1969 के पश्चात् बैंकिंग विकास की स्थिति , सफलताएँ - Status of Banking Development after 1969, Successes
1969 के पश्चात् बैंकिंग विकास की स्थिति , सफलताएँ - Status of Banking Development after 1969, Successes
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मुख्य उद्देश्य ये थे राष्ट्रीयीकरण के बाद देश में बैंकिग का विकास होगा, योजनाओं में प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लिए अधिक ऋण सुविधाएं प्राप्त होती होंगी, छोटे-छोटे व्यक्ति भी उत्पादन आवश्यकताओ के लिए बैंकों से ऋण प्राप्त कर सकेंगे, निजी उद्योगों एवं व्यापार की आवश्यक साख आवश्यकताओं की पूर्ति तो की जाएगी। परंतु बैंक साख का उपयोग सट्टे और अन्य अनुत्पादक कार्यों में संबंध न हो सकेगा, सार्वजनिक उपक्रमों एव अल्प विकसित क्षेत्रों को बैंको के साधन अधिक मात्रा में उपलब्ध होंगे, तथा बैंकिंग क्षेत्र में व्यावसायिक प्रबन्ध के विकास का वातावरण उत्पन्न होगा। हमें देखना यह है कि राष्ट्रीयकृत बैंक निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में कहाँ तक सफल हो पाए हैं।
परस्पर विरोधी भावनाओं से अनेक प्रतिद्वन्द्वी ऑकड़े प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिनके द्वारा कहीं तो उनकी कार्य प्रणाली की अकुशलता और कही उनके बैंक के उज्ज्वल पहलू प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया जाता है।
स्थिति की निष्पक्ष जाँच के लिए हमे कुछ निर्विवाद तथ्यों पर दृष्टिपात करना चाहिए।
सफलताएँ
राष्ट्रीयकृत बैंकों की निम्नलिखित मुख्य सफलताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है-
(क) राष्ट्रीयकृत बैंक ने विशाल स्तर पर अपनी नयी शाखाएं खोली है। 30 जून, 1969 को समस्त वाणिज्यिक बैंकों की शाखाओं की संख्या 8,262 थी जो मार्च 2012 के अंत में 81,240 हो गई। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के समय औसत 65,000 जनसंख्या के लिए एक बैंक कार्यालय था । जून 2009 तक औसत 15,000 जनसंख्या के लिए एक बैंक कार्यालय हो गया। इस संबंध में महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिकाश नई शाखाए उन स्थानों पर खोली गई हैं जहाँ पहले किसी भी बैंक की कोई भी शाखा कार्य नहीं कर रही थी।
जुलाई 2011 में बैंको को सूचित किया गया था कि वे अपनी कम से कम 25 प्रतिशत नई शाखाएँ बैंक रहित ग्रामीण क्षेत्रों में खोलें।
(ख) ग्रामीण क्षेत्र में नई शाखाएँ खोलने की ओर विशेष ध्यान दिया गया है। जुलाई 1969 में ग्रामीण शाखाओं की संख्या 1,860 थी जो मार्च 2013 में 26,493 हो गई। इस प्रकार कुल शाखाओं में ग्रामीण शाखाओं का भाग 22.3 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 30 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि में अर्द्ध शहरी शाखाओं का अनुपात 402 प्रतिशत से घटकर 28.2 प्रतिशत रह गया। मार्च 2013 में शहरी शाखाओं का अनुपात 22.0 प्रतिशत तथा महानगरों में शाखाओं का अनुपात 22.3 प्रतिशत था।
(ग) बैंकों की जमाराशि में वृद्धि हुई है। जून 1969 से मार्च 2014 के बीच अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक की जमाराशि 4,665 करोड़ रूपये से बढ़कर 77,0556 बिलियन रूपये हो गयी है।
1969 से 1983 के बीच बैंकों की जमाराशियों में वृद्धि की वार्षिक औसत 192 प्रतिशत रही जबकि 1951 से 1969 के बीच यह दर 92 प्रतिशत थी। 1980-81 से 1989-90 के बीच वृद्धि दर 81 प्रतिशत थी। 2010-11 तथा 2011-12 में वृद्धि क्रमशः 17.7 प्रतिशत तथा 13.7 प्रतिशत थी। 2011-12 में जमाराशि में हुई वृद्धि दर पिछले 10 वर्षों में सबसे कम थी। यह कमी अर्थव्यवस्था में आई शिथिलता का परिणाम थी। बाजार की ब्याज दरों का ऊँचा होना तथा बाजार में उपलब्ध अन्य विकल्पों का होना भी इसके कारण हो सकते हैं। 2011-12 तथा 2012-13 में वृद्धि दर क्रमशः 14.9 तथा 142 प्रतिशत थी। 2013-14 में 141 प्रतिशत वृद्धि हुई
(घ) बैंकों के अग्रिम तथा निवेश बढ़े है जून 1969 से मार्च 2012 के बीच अनुसूचित वाणिज्यिक बैकों द्वारा दिए गए ऋणों की राशि 3,599 करोड़ रूपये से बढ़कर 59,941 बिलियन रूपये हो गई।
1969 से 1983 के बीच इन बैंकों के ऋणों की औसत वार्षिक वृद्धि दर 18 प्रतिशत रही, जबकि 1951 से 1969 के बीच यह दर 10.8 प्रतिशत थी। 2004-05 से यह बढ़कर 30.0 प्रतिशत से भी अधिक हो गई। 2005-06 तथा 2006-07 तथा 2006-07 में भी वृद्धि दर का स्तर इसी के करीब रहा है। बाद के वर्षों में इसकी गति कम होती गई। 2010-11 में वृद्धि दर 22.6 प्रतिशत थी जो कि 2011-12 में गिरकर 16.3 प्रतिशत रह गई। 2012-13 तथा 2013-14 में वृद्धि दर क्रमश 141 प्रतिशत तथा 139 प्रतिशत थी।
(ङ) राष्ट्रीयकरण के बाद उपेक्षित वर्गो तथा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को बैंकों के प्राप्त होने वाली सहायता में वृद्धि हुई है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद छोटे किसानों, कारखानेदारों,
परिवहन परिचालको तथा फुटकर व्यापारियों आदि को ऋण दिलाने के लिए बैंकों द्वारा अनेक प्रकार की सुविधाएँ और छूटे दी गई हैं।
बैंकों द्वारा उपेक्षित क्षेत्र अब प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र समझे जाने लगे हैं। इस प्रकार के क्षेत्र ये है : कृषि, लघु उद्योग, परिवहन परिचालक, फुटकर व्यापार एवं लघु व्यवसाय, व्यावसायिक निजी रोज़गार मे लगे लोग तथा शिक्षा इन क्षेत्रों को दिए गए ऋण जून 1969 में कुल बैंक साख का 146 प्रतिशत भाग थे। बैंको से कहा गया था कि मार्च 1979 के अंत तक ये अपने ऋणों का 333 प्रतिशत प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को देने का लक्ष्य रखें। अधिकांश बैंकों द्वारा यह लक्ष्य पूरा कर लिया गया। मार्च 1985 तक प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को कुल साख का 40 प्रतिशत देने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। वर्तमान मापदण्डों के अनुसार, सरकारी क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के बैंकों को पिछले वर्ष के 31 मार्च को उनके समायोजित निबल बैंक ऋण या तुलन पत्रेतर एक्सपोजर की ऋण समतुल्य राशि जो भी अधिक हो, का 40 प्रतिशत प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को देना होता है।
(च) ग्रामीण साख की व्यवस्था में सहयोग देने के उद्देश्य से वाणिज्यिक बैंकों ने ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विस्तार किया है तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक स्थापित किए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक ऋण देने के लक्ष्य भी निर्धारित किए गए है। एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत हिताधिकारियों को बैंको द्वारा वित्तीय सहायता दी गई है और उन्हें मियादी ऋण भी दिए गए है। 20 सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत हिताधिकारियों को बैंकों द्वारा दिए गए हैं।
(छ) माइक्रो, लघु तथा मध्यम उपक्रमों को ऋण में प्राथमिकता - माइक्रो, लघु तथा मध्यम उपक्रमों को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। 2012-13 में इन्हें पिछले वर्ष की तुलना में 29.8 प्रतिशत अधिक ऋण दिए गए। ये ऋण बैंको की निबल ऋण का 147 प्रतिशत भाग थे।
2012 में बैंको को निर्देश दिए गए कि वे रूग्ण इकाईयों की जाँच करे और उनके पुनुरूत्थान के उपाय करें बैकों से यह भी कहा गया है कि वे ऋणों का उपयोग कर निगरानी की व्यापक व्यवस्था करें।
(ज) अग्रणी बैंक योजना के अंतर्गत बैंकों को अलग-अलग जिले सौंपे गए है जिनमें उन्हें गहन अध्ययन तथा सर्वेक्षण के द्वारा बैंकिग विकास की स्थिति, साधनों एवं सम्भावनाओं का पता लगाना है और कमियों को दूर करने के उपाय ढूँढने है। इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र पर दृष्टि रखते हुए बैकों को क्षेत्रीय आर्थिक विकास के कार्यों के साथ संबद्ध किया गया है। लीड बैंक योजना प्रो. गाडगिल की अध्यक्षता में नियुक्त किए गए अध्ययन दल के सुझावों तथा अगस्त 1969 में रिजर्व बैंक द्वारा नियुक्त की गई नारीमन समिति की सिफारिशों पर आधारित है।
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