स्त्री आरक्षण - women reservation

स्त्री आरक्षण - women reservation


विगत पंचायत चुनावों में चयनित स्त्रीयों ने राजनीतिक भागीदारी की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी, उनकी योग्यता पर संदेह किया जाता रहा है। उनकी सार्वजनिक ज़िम्मेदारी की जगह उन्हें मात्र परिवार चलाने वाली इकाई के रूप में ही देखा जाता रहा है। खासकर परिवार के पुरूषों की ओर से उन्हें समुचित मदद नहीं मिल पाती है। इस प्रकार की सामाजिक रूढ़िबद्ध धारणाएँ स्त्रीयों के सतत रूप में राजनीतिक व सामाजिक जीवन को मुश्किल कर देती हैं। अपनी पत्नियों को सामाजिक और राजनीतिक जीवन में मदद करने वाले पति को जोरू का गुलाम' जैसे विशेषण एक हद तक स्त्रीयों के खिलाफ जाते हैं और स्त्रीयों के पक्ष में पतियों के समर्थन को कमज़ोर करते हैं। बहुत सी स्त्रीयाँ परिवार की ज़िम्मेदारियों व पारिवारिक माँगों के समक्ष अपने सामाजिक व राजनीतिक जीवन का बलिदान कर देती हैं। इसके अलावा यौन शोषण और राजनीतिक अपराधीकरण के चलते स्त्रीयों की सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन में भागीदारी प्रभावित है।


किंतु जहाँ तक स्त्रीयों की योग्यता का सवाल है, आज एक बहस चल रही है कि राजनीति में स्त्रीयों को उनके अपने काम की योग्यता की पहचान के बदले में आरक्षण उसका स्थानापन्न नहीं हो सकता।

ऐसे लोगों को यह ख्याल नहीं है कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष में बड़ी संख्या में बहुत ही योग्य और साहसी स्त्रीयों की भागीदारी देखने को मिली थी, किंतु इसे बड़ी ही सहजता से लोग इसे नज़रअंदाज कर जाते हैं। यहाँ तक कि सन 1952 के लोकसभा के आम चुनाव में 499 की संदस्य संख्या वाली पहली संसद में मात्र स्त्री सदस्यों की संख्या मात्र 22 थी और हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने हमारी माँ-बहनों को उनके शौर्यपूर्ण बलिदान' के लिए उनकी प्रशंसा करते हुए भी राजनीतिक हिस्सेदारी में पर्याप्त अवसर नहीं दिया और इसे अपने शौर्य के खिलाफ-सा माना और आज श्री संगठनात्मक नेतृत्व और चुनाव के समय उम्मीदवारी तय करने की प्रक्रिया एवं हिस्सेदारी में पुरूष एकाधिकार ही कायम रहता है।


स्त्रीयों की योग्यता को एक अन्य उदाहरण के जरिए भी देख सकते हैं। आंध्र प्रदेश में एक जमाने में स्त्रीयों का जबर्दस्त उभार देखा गया, जिसका नेतृत्व पूरी तरह से स्त्रीयाँ कर रही थी। उस आंदोलन में स्त्रीयों की आंदोलन को नियोजित और नेतृत्व करने की क्षमता अभूतपूर्व ढंग से देखी गई थी।

किंतु विधान सभा चुनावों में उन्हें टिकट नहीं दिए गए और न ही स्त्री प्रतिनिधित्व में सुधार के लिए प्रयास किए गए। उन आंदोलनकारी स्त्री कार्यकर्ताओं ने राजनीतिक दलों के प्रति अपने को निष्ठा के साथ जोड़े रखा, किंतु राजनीतिक दलों ने गुणी और योग्य स्त्रीयों को टिकट नहीं दिया। सन 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलनों समेत भ्रष्टाचार विरोधी अन्य आंदोलनों में तथा आपातकाल के खिलाफ आंदोलन में बड़ी संख्या में स्त्रीयों ने शामिल होकर बल प्रदान किया, परंतु चुनाव के समय उन्हें दरकिनार कर दिया। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में अनेक मामलों में स्त्रीयों को बहादुराना भूमिका को स्वीकार किया गया किंतु इन राज्यों में भी स्त्रीयों की राजनीतिक भागीदारी में कोई उल्लेखनीय तस्वीर नहीं बन पाई तथा भारत के शत प्रतिशत साक्षारता वाले राज्य केरल में भी स्त्री प्रतिनिधित्व अन्य राज्यों से भिन्न नहीं है। और आज भारत की निर्वाचित संस्थाओं में स्त्री प्रतिनिधित्व 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है दरअसल, स्त्री प्रतिनिधित्व की यह सोचनीय स्थिति उनकी काबिलीयत से नहीं, बल्कि पुरुष प्रधान समाज में पुरूष मानसिकता से जुड़ा सवाल है। फिर भी अनेक विकट अवरोधों के बाद भी स्त्री प्रतिनिधित्व का सवाल पीछे नहीं छूटा है और स्त्री आरक्षण के लिए प्रयास हो रहे हैं।