औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 - औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951

औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 - औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 


औद्योगिक नीति, 1948 को व्यावहारिक रूप देने के लिए सन 1951 में औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम पारित किया गया और इसे 8 मई, 1952 से लागू किय गया। इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं- 

(1) औद्योगिक विकास का नियमन करना एवं योजना प्राथमिकताओं के अनुसार संसाधनों के प्रभाव को मोड़ देना, 


( 2 ) एकाधिकार को दूर रखना एवं धन के केंद्रीयकरण को रोकना, 


(3) बड़े पैमाने के उद्योगों की अनुचित प्रतिस्पर्धा से लघु उद्योग को संरक्षण देना, 


(4) नए उद्यमियों को उद्योग स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना तथा 


(5) आर्थिक इकाइयों की स्थापना करना एवं आधुनिक विधियों के प्रयोग से तकनीकी एवं आर्थिक सुधार लाने का प्रयत्न करना। 


औद्योगिक (विकास एवं नियमन) अधिनियम, 1951 की मुख्य बातों को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-


(क) प्रतिबंधात्मक 


(ख) सुधारात्मक 


(ग) रचनात्मक 


(क) प्रतिबंधात्मक - पहले इस अधिनियम में 38 उद्योगों के नाम दिए थे,

लेकिन 30 दिसंबर 1978 के अध्यादेश से 7 उद्योग और बढ़ा दिए गए। इन उद्योगों को बिना केंद्रीय सरकार के लाइसेंस प्राप्त किए स्थापित नहीं किया जा सकता है और न वर्तमान इकाइयों द्वारा अपना विस्तार किया जा सकता है। लेकिन यदि इकाई की स्थायी संपत्तितयों (भूमि, मकान एवं सपूर्ण मशीनरी में विनियोग) का मूल्य 5 करोड़ रु से अधिक नहीं है तो ऐसे इकाई को लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी। केंद्रीय सरकार लाइसेंस देते समय उद्योगों की स्थापना के स्थान एवं निर्माण की जाने वाली वस्तु के आकार, आदि के बारे में शर्तें लगा सकती है। यदि मिथ्या वर्णन करके लाइसेंस लिया गया है या केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित समय में उपक्रम स्थापित नहीं होता है तो केंद्रीय सरकार ऐसे लाइसेंस को रद्द करने का अधिकार रखती है।


(ख) सुधारात्मक - इस अधिनियम की तीन बातें सुधारात्मक मानी जा सकती है- 


(i) केंद्रीय सरकार को किसी भी उद्योग की जांच करने का अधिकार है अगर उत्पादन कम हो रहा है, वस्तु की क्वालिटी गिर रही हैं, वस्तुओं के मूल्य बढ़ रहे हैं, या राष्ट्रीय साधन की रक्षा की आवश्यकता है।


(ii) यदि किसी औद्योगिक इकाई का प्रबंध संतोषजनक नहीं है या वह इकाई सरकारी आदेशों व निर्देशों का पालन नहीं करती है तो सरकार ऐसी इकाई का नियंत्रण एवं प्रबंध 17 वर्षो के लिए अपने हाथ में ले सकती है। पहले प्रबंध5 वर्ष के लिए लिया जाएगा, जिसके प्रति 2 वर्ष के लिए वृद्धि की जाएगी। इसके लिए संसद की स्वीकृति लेना आवश्यक होगा। 


(iii) केंद्रीय सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह वस्तुओं के उचित वितरण एवं मूल्यों को उचित स्तर पर बनाए रखने के लिए उनकी बिक्री को नियमित एवं निर्गमित कर सकती है। 


(ग) रचनात्मक - इस अधिनियम में उद्योगों के विकास के लिए यह व्यवस्था की गई हैं कि (i) केंद्रीय परामर्श समिति का गठन किया जाएगा (ii) विकास परिषद स्थापित की जाएगी, (iii) औद्योगिक पैनल्स बनाए जाएंगे, (iv) औद्योगिक आंकड़े एकत्रित किए जाएंगे।


इस अधिनियम के अंतर्गत -


(i) केंद्रीय सलाहकार परिषद बनाई गई है जिसका कार्य तथ्यों एवं आकड़ों का संकलन करना है। इसमें उद्योग, श्रमिक व उपभोक्ता सभी का प्रतिनिधत्व है। 


(ii) इस परिषद ने एक पुनरावलोकन उपसमिति बना रखी है,

जिसका कार्य लाइसेंसों के बारे में आवश्यक तथ्यों का पर्यवेक्षण करना है। 


(iii) केंद्रीय सलाहकार परिषद् ने ही एक स्थायी समिति बना रखी है, जिसके 16 सदस्य हैं। इसका कार्य किसी उद्योग की स्थिति का पुनरावलोकन करना है। 


(iv) अब तक 24 उद्योगों के लिए विकास परिषदे बनाई गई है। 


(v) औद्योगिक पैनल भी बनाई गए हैं जिनका काम उद्योग की विभिन्न समस्याओं का अध्ययन करना है। यह औद्योगिक पैनल उन्हीं के बारे में बनाए जाते हैं जिनके लिए परिषदे नहीं हैं।