के प्रचलन और आवश्यकता में आश्चर्यजनक रूप से बृद्धि हुई है। ठेकों की छोटी इकाइयों में स्त्रियों का श्रम-पूरे विश्व में अपेक्षाकृत सस्ता होने के काण- ज्यादा लोकप्रिय हुआ है। लेकिन हाल के दशको में स्त्री-श्रम को आयोजित प्रौद्योगिकी का सामना करना पड़ रहा है। तकनीक के आयात ने उत्पादन और वितरण के परंपरागत तौर तरीकों को बदल डाला है। लेकिन इस तकनीक का स्त्रियों पर जो प्रभाव पड़ रहा है उसे देखनाहो तो श्रीलंका की ट्रेड यूनियन शोधकर्ता रोहिणी समेन का शोध देख सकते हैं। वे लिखतीह हैं- इसमें संदेह नहीं कि नई प्रौद्योगिकी ने स्त्री के लिए नई नौकरियां निर्मित की हैं, विशेषकर कंप्यूटर के क्षेत्र में। यहां पर कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। कंप्यूटर उद्योग में प्रवेश करने वाली स्त्रियाँ आज की स्त्रियाँ हैं, जो अभी-अभी पढ़ लिखकर निकली हैं। ये स्त्रियाँ पारंपरिक उद्योगों से निकली हुई नहीं हैं। दूसरे ये स्त्रियाँ असंगठित कामगार हैं। जबकि मंदी के कारण नौकरी से निकाली गई स्त्रियां यूनियन की संगठित सदस्याएँ हैं, तीसरे नई प्रौद्योगिकी अपने साथ नई समस्याओं को लाती हैं,

जिनका सामना करने के लिए ये अराजनीतिक श्रमिक स्त्रियाँ रोज़गार की असुरक्षा के कारण प्रबंधन को चुनौती देने में असमर्थ होती हैं। बहुतेरी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, कंप्यूटर अर्मिनल पर घंटों बैठे रहने से कमर-पीठ, गर्दन में दर्द, आँखों की कमज़ोरी और स्थूलताजनित रोग आते हैं। इसके लिए कानून ने अलग से कोई प्रावधान नहीं रखा है।"


आँकड़े बताते हैं, कि सन 1975 के बाद भारतीय स्त्री की स्थिति में बहुत परिवर्तन हुआ है। स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए विभिन्न रिपोट्र्स जैसे स्टेटस ऑफ वूमन इन इंडिया, नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान, बलात्कार विरोधी कानून, स्त्री धन पर स्त्री का अधिकार, नेशनल कमीशन ऑफ वूमन इन इंडिया, कई महिला संगठनों का बनना, लेकिन इन सब आयोगों और संगठनों का लाभ जिस वर्ग को मिलता है, वह अधिकतर उच्च वर्ग और मध्यवर्ग से संबंधित स्त्रियां हैं। आम भारतीय स्त्री वह है जो घर का काम करती है, खेती करती है, मुर्गियां और पशु पालती है, मीलों दूर चलकर पानी और जलावन लाती है। इस श्रमशील स्त्री का कहीं कोई जिक्र नहीं है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नीतियों से वह परिचित नहीं। उसके किए हुए श्रम को 'अनुत्पादक श्रम माना जाता है, जबकि एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय स्त्रियों की घरेलू कामों में प्रतिभागिता से सकल राष्ट्रीय आय और बचत में इज़ाफ़ा होता है,

यदि स्त्रियाँ घरेलू काम करना बंद दें तो भरतीय अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी स्त्री की विकास में तो भगीदारी है परंतु उत्पादन के लाभांश से वह वंचित है। संचार तंत्र के लिए श्रमिक स्त्री की कोई उपयोगिता नहीं है, क्योंकि इस स्त्री के पास क्रयशक्ति का अभाव है, वह बाज़ार जा कर अपनी मनपसंद चीज़ खरीदने को स्वतंत्र नहीं है। इसलिए वह विज्ञापनों का लक्ष्य तो है, माध्यम नहीं। दूसरी तरफ, मध्यवर्गीय कामकाजी स्त्रियाँ हैं, जो पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ रोज़गार करती हैं, घर संभालती हैं और बच्चे पालती हैं। इसी स्त्री के लिए सूचना समाज विज्ञापन बताता है।


इस स्त्री की स्थिति श्रमिक स्त्री से कहीं बेहतर है। टेलिविजन घर बैठे उसे सूचना प्रदान करता है। वह इंटरनेट के माध्यम से खरीदारी कर सकती है। एन. आर. एस. सर्वे के अनुसार इन दिनों लोखों की संख्या में स्त्रियाँ अखबार पढ़ रही हैं। टेलिवितन के विज्ञापनों ने स्त्रियों को घूंघट और पर्देसे बाहर निकालने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। वे उसका ड्रेसकोड, बदल रहे हें जो स्त्री के विकास की अनिवार्य शर्त है। मार्क्स से लेकर अधुनातन स्त्रीवादियों का मानना है कि विकास की प्रक्रिया स्त्री के बिना संपूर्ण हो नहीं सकती। स्त्रियों को यदि विकास की प्रक्रिया में शामिल होना है तो उन्हें अपनी दलित-दमित छवि से मुक्ति पानी होगी ।


भूमंडलीकरण, संचार तथा तकनीक के फैलाव से मनोरंजन ने उद्योग का रूप धारण कर लिया है। मनोरंजन उद्योग मे लगभग पच्चीस हजार करोड़ रुपए लगे हुए है और भारत में यह उद्योग प्रतिवर्ष दस से बीस •प्रतिशत की गति से आगे बढ़ रहा है। इस उद्योग में समाज के प्रत्येक वर्ग की स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी है। फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा संगीत, निर्देयान, कैमरा, फ़िल्म पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ रही है। फ़िल्मों में नायक के आगे-पीछे घूमने वाले चरित्रों की अपेक्षा अब अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर स्त्रियों का चित्रण किया जा रहा है। मनोरंजन और विज्ञापन उद्योग में केवल टेलिविजन के प्रवेश से इस मध्यवर्गीय स्त्री के जीवन में गंभीर बदलाव आए। 1990 के बाद इस मध्यवर्गीय घरेलू औरत का जीवन बदन गया। कई ऐसे चरित्र टेलिविजन सामने लेकर आया जो वकील, जासूस, उपभोक्ता और एकिटविट थीं। दर्शक के रूप में बैठी स्त्री के सामने एक नई दुनिया पेश करने का काम कई टेलिविजन चैनलों ने किया। धारावाहिकों में पेश की जो वाली आत्मनिर्भर स्त्रियां वे थीं, जिन्हें उद्योग जगत ने बनाया था। इनके पीछे बलशाली कॉरपोरेट जगत उपस्थित था। ये स्त्रियाँ उद्योग का साध्य भी बनी और साधन भी। इस नए दौर की स्त्री की कुंठा को विज्ञापनों ने सिरे से समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़या। इस दौर में तीन प्रकार के विज्ञापन बढ़ते दीखते हैं जो कामकाजी स्त्री और उसकी ज़रूरतो से संबद्ध थे। (क) स्त्रियों की नितांत निजी आवश्यकताओं से संबंधित विज्ञापन (ख) घरेलू सुविधाएँ और घरेलू उपकण फ्रिज़,

मिक्सी, प्रेशर कुकर आदि के विज्ञापन (ग) परिवार नियोजन के फहड़ विज्ञापनों की जगह शालीन और सुसंस्कृत विज्ञापन। इस तरह टी.वी. विज्ञापन और मनोरंजन जगत ने स्त्री के पारंपरिक चेहरे की जगह विकसित स्त्री का नया चेहरा प्रस्तुत करने में सफलता पाई।


ये तो थी मध्यवर्गीय स्त्री की पहचान, लेकिन विकास की प्रक्रिया में श्रमशील स्त्रियों की सिथति ओर उनके विकास की स्थिति क्या है, इस पर विचार किया जाना ज़रूरी है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है यह श्रमशी स्त्री भारत समेत विश्व के लगभग सभी देशों की सफल राष्ट्रीय आय में इस श्रमिक स्त्री की स्थिति को जानने के लिए इस तथ्य पर ध्यान देना ज़रूरी है कि स्त्री हमेशा पितृसत्ता द्वारा निर्धारित वर्ग जाति और वर्ण के आधार पर पहचानी जाती है। प्राक् औपनिवेशिक काल से ही स्त्री गुलाम रही है, भूमंडलीकरण और प्रौद्योगिकी के दौर में पुरुष की तुलना में उसकी हीनतर स्थिति आकस्मिक नहीं है। भूमंडलीकरण में पूंजीपति के लिए ऐसी स्त्री ज्यादा लाभकारी होती है, जो गाँव-देहात से आई हो और दो वक्त के भोजन के लिए अपरिमित सस्ता श्रम करने के लिए तैयार हो। इसके अतिरिक्त परिवार की ज़िम्मेदारियों से मुक्त एकाकी, परित्यक्ता, विधवा या कुंवारी स्त्री का श्रम प्रबंधन को ज्यादा अनुकूल लगता है, क्योंकि निजीकरण के दौर में मातृत्व अवकाश, शिशु-पालन अवकाश देने का झंझट नहीं रहता।

जहाँ मध्वर्गीय स्त्रियों का एक छोटा तबका प्रौद्योगिकी के इस युग में नित नूतन सुविधाओं से संतुष्ट-स्त्रियों के हैं, वहीं श्रमिक स्त्रियाँ विशेषकर असंगठित क्षेत्र की स्त्रियों के श्रम और शोषण के स्तर बहुआयामी हैं।


निजी क्षेत्रों में स्त्रियों की अधिकांश आबादी गैर-तकनीकी कार्यों में लगी हुई है। वे तकनीक को सीखने में बहुत कम रुचि दिखाती हैं। ऐसे में तकनीक सीख सकने वाले पुरुष उनकी जगह ले लेते हैं। ज्यों ज्यों प्रौद्योगिकी विकसित होती जाती हे त्यों-त्यों स्त्री के सस्ते श्रम की आवश्यकता घटती जाती है, साथ ही निचले स्तर पर कार्य करने वाली स्त्री का श्रम लचीला होता है, क्योंकि आमतौर पर स्त्रियाँ हिंसक नहीं होती, अधिकार डिनने पर नारेबाज़ी ज़रूर कर लें, परंतु प्रबंधन के साथ मारपीट करने, हिंसक होने, गगुटबंदी और दबाव की राजीति अपनाने से बचती हैं, वे अपेक्षाकृत कम भ्रष्टाचारी होती हैं। झमेले में पड़ने की अपेक्षा ये नौकरी बदलना ज़्यादा पसंद करती हैं। दुनिया के कुछ देशों-मसलन चीन में स्त्री और पुरुष श्रम में कोई भेद नहीं है।

चीन के विकास के महत्तवपूर्ण कारकों में से एक स्त्रियों द्वारा किया जानेवाला श्रम है, क्योंकि नई प्रौद्योगिकी को सीखने में वहाँ की स्त्रियाँ हिचकिचाई नहीं। इसके अलावा सरकार ने भी स्त्री और पुरुष में भेदभाव रहित शिक्षा एवं अवसर भी नीति अपनाई। चीन में एक परिवार एक संतान के कानून ने भी लैंगिक समानता में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसी तरह मलेशिया में भी स्त्रियों ने नई प्रौद्योगिकी को सीखने के प्रति रुचि दिखाई, लेकिन श्रीलंका में तकनीकी शिक्षा का स्तर निम्न होने की वजह से स्त्रियों के तकनीकी और प्रौद्योगिकीय ज्ञान के निम्न स्तर को देखा जा सकता है। जहाँ तक भारत का प्रश्न है यहां स्त्रियों के सामने दोहरी समस्या है- पहली समस्या तो यह है कि प्रौद्योगिकी और तकनीकी शिक्षा यहाँ महंगी है, दूसरे स्त्रियों को पुरुष सहकर्मियों के प्रतिरोध का सामनाभी करना पड़ता है। नर्सिंग प्रशिक्षण अध्यापकीय प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में यहां स्त्रियों की भागीदारी ज्यादा है, क्योंकि इन क्षेत्रों को लड़कियों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित समझा जाता है। परिवार में लैंगिक भेदभाव होने के कारण अक्सर मंहगी शिक्षा पाने का अवसर लड़कों को मिलता है। जो लड़कियाँ इंजिनियरिंग, प्रबंधन आदि की शिक्षा प्राप्त कर भी लेती हैं, अक्सर वे पारिवारिक व्यवस्था का अंग बनने के बाद उच्चशिक्षा के लिए नहीं जा पातीं या प्रबंधकीय कौशलों, दूरस्थ ट्रेनिंग कैंपों और किसी अन्य प्रांत या विदेश में प्रतिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए इच्छुक होकर भी नहीं जा पातीं।


विकास के इस दौर में एक और समस्या है वह है श्रम की पहचान की समस्या। जब भी कोई स्त्री श्रम-रत होती है तो स्वभावतः वह श्रम की पहचान भी चाहती है, लेकिन पूंजी वादी सत्ता अपना नियंत्रण श्रम पर रखना चाहती है, ओर पुरूवर्चस्ववादी समूह प्रबंधन पर अपना नियंत्रण रखना चाहते हैं। ट्रेड यूनियनों पर पुरुषों का कब्ज़ा रहता है, वहां सूत्री श्रम की पहचान पिछड़ जाती है या अक्सर उपेक्षित कर दी जाती है। श्रमकी पहचान के लिए चीन की स्त्रियों ने लंबा संघर्ष किया। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जब दूसरे देशों में अपनी प्रशाखाएँ खोलती हैं, तो उनकी शर्त होती है, ऐसे श्रमिक को रोज़गार देना जो विनम्र, सहनशील और नई तकनीकों को सीखने को इच्छुक हो साथ ही अराजनीतिक हो। इसलिए मलेशिया और बांग्लादेश ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में, स्वयं राज्य ने बाज़ार के ऐजेंट की भूमिका निभाई। भारत में स्त्री श्रमिकों की दशा बदतर है, क्योंकि उन्हें राज्य की ओर से न के बराबर संरक्षण मिलता है। जहां तक ट्रेड यूनियनों का प्रश्न है तो उनमें पितृसत्ताक दृष्टिकोण ही प्रभावी है- जो उसी समाज के दृष्टिकोण से परिचालित है जो स्त्री और पुरुष के विभाजन पर टिका है। हार्टमेंन का कहना है- “पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्री कभी अपनी अधीनस्थ स्थिति से मुक्त नहीं हो सकती। धन चाहे कितना भी आ जाए पर वह औरत के लिए नहीं होगा। मालिक वर्ग कई कारणों से स्त्री-श्रमिकों को नहीं रखना चाहते।” शिक्षा के कारण भी स्त्री और पुरुषों में भेद किया जाता है।

जहां भी सूक्ष्म और सटीक काम की ज़रूरत पड़ती है- वहाँ स्त्रियों को रोज़गार दिया जाता है, लेकिन जब श्रमकी पहचान का प्रश्न आता है तब उन्हें कोई विशिष्ट पग़ार नहीं दी जाती। यूनियनों में भी पुरुष वर्चस्व के कारण स्त्री-हितों की बात अनसुनी रह जाती है। स्त्री के सस्ते श्रम से सकल राष्ट्रीय आय में चाहे जितनी बृद्धि हुई हो, स्त्रियों को अधिक सुविधा नहीं मिलती। कई स्त्रियाँ विवाह की आशा में, दहेज इक्ट्ठा करने के उद्धेय से निरंतर श्रम करती हैं। ठीक-ठाक आर्थिक स्थिति होते ही वे कई बार नौकरियाँ छोड़ भी देती हैं विवाह के बाद सिर्फ आर्थिक कठिनाई ही उनके रोज़गार के पीछे प्रेरणा स्रोत का कार्य करती है, दूसरे पुरुष सहयोगियों के सामने विनम्र बने रहकर कार्य करना उनकी विवशता होती है, साथ ही वे ओवर टाइम और रात की पालियों में काम करने से बचती हैं, इसलिए भी उनके श्रम की पहचान की उपेक्षा कर दी जाती है। स्त्री के श्रम की उपेक्षा करना वस्तुत: पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतिफलन है। स्त्री का स्वतंत्र कैरियर आर्थिक आत्मनिर्भरता उसे निर्णयकारी भूमिका प्रदान करती है। स्त्री की आर्थिक निर्भरता पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हितों की पूर्ति करती है। यहाँ पर हमें पितृसत्ता और उसके स्त्री संबंधी दृष्टिकोण का विश्लेषण उचित प्रतीत होता है।


पितृसत्ता- शोषक और शोषित, मालिक और गुलाम, स्वामी और सेवक की अवधारणा पर आधारित है। सत्ता चलाने के लिए व्यवस्था की अर्थात मालिक ओर गुलाम दोनों की आवश्यकता है। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। सत्ता की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए शोषक की उंची हैसियत और शोषित की निम्म हैसियत का होना अनिवार्य है। सत्ता अपने आंतिरक स्वरूप में हीन और कमज़ोर व्यक्ति, जाति, अथवा वर्ग को शासन प्रक्रिया द्वारा शोषित करती है, ताकि सत्ता बनी रहे अर्थात यदि किसी को हीन और विवश न बनाकर उसे सबल बनाया जानेलगे तो सत्ता चरमराने लगती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री और पुरुष दोनों श्रम करते हैं- जिस श्रम से उत्पादन होता है। यह उत्पादन सार्वजनिक और घरेलू दोनों स्तरों पर होता है, लेकिन पितृसत्ता में पुरूष वर्चस्व होने के कारण पुरुष के श्रम को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया जाता है। पुरुष सत्ता विशिष्ट उत्पादन पद्धति को अपनाती है, वह छिटपुट और अमहत्वपूर्ण कार्यों, अनिर्णयकारी कार्यों को स्त्री के खाते में डाल देती है। स्त्रियाँ भी विभिन्न सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक कारणों से बहुत कम क्षेत्रों में ही परिवार और बच्चों के लालन-पालन का समूचा दायित्व कई बार इन्हें उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने और प्रबंधन कौशल के प्रदर्शन में बाधा डालता है। इसलिए चौबीसों घंटे कार्यरत स्त्री चाहे वह कारखाने, उद्योग या किसी संस्थान में हो अथवा घरेलू श्रम में द्वितीय श्रेणी की श्रमिक बनकर ही रह जाती है। यदि समाज उनके श्रम का मूल्यांकन करता भी है तो पुरुष दृष्टि से।

ऐतिहासिक दृष्टि से पितृसत्ता अपने को आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से ज़्यादा मज़बूत बनाने के लिए प्रयास करती आई है, उसने स्त्री जीवन के विभिन्न पक्षों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के यथा संभव प्रयास किए थे प्रयास प्रयास किए थे। इस पृथक जीवन-मूल्यों के निर्माण और प्रचलन में भी देखे जा सकते हैं। स्त्रियों को हमेशा से ऐसी शिक्षा दी गई, जिससे वह स्वयं को पुरुषों की गुलामी के लिए तैयार कर सकें।


स्त्री के दमन और शोषण के लिए पितृसत्ता के व्यवस्था कृतसंकल्प रही है और यह सिर्फ ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि वर्तमान में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्त्रियों को स्थिति के बारे में जाएजा लेने के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल की उस रिपोर्ट को देखा जाना चाहिए जो सन 1995 में बीजिंग के अंतरराष्ट्रीय स्त्री सम्मेलन के अवसर पर प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में स्त्री अधिकारों के लिए संघर्षरत स्त्रियों के अनुभावों का जिक्र किया गया और ह्यूमनराइट्स आर वीमेन्स् राइट्स' शीर्षक पुस्तक का वितरण किया गया, जिससे 15 सूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया-


(1) स्त्रियों के मानव अधिकारों को सर्वव्यापक और अविभाज्य माना जाए।


(2) मानव अधिकारों के सभी अंतरराष्ट्रीय करारों की पुष्टि की जाए तथा उन्हें लागू किया जाए।


(3) स्त्रियों को मानव अधिकारों से वंचित करने के भेदभाव को दूर किया जाए।


(4) सशस्त्र संघज्ञ के दौरान स्त्रियों के मानव अधिकारों को सुरक्षित किया जाए।


(5) सरकारी तंत्र के हाथों स्त्रियों के बलात्कार तथा अन्य उत्पीड़न को बंद किया जाए। 


(6) सरकारी तंत्र द्वारा गैर न्यायिक हत्याओं अथवा लापता करने वाली घटनाओं को रोका जाए तथा पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए।


(7) पारिवारिक संबंधों के कारण स्त्रियों का उत्पीड़न बंद हो।


(8) हिरासत में रखी स्त्रियों के स्वास्थ्य-अधिकारों की रक्षा हो।


(9) राजनैतिक बंदियों को तत्काल और बिना शर्त रिहा किया जा।


(10) सभी राजनैतिक बंदियों के मामलों की शीघ्र और निष्पक्ष सुनवाई हो। 


(11) शरणार्थीयों और विस्थापित स्त्रियों के मानव अधिकारों के उल्लंघन को रोका जाए। 


(12) मृत्यु दंड को खत्म किया जाए।


(13) सरकारी और गैरसरकारी संगठनों द्वारा स्त्रियों के अधिकारों के क्षेत्र में किए जा रहे कामों को समर्थन दिया जाए।


(14) शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से स्त्रियों के अधिकारों को मानव अधिकार मानने के विचार को बढ़ावा दिया जाए।


(15) सशस्त्र राजनैतिक दल भी स्त्रियों के मनव अधिकारों की मर्यादा का पालन करें। जून 1994 के जकार्ता सम्मेलन में भी स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध आवाज़ उठाई गई थी और सभी देशों से आग्रह किया गया था कि वे अपने देश, समाज की परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों और आर्थिक, राजनैतिक स्थितियों के अनुरूप स्त्रियों के हित में अपनी नीतियाँ बनाएं। इसके मूल में इतिहास के विभिन्न मोड़ों पर हुए युद्धों में स्त्रियों के उत्पीड़न और अत्याचार की स्मृतियाँ थीं। विश्वयुद्धों में जर्मनी और रूस की सेनाओं ने हज़ारों स्त्रियों को बलात्कार का शिकार बनाया था। बोस्निया हर्जेगोविना और खाण्डा के युद्धों में भी यह प्रक्रिया जारी रही। यूरोपियनों द्वारा अमेरिका की तथा कथित विजय और स्कॉटलैंड के विरूद्ध इंग्लैंड के विजय अभियान में भी स्त्रियों पर भयानक अत्याचार हुए। प्रथम विश्वयुद्ध में नागरिक आबादी की क्षति 5 प्रतिशत थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध तक 50 प्रतिशत हो गई और 1990 के दशक में 80 प्रतिशत। इनमें से अधिकांश संख्या स्त्रियों और बच्चों की थी। मुज़ाहिदीन कट्टरपंथियों ने कट्टर इस्लामी मूल्य थोपने के लिए शिक्षित और कामकाजी स्त्रियों को विभिन्न अत्याचारों का शिकार बनाया। सिर्फ अफ़गानिस्तान से 1994 के पहले तीन महीनों में लगभग पाँच लाख लोग बाहर भागे, जिनमें अधिकांशतः कामकाजी स्त्रियां थीं।

तज़ाकिस्तान के गृहयुद्ध में छह लाख लोग बेघर हुए, जिनमें अधिकांश संख्या स्त्रियों और बच्चों की थी।


इस नव उपनिवेशी दौर में, जबकि नए राष्ट्र राज्यों का उदय हो रहा है, स्त्री के शोषण और दमन के औजार के रूप में संस्कृतिको इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अंतर्गत स्थायी रूप से हीन भावना से ग्रस्त स्त्री का विकास किया जाता है, जो एक ओर उत्पादन में भागीदारी करे और दूसरी ओर मानसिक रूप से पितृसत्ता के पक्ष में अनुकूलित रहे, ताकि वर्तमान शासन पद्धति जिसके पास मानवीय स्थितियों, जाति, वर्ग अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा आम आदमी के क्रिया कलापों के प्रति सादियों पुराना रवैया है, जिसके बारे में कभी फैनन ने 'रेचेड ऑफ अर्थ' में कहा था- 'यह वही इज़ोरदार पूंजीवादी बुर्जुआ है जो नवउपनिवेधवाद के अधीन साम्राज्यवाद द्वारा विश्व की अर्थिक और राजनीतिक घेराबंदी करने के अभिन्न अंग के रूप में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को बनाए रखने का प्रचारक बन जाता है''- की गुलामी के लिए प्रस्तुत रहे।