प्राचीन काल में महिला शिक्षा - Women's education in ancient times

प्राचीन काल में महिला शिक्षा - Women's education in ancient times


वैदिक साहित्य में गार्गी, मैत्रेयी, आत्रेय, शकुंतला आदि अनेक विदुषियों की चर्चा मिलती है जो इस बात का प्रमाण है कि वैदिक काल में महिलाओं को भी पुरुषों के समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त था, परंतु केवल गिनी-चुनी कुछ ही विदुषियों की चर्चा मिलने से इस बात का संकेत भी मिलता है कि संभवतः इस समय महिला शिक्षा अत्यंत सीमित थी तथा केवल समाज के संभ्रांत परिवारों की लडकियाँ ही शिक्षा प्राप्ति के अवसरों का सदुपयोग कर पातीं थीं। उस समय स्त्रियों के लिए पृथक शिक्षा संस्थाओं की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण वे पुरुषों के साथ ही शिक्षा प्राप्त करती थीं, अर्थात उस समय सह-शिक्षा व्यवस्था का प्रचलन था । वास्तव में, उस समय स्त्रियों की शिक्षा व्यवस्था का प्रमुख उत्तरदायित्व परिवार पर होता था जहाँ पिता, पति अथवा कुलगुरु ही परिवार की स्त्रियों को शिक्षा प्रदान करते थे । स्पष्ट है कि उस काल में स्त्रियों की शिक्षा के लिए कोई सुसंगठित व्यवस्था नहीं थी।

फिर भी उस काल की गार्गी, मैत्रेयी, लोपमुद्रा, सुलभा, अपाला जैसी अनेक नारियों ने स्त्री-शिक्षा व विद्वता का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। उत्तर- वैदिक काल में बाल-विवाह का प्रचलन प्रारंभ होने के कारण स्त्रियों की शिक्षा में कुछ व्यवधान उत्पन्न होने लगे थे । फिर भी इतिहास के पन्नों पर दृष्टिपात करने पर ज्ञात होता है कि उस काल में शैव्या, सीता, उर्मिला, विद्योत्तमा, चुडाला जैसी अनेक महिलाओं ने अपनी विद्वत्ता, त्याग व समर्पण का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था।


बौद्धकाल के प्रारंभिक वर्षों में स्त्रियों को मठों में प्रवेश नहीं दिया जाता था परंतु बाद में महात्मा बुद्ध ने स्त्रियों को संघ के रूप में प्रवेश करने की अनुमति देकर स्त्री शिक्षा को एक नया आयाम दिया, जिसके कारण स्त्री-शिक्षा को एक नया जीवन मिला। परंतु यह शिक्षा भी केवल धनी-मानी व कुलीन घरानों की स्त्रियों तक ही सीमित थी। परिणामतः भारत में बहुत लंबे समय तक सामान्य स्त्रियों की शिक्षा लगभग उपेक्षित ही रही थी। परंतु उस समय भी संघमित्रा जैसी विदुषियों ने स्त्रियों का नाम रोशन किया था।