कार्यशील पूंजी के पूर्वानुमान की तकनीकियां - Working Capital Forecasting Techniques
कार्यशील पूंजी के पूर्वानुमान की तकनीकियां - Working Capital Forecasting Techniques
किसी भी आगामी अवधि के लिए कार्यषील पूजी की मात्रा का पूर्वानुमान लगाने के लिए निम्न में से कोई भी तकनीक प्रयोग में लायी जा सकती है।
(1) संचालन चक्र रीति
(2) चालू सम्पतियों एवं चालू दायित्वों का पूर्वानुमान रीति
(3) रोकड पूर्वानुमान रीति
(4) प्रक्षेपी आर्थिक चिट्ठा रीति
(5) लाभ-हानि समायोजन रीति
(1) संचालन चक्र रीति :- रोकड कच्चा माल निर्मित माल- देनदार व प्राप्त बिल - नकद यही संचालन चक्र होता है। एक संचालन चक्र की अवधि संचालन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि में आपूर्तिदाता द्वारा स्वीकृत अवधि का समायोजन करके ज्ञात की जाती है। संचालन चक्र रीति से किसी संस्था की भावी कार्यषील पूंजी का पूर्वानुमान लगाने के लिए एक अवधि के संचालन व्ययों में उसी अवधि के संचालन चक्रों की संख्या से भाग दिया जाता है इस रीति के प्रयोग हेतु निम्न की गणना आवष्यक होती है।
(क) संचालन व्यय किसी अवधि के कुल संचालन व्यय में उस अवधि में (गैर नकद खर्चों को छोड़कर) किये गये सामग्री क्रय, निर्माणी व्यय, प्रषासनिक व्यय, विक्रय व वितरण व्यय, आदि को षामिल करते है। यह जरूरी है कि इन व्ययों की रकम का अनुमान लगाते समय उत्पाद मिश्रण में परिवर्तन,
नवीन उत्पाद का प्रारम्भ पुराने उत्पाद का परित्याग, मूल्य स्तर में परिवर्तन आदि से उत्पन्न परिवर्तनों का समायोजन कर लिया जाय ।
(ख) संचालन चक्र की अवधि संचालन चक्र की अवधि से तात्पर्य सचालन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि के योग में से आपूर्तिदाताओं द्वारा प्रदत अवधि के घटाने के बाद बची हुई अवधि से होता है। संचालन की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि की गणना विधि इस प्रकार है :
(1) सामग्री संग्रहण अवधि (दिनों में) उत्पादन हेतु निर्गमन से पूर्व जितने दिन सामग्री को स्टोर में रखना पड़ता है उसे ही सामग्री ग्रहण अवधि कहते हैं इसकी गणना के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है।
चालू सम्पत्तियों एवं चालू दायित्वों का पूर्वानुमान रीति- इस रीति के अन्तर्गत हम आगामी अवधि में होने वाले लेन-देनों के आधार पर चालू सम्पतियों का रोकड लागत पर अनुमान लगाते हैं और इसी प्रकार चालू दायित्वों का भी अनुमान लगा लेते हैं। चालू सम्पतियों में से चालू दायित्वों को घटा देने पर कार्यषील पूंजी की मात्रा ज्ञात हो जाती है। यदि कार्यषील पूजी का अर्थ चालू सम्पतियों से लगाया गया हो तो चालू सम्पतियों के अनुमानित मूल्य को ही कार्यषील पूंजी मान लिया जाता है। गत अनुभव, सरल नीति आदि के आधार पर विभिन्न चालू सम्पतियों एवं दायित्वों का अनुमान लगाया जाता है।
रोकड़ पूर्वानुमान रीति- इस रीति के अन्तर्गत आगामी अवधि में होने वाली प्राप्तियों एवं भुगतानों का अनुमान लगाया जाता है और अन्तर की रकम रोकड आधिक्य या कमी को दर्षाती है कमी की रकम का कहीं न कही से अर्थ प्रबन्धन करना पड़ता है। वस्तुतः यह रीति रोकड़ बजट का ही रूप होती है।
प्रक्षेपी आर्थिक चिट्ठा रीति- इस रीति के अन्तर्गत अवधि में होने वाले लेन-देनों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न प्रकार की सम्पतियों एवं दायित्वों का अनुमान लगा लिया जाता है। यह अनुमान दी गयी सूचनाओं के आधार पर किया जाता है। सम्पतियों एवं दायित्वों के अन्तर को कार्यषील पूंजी के रूप में लिया जाता है। पूर्वानुमानित सम्पतियों एवं दायित्वों के आधार पर एक आर्थिक चिट्ठा बना लिया जाता है जिसे प्रक्षेपी चिट्ठा कहते हैं।
लाभ हानि समायोजन रीति- इस रीति के अन्तर्गत आगामी अवधि में होने वाले लेन-देनों के आधार पर अनुमानित लाभ की गणना कर ली जाती है इस अनुमानित लाभ में से रोकड़ आगमन व रोकड़ बहिर्गमन का समायोजन करके कार्यषील पूजी की मात्रा ज्ञात कर ली जाती है वस्तुत: यह विधि लाभ को रोकड़ आधार पर परिवर्तित करती है।
वार्तालाप में शामिल हों