भारतीय पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र , औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 - Public and Private Sectors in the Indian Five Year Plan, Industrial Policy Resolution, 1956
भारतीय पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र , औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 - Public and Private Sectors in the Indian Five Year Plan, Industrial Policy Resolution, 1956
हमारे देश के नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि औद्योगिक विकास के लिए सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र की क्या भूमिका होनी चाहिए। आजादी के बाद भारत के उद्योगपतियों के पास अपने उद्योगों को सुचारू रूप से चलाने के लिए पूंजी की कमी थी और देश में उत्पादन को बेचने के लिए इतना बड़ा बाजार भी नहीं था कि उत्पादन को बेचा जा सके व उद्योगों को प्रोत्साहन मिल सके। इस कारण राज्यों को औद्योगिक क्षेत्र को प्रोत्साहन देने में व्यापक भूमिका निभानी पड़ी। दूसरी पंचवर्षीय योजना में सरकार ने यह निर्णय लिया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योगों पर पूरा नियंत्रण करेगी जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण थे।
औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956
भारी उद्योगों पर नियंत्रण करने के लिए राज्य के लक्ष्य के अनुसार औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 बनाया गया। इस नीति को दूसरी पंचवर्षीय योजना के आधार पर बनाया गया। दूसरी योजना में समाज को समाजवादी स्वरूप का आधार तैयार करने का प्रयास किया गया। इस नीति के अनुसार, उद्योगों को तीन भागों में बांटा गया। प्रथम भाग में वे उद्योग आते हैं जिस पर राज्य का अनन्य स्वामित्व होता था। दूसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जिनमें निजी क्षेत्र तथा सरकार मिलकर संयुक्त प्रयास कर सकते थे, परंतु इनको शुरू करने की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती तथा तीसरे वर्ग में वे उद्योग शामिल थे जो निजी क्षेत्र के अंतर्गत आते थे।
निजी क्षेत्रों में आने वाले उद्योगों का भी एक वर्ग ऐसा था जो लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया। नए उद्योगों को तब तक अनुमति नहीं दी जाती थी जब तक सरकार से लाइसेंस नहीं प्राप्त कर लिया जाता था। इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों के उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया। यदि कोई उद्योग आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र में लगाया जाना था तो इसके के लिए सरकार से लाइसेंस लेना आसान था। इस नीति का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय असमानता को कम करना था, ताकि सभी क्षेत्रों का समान रूप से विकास हो सके। वर्तमान उद्योगों को भी उत्पादन बढ़ाने और नई वस्तुओं के उत्पादन के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था। सरकार यह सुनिश्चित करती थी कि उत्पादित वस्तुओं की मात्रा अर्थव्यवस्था द्वारा अपेक्षित मात्रा से अधिक न हो तथा उत्पादन बढ़ाने का लाइसेंस केवल तभी दिया जाता था जब सरकार को इस बात विश्वास हो जाता था कि अर्थव्यवस्था के लिए वस्तुओं की बड़ी मात्रा में आवश्यकता है।
वार्तालाप में शामिल हों