कार्यशील पूंजी का अनुमान - working capital estimate
कार्यशील पूंजी का अनुमान - working capital estimate
किसी व्यावसायिक संस्था के सफल संचालन हेतु आवश्यक कार्यशील पूंजी का निर्धारण अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। वास्तविक कार्यशील पूंजी की स्थिति का विश्लेषण भी अर्थहीन हो जाता है, यदि हम संस्था की आवश्यक कार्यशील पूंजी का अनुमान न लगाते हों। आवश्यक कार्यशील पूंजी की निर्धारण सम्बन्धी समस्या का समाधन तभी हो सकता है। जब हम यह पता लगा लें कि कार्यशील पूंजी की मात्रा किन-किन कारणों से प्रभावित होती है। यह तो हम देख चुके हैं कि कभी-कभी कार्यशील पूंजी की आवधारणा को चालू सम्पतियों से सम्बन्धित किया जाता है और इस प्रकार की राय रखने वाले विशेषज्ञों की यह मान्यता है कि संस्था की चालू सम्पतियों की आवश्यकता ही कार्यशील पूंजी की आवश्यकता मानी जानी चाहिए। अन्य शब्दों में कार्यशील पूंजी की मात्रा इच्छित चालू सम्पतियों की मात्रा के बराबर होगी, परन्तु संस्था के अन्तर्गत प्रयुक्त स्थायी सम्पतियों की प्रकृति व सम्भाम पर्याप्त सीमा तक चालू सम्पतियों की मात्रा को प्रभावित करता है
अतः कार्यशील पूंजी की मात्रा स्थायी सम्पतियों से भी प्रभावित होती है किसी भी व्यावसायिक संस्था के लिए आवश्यक कार्यशील पूंजी की मात्रा निम्न कारकों से प्रभावित होती है। और यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि कार्यशील पूंजी का अनुमान लगाते समय इन कारकों को ध्यान में रखा जाय।
(1) व्यवसाय की प्रकृति: कार्यशील पूंजी की मात्रा को प्रभावित करने वाला यह एक महत्वपूर्ण कारक है। व्यवसाय की प्रकृति के अनुसार कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भिन्न-भिन्न मात्रा में होती है। कुछ व्यवसाय ऐसे होते हैं, जहां पर कार्यशील पूंजी की आवश्यकता उतनी अधिक नहीं होती है, जितनी की स्थायी पूंजी की । इंजीनियरिंग व तेल उद्योग इसके उदाहरण हैं कुछ व्यवसाय इस प्रकार के होते हैं जहां पर स्थायी पूंजी की तुलना में कार्यशील पूंजी की आवश्यकता अधिक होती है, जैसे बैकिंग उद्योग व व्यापार करने वाली संस्थाएँ में ।
(2) निर्माण अवधि की लम्बाई व उत्पादन बिक्री का अन्तराल : संस्था की कार्यशील पूंजी की आवश्यकता मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्वों में दूसरा महत्वपूर्ण तत्व यह है कि निर्माण अवधि कितनी है और निर्माण होने और बिक्री होने के बीच का अवधि अन्तराल कितना है ? यदि संस्था की निर्माण अवधि काफी अधिक है तो कच्चा माल खरीदने के लिए श्रम व अन्य खर्चों के भुगतान के लिए संस्था बाध्य हो जायेगी और उसे अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जब तक कि माल तैयार होकर बिक्री के लिए उपलब्ध न हो जाय। ऐसी स्थिति में पूंजी का एक यथेष्ट भाग निर्माण कार्य में बंधित हो जायेगा। इस अवधि में बिक्री न होने से सभी प्रकार के भुगतानों के लिए अलग से कार्यशील पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। यही नहीं लम्बी अवधि की दशा में कीमत परिवर्तन की भी संभावना होती है और यह भय बना रहता है कि अनुमानित लाभ कम या नगण्य न हो जाय। ऐसी स्थिति में कार्यशील पूंजी की मात्रा अधिक रूप में आवश्यक होती है ताकि कठिनाईयों को झेला जा सके।
यही नहीं निर्माण व विक्रय के बीच की अवधि का अन्तराल जितना ही अधिक होगा उतनी ही अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी।
निर्माण व बिक्री का अन्तराल अधिक होने के कारण संस्था में फण्ड का बहाव सहज, तुरन्त, नियमित व समय से नहीं हो पाता है और इसलिए निर्माण व स्कन्ध संग्रहण सम्बन्धी खर्चों को पूरा करने के लिए अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता पड़ती है ।
(3) विक्रय की कुल मात्रा व कार्यशील पूंजी का आवर्त :- संस्था की बिक्री की कुल मात्रा जितनी अधिक होगी, क्योंकि अधिक मात्रा की रकम से संस्था अपने दिन प्रतिदिन के भुगतानों का आयोजन कर सकती है परन्तु विक्रय की गति का भी कार्यशील पूंजी पर प्रभाव पड़ता है। यदि बिक्री सहज व नियमित है तो कार्यशील पूंजी की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होगी। अनियमित बिक्री की दशा में कार्यशील पूंजी की मात्रा अधिक होगी। बिक्री मात्रा बढ़ाने की नीति, विशेष बिक्री अभियान पर होने वाला खर्च कीमत में परिवर्तन व साख-नीति आदि का भी कार्यशील पूंजी पर प्रभाव पड़ता है।
कार्यशील पूंजी की आवर्त की गति का कितनी बार व्यापार में प्रवेश किया गया है। यह आवर्त बतलाता है कि चालू सम्पतियों में विनियोजित पूंजी का कितनी बार व्यापार में प्रयोग किया गया है आवर्त जितना ही अधिक होता है, पूंजी की उसी मात्रा में व्यवसाय की अधिक मात्रा का व्यापार किया जा सकता है।
(4) क्रय व विक्रय की शर्ते ( साख- नीति) यदि संस्था माल का नकद क्रय करती है परन्तु माल को उधार बेचती है तो उसे कम-से-कम इंतनी पूंजी की आवश्यकता पड़ेगी कि जो कुछ बेचा गया है और जिसका भुगतान नहीं मिला है उसे नकद रूप में खरीदा जा सके। दूसरी तरफ, यदि संस्था माल का क्रय उधार करती हैं और नकद रूप में बेचती है तो विक्रय हेतु स्कन्ध बिना पूंजी के ही प्राप्त या जमा कर सकेगी और समय-समय पर नकद बिक्री से प्राप्त धन में से उधार क्रय का भुगतान कर सकेगी परन्तु व्यवहार में ये दोनों स्थितियां काल्पनिक होती है
और पायी नहीं जाती हैं। वस्तुतः माल का क्रय-विक्रय अंशतः नकद और अंशतः उधार दोनों रूपों में होता है इसके विपरित, उधार क्रय की अवधि जितनी अधिक होगी, कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी उतनी ही कम होगी।
(5) चालू सम्पतियों की तरलता :- संस्था के पास जितनी ही अधिक तरल सम्पतियां होगी उसे उतनी ही कम पूंजी की आवश्यकता होगी। तरल सम्पतियों में केवल उन्हीं सम्पतियों को शामिल करते है जिन्हें तुरन्त नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि चालू सम्पतियों का मूल्य चालू दायित्वों से अधिक होना चाहिए । तरल सम्पतियों की आवश्यकता अनुमान लगाते समय विभिन्न प्रकार की सम्पतियों के मिश्रण का विधिवत विश्लेषण करना आवश्यक होती है। इसके विपरीत उधार क्रय की अवधि जितनी अधिक होगी, कार्यशील पूंजी की आवश्यकता भी उतनी ही कम होगी।
(6) चालू सम्पतियों की तरलता :- संसथा के पास जितनी ही अधिक तरल सम्पतियां होगी उसे उतनी ही कम पूंजी की आवश्यकता होगी। तरल सम्पतियों में केवल उनहीं सम्पतियों को शामिल करते हैं जिन्हें तुरन्त नकद धन में परिवर्तित किया जा सकता है। इसलिए यह कहा जाता है कि चालू सम्पतियों का मूल्य चालू दायित्वों से अधिक होना चाहिए । तरल सम्पतियों की आवश्यकता अनुमान लगाते समय विभिन्न प्रकार की सम्पतियों के मिश्रण का विधिवत विश्लेषण करना आवश्यक होता है। तरलता का अनुमान लगाने के लिए मुख्य रूप से निम्न सम्पतियों का विश्लेषण महत्वपूर्ण होता है।
(अ) रोकड़ स्थिति :- यह तो सर्वविदित है कि व्यावसायिक संस्था द्वारा संभावित प्रत्येक क्रिया से रोकड़ स्थिति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होती है।
इसलिए व्यवसाय के प्रबन्ध के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह संस्था के लिए इच्छित रोकड़ बजट का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। ध्यान में रखना होगा कि रोकड़ अपने आप में एक अप्रभावशाली एवं अनुत्पादक सम्पति है और आवश्यकता से अधिक रोकड़ की विद्यमानता संस्था की लाभदायकता को कमजोर कर सकती है। यदि संस्था में रोकड़ का बहाव नियमित और सहज हैं तो कम मात्रा में रोकड़ की जरूरत पड़ती है। रोकड़ स्थिति का विश्लेषण करते समय आन्तरिक कारक जैसे कर भुगतान, लाभांश नीति छूट नीति, लागत कमी प्रोग्राम, कीमत परिवर्तन, आदि का भी सतकर्ततापूर्वक अवलोकन व व्यवस्था की जानी चाहिए ।
(ब) देनदारों की स्थिति :- तरल सम्पतियों की श्रेणी में देनदारों एवं प्राप्य बिलों का दूसरा स्थान है अतः इनका भी विधिवत् विश्लेषण करके पता लगाना चाहिए कि कुल उधार बिक्री का कितनी भाग बकाया रह जाता है, देनदारों से औसतन कितनी अवधि के बाद रूपया वसूल हो पाता है
कितनी मात्रा में देनदार अशोध्य ऋण के रूप में परिवर्तित हो जाते है इत्यादि इन सभी का प्रभाव देनदारों की स्थिति पर पड़ता है जो अन्तिम अवस्था में कार्यशील पूंजी को भी प्रभावित करता है।
(स) स्कन्ध स्थिति प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को व्यापार संचालन हेतु कच्चे माल का या तैयार काल का स्कन्ध रखना पड़ता है। स्कन्ध में तरलता का अभाव रहता है । अतः इससमें लगायी पूंजी कुछ समय के लिए बंधित हो जाती है। स्कन्ध की स्थिति कई कारकों से प्रभावित होती है। स्कन्ध स्तर की अधिकतम एवं न्यूनतम सीमाएं बिक्री का आवर्त निर्माण अवधि व बिक्री एवं निर्माण अवधि का अन्तराल, आदि कारक सम्बन्ध स्थिति को प्रभावित करते हैं।
( 6 ) व्यवसाय में मौसमी परिवर्तन कुछ संस्थाए ऐसी होती हैं जिनका व्यापार : संचालन मौसमी प्रकृति का होता है
अर्थात एक मौसम से दूसरे मौसम में व्यवसाय की प्रकृति या मात्रा में परिवर्तनों से ये संस्थाएं प्रभावित होती रहती है ऐसी संस्थाओं के यहां मौसम में व्यापार संचालन हेतु कच्चा माल अधिक मात्रा में क्रय करना पड़ता है और साथ ही सभी मौसम की मांग को पूरा करने के लिए तैयार माल का स्कन्ध पर्याप्त मात्रा में रखना पड़ता है। दोनों दशाओं में स्पष्टतः अधिक पूंजी चालू सम्पतियों में लगानी पड़ती हैं और इस प्रकार इन संस्थाओं में कार्यशील पूंजी की अधिक आवश्यकता पड़ती है।
उपरोक्त कारक जो कार्यशील पूंजी को प्रभावित करते है और इसलिए कार्यशील पूंजी का अनुमान लगाते समय इन्हें ध्यान में रखना आवश्यक होता है । परन्तु इन कारकों से भी अधिक महत्वपूर्ण कारक प्रबन्ध की योग्यता व क्षमता हैं जो कार्यशील पूंजी को पर्याप्त सीमा तक प्रभावित करती है। उपर्युक्त कारकों के प्रति प्रबन्ध का दृष्टिकोण कारकों की प्रकृति की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होता है जोखिम उठाने की क्षमता, पूंजी संरचना का लचीलापन, लाभांश नीति, पूंजी का उचित स्रोत व क्रय विक्रय सम्बन्धी साख नीति आदि ऐसे क्षेत्र है जिनमें दक्ष प्रबन्ध अपनी कुशलता का परिचय देकर कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को अनुकूलतम एवं लाभदायी बनाये रख सकता है।
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