योग दर्शन - yoga philosophy
योग दर्शन - yoga philosophy
सांख्य और योग दर्शन का विवेचन एक दूसरे के पूरक रूप में किया जाता है। माना जाता है कि साख्य दर्शन में तत्व चिंतन है जबकि योग दर्शन में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए साधना का मार्ग प्रदर्शित किया गया है। योग आत्मदर्शन का साधन है, जिससे जीव और ब्रह्म का मिलन होता है और अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। अतः कहा जा सकता है कि योग दर्शन योग संबंधी उपदेश या व्यवस्थित कथन है। योग दर्शन के रचयिता महर्षि पतंजलि है। वस्तुत सांख्य में जिन तीन प्रकार के दुःखो का वर्णन किया गया है उनसे मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग योग दर्शन द्वारा प्रकाशित किया गया है। यही कारण है कि सांख्य एवं योग एक दूसरे से संबंधित तथा परस्पर संपूरक है।
शिक्षा की संकल्पना
महर्षि पतंजलि के अनुसार शिक्षा एक दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। महर्षि पतंजलि के महाभाष्य नामक ग्रंथ के अनुसार “शिक्षा वह प्रक्रिया है जो मनुष्य को अपने लौकिक कर्मों को करने के योग्य बनाती है।" शिक्षा को आत्मनिरोध या नियंत्रण द्वारा आध्यात्मिक एवं सांसारिक विकास की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है।
शिक्षा के उद्देश्य
योग दर्शन 'चित्तवृत्ति के निरोध का दर्शन है। चित्त के सत्व, रज और तमस् तीन गुणहोते हैं जो मनुष्य के व्यवहार में प्रकट होते हैं। मनुष्य की दस इंद्रियाँ (ज्ञान व कर्मन्द्रिय) और मन द्वारा जो अनुभव होते हैउन्हें पांच प्रकार का कहा गया है यथार्थ संज्ञान, अयथार्थ संज्ञान, कल्पना, समाधि और स्मृति आत्म-शिक्षण के द्वारा इन पर अंकुश लगाया जाता है। इस प्रकार योग की सिद्धि होती है। अतः शिक्षा के उद्देश्य भी इसी के आधार पर निर्मित हैं-
• आत्म-प्रशिक्षण एवं आत्म-नियंत्रण नैतिकता का विकास
• पूर्णता की प्राप्ति
• लोक कल्याण की भावना का विकास
• अच्छे संस्कारों का निर्माण
शिक्षण विधि
योग दर्शन में अनेक शिक्षण विधियों की चर्चा की गई है। जैसे उपदेश, व्याख्या, विश्लेषण-संश्लेषण-विधि, सूत्र विधि, श्रवण, मनन, ध्यान, धारणा की विधि, अभ्यास या क्रिया-विधि, स्वाध्याय-विधि, तर्क-विधि आदि ।
शिक्षा-पाठ्यचर्या
'योगश्चित्तवृत्तिः निरोध जैसे सूत्र में योग क्या है चित्त क्या है और उसकी क्या विशेषताएँ हैं, निरोध के लिए अष्टाग योगके क्या साधन है? इनकी सिद्धि कैसे होती है आदि प्रश्नों का उत्तर पाठ्यचर्या की और संकेत करता है।
शिक्षा की पाठ्यचर्या में धर्मशास्त्र दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान, शरीर विज्ञान तथा योगाभ्यास और अन्य शारीरिक क्रियाएं रखी गई है। यदि पंतजलि के महाभाष्य को ध्यान में रखा जाए और पाठ्यचर्या पर विचार किया जाए तो निम्न विषयों को भी पाठ्यचर्या में समाहित किया जा सकता है।
भाषा, तर्कशास्त्र, इतिहास, वेद, धनुविद्या आदि।
अनुशासन
जब तक मनुष्य का चित्त निर्मल एवं स्थिर नहीं हो जाता, तब तक वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। शुद्ध हृदय तथा शांत मन से ही जान की साधना संभव है। योग इस प्रकार का साधन है, जिससे शरीर और मन शुद्ध तथा स्थिर रहते हैं।
छात्र एवं अध्यापक संकल्पना: योग दर्शन के अनुसार विद्यार्थी स्वाध्यायी ब्रहमचारी एवं कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। अध्यापक को भी ब्रहमनिष्ठ होना चाहिए अर्थात् जो योग द्वारा ब्रहम का साक्षात्कार कर चुका है। योगाभ्यासी गुरु शांत, एकांत, बाधा रहित स्थान पर रहते हैं।
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