शून्य आधार बजटन - zero base budgeting

शून्य आधार बजटन - zero base budgeting


शून्य आधार बजटन भावी क्रियाओं के नियोजन का एक क्रान्तिकारी विचार है तथा यह परम्परागत बजटन से काफी भिन्न है। परम्परागत बजटन के अन्तर्गत एक बजट अवधि में किसी क्रिया पर किया गया व्यय अगली बजट अवधि के अनुमानों का आधार बनता है। इसमें नई क्रियाओं और चालू कार्यों में प्रत्याशित परिवर्तनों के लिए बजट राशि में संशोधन किये जाते हैं। शून्य आधार बजटन बजटन के क्षेत्र में एक नया विचार है जो सर्वप्रथम 1969 में अमेरिका में टकसास इन्स्ट्रमेन्ट्स में लागू किया गया। 1977 में अमेरिका के प्रेसीडेन्ट जिमी कार्टर ने इसे संघीय सरकार में लागू किया।


( षून्य आधार बजट ) एक व्यय नियंत्रक युक्ति है जहां पिछली बजट उपलब्धियों के संदर्भ के बिना प्रत्येक विभागीय प्रमुख को व्यय की प्रत्येक मद के लिए कोषों की आवश्यकता का औचित्य बतलाना होता है तथा उसके अनुरूप ही बजट तैयार करना होता है।

यह एक उपक्रम की क्रियाओं के लिए बजटन की एक ऐसी औपचारिक प्रणाली है जिसमें यह मानकर चला जाता है कि प्रत्येक क्रिया पहली बार सम्पादित की जा रही है अर्थात् शून्य आधार से । प्रत्येक क्रिया चाहे वह नई हो या मौजूदा के व्यय का औचित्य व मूल्यांकन उसके अपने गुणों के आधार पर किया जाता है। अतः क्रिया के प्रस्तावक प्रबन्धक को यह सिद्ध करना होता है कि यह क्रिया आवश्यक है तथा उत्पादन मात्रा या परिणामों या विचारित क्रिया की मात्राको ध्यान में देते हए मांगी की राशि उचित है। शून्य आधार बजटन में यह मानकर चला जाता है कि प्रत्येक प्रबन्धक अपने अधिकार क्षेत्र की बजट अवधि में प्रस्तावित प्रत्येक क्रिया के लिये लागत लाभ विश्लेषण करेगा। किसी क्रिया को केवल इस आधार पर नहीं स्वीकृत किया जायेगा कि भूतकाल में भी इसे स्वीकृति मिली थी। इस प्रणाली के अन्तर्गत प्रत्येक क्रिया के बहुत से विकल्पों की पहचान की जाती है, उनकी लागत निकाली जाती है

और उनसे सम्भावित लाभ के संदर्भ में उनका मूल्यांकन किया जाता है। वास्तव में शून्य आधार बजटन निगमित नियोजन और बजटन के क्षेत्र में लागत लाभ विश्लेषण पद्धति का विस्तार ही है।


शून्य आधार बजटन की तकनीक मौजूदा नियोजन, बजटन एवं पुनर्विचार की प्रक्रिया को जोड़ती एवं पूरा करती है। यह चयनित लाभों की प्रभावपूर्ण प्राप्ति में प्रयुक्त सीमित संसाधनों की कुशल रीतियों एवं विकल्पों की पहचान करती है। इस तकनीक का प्रमुख उपयोग उन क्षेत्रों में है। जहां व्यय निर्माण गतिविधियों से अधिक प्रभावित नहीं होते हैं अर्थात् यह तकनीक उन क्षेत्रों में उपयोगी है जहां प्रबन्धक को विभिन्न प्रत्यक्ष लागतों और लाभों वाली विभिन्न क्रियाओं के बीच चयन का अवसर है। ये क्षेत्र है: विपणन, वित्त, गुण, नियंत्रण, अनुरक्षण, उत्पादन, नियोजन, शोध एवं विकास, सेविवर्गीय, समंक विधायन आदि ।