1969 के पश्चात् बैंकिंग विकास की स्थिति ,असफलताएँ - Status of Banking Development after 1969 Failures

1969 के पश्चात् बैंकिंग विकास की स्थिति ,असफलताएँ - Status of Banking Development after 1969 Failures


बैंक राष्ट्रीयकरण की उपर्युक्त उपलब्धियों के साथ-साथ कुछ असफलताएँ अथवा त्रुटिया भी सामने आयी है जिनका उल्लेख करना आवश्यक है। ये निम्नलिखित है। 


(क) शाखा विस्तार के बावजूद बैंकिंग विकास में क्षेत्रीय असमानताएँ बहुत अधिक है। जून 1969 में प्रति बैंक शाखा औसत जनसख्या 64,000 थी। राष्ट्रीयकरण के बाद के वर्षो में शाखा विस्तार के परिणामस्वरूप जून 1996 के अंत में औसन 13,000 जनसंख्या के लिए एक बैंक शाखा हो गई थी। परंतु असम, बिहार, मध्य प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, पश्चित बंगाल आदि अनेक राज्यों में प्रति बैंक शाखाओं में जनसंख्या राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है।


(ख) ग्रामीण शाखाओं का कार्य संतोषजनक नहीं है। सामान्यत वाणिज्यिक बैंकों को ग्रामीण शाखाएं तथा विशेषकर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की शाखाओं के कार्यालयों पर होने वाले व्यय के कारण अत्यधिक बोझ उठाना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें एक ओर तो बहुत अधिक संख्या में छोटे ऋण खातों की देखभाल करनी होती है तथा दूसरी ओर इन छोटे ऋणों पर रियायती ब्याज दरो के लागू होने के कारण ब्याज आमदनी कम होती है। ग्रामीण शाखाओं की कुल जमाराशियों कम है और उनकी जमाराशियों में चालू जमाराशियों का अनुपात बहुत ही कम है। परिणामस्वरूप इन शाखाओं को संसाधनों को जुटाने पर होने वाले व्यय के संदर्भ में अन्य शाखाओं की तुलना में अलाभकारी स्थिति में रख दिया है। अतिदेयों का दबाव दूषित वसूली की परिस्थतियों की ओर झुकाव की मात्रा को परिलक्षित करता है।


(ग) बैकों का ऋण जमा अनुपात असंतोषजनक है।

बैंकों के ऋण जमा अनुपात से पता चलता है कि बैंकों द्वारा जमाराशियों से प्राप्त साधनों का व्यावसायिक क्षेत्र में ऋण देने में कितना उपयोग किया जा रहा है। 1960-70 के दौरान औसत ऋण जमा अनुपात 778 प्रतिशत था । राष्ट्रीयकरण के बाद आरक्षित कोषों में वृद्धि के कारण 1970-80 तथा 1980-90 के दौरान गिरकर क्रमश: 72.4 तथा 648 प्रतिशत रह गया। 1990-98 के दौरान यह 557 प्रतिशत था । मार्च 2013 के अंत मे यह 790 प्रतिशत था।


(घ) बैकों की जमाराशि में वृद्धि की दर असंतोषजनक है। 1969 के बाद बैंकों की जमाराशियों में वृद्धि हुई है परंतु इसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। बैंक शाखाओं की संख्या में हुई विशाल वृद्धि तथा देश में मुद्रा पूर्ति एवं मौद्रिक आय मे लगातार वृद्धि को ध्यान में रखते हुए बैंको की जमाराशि में तीव्र गति से वृद्धि होनी चाहिए थी।

बैंकों की नई शाखाएं पर्याप्त मात्रा में जमाराशियाँ प्राप्त करने में अधिक सफलता नहीं प्राप्त कर पाई है। बैंकों की जमाराशियों का अधिकांश भाग नगरों तथा महानगरों से ही प्राप्त किया जाता है।


(ड) राष्ट्रीयकृत के बाद भी बैंकों के संगठन कार्य प्रणाली अथवा नीति में कोई विशेष परिवर्तन नही हुआ है। बैंक शाखाओं का विस्तार तथा कुछ विशेष वर्गो को बैंकिंग सुविधाएं देने का कार्य राष्ट्रीयकरण के बिना भी किया जा सकता था। बैक राष्ट्रीयकरण का मुख्य उद्देश्य जन साधारण की अल्प बचतों को प्राप्त करना और बैंकिंग सुविधाओं को उन तक पहुँचाना था। इन दिशाओं में अभी तक संतोषजनक सफलता नहीं मिली है। काश्तकार छोटे किसान तथा कारीगर तो बैंक तक पहुँच ही नहीं पाते है। बैंकों की ऋण नीति न तो रोजगार के अवसर बढ़ाने में अधिक सहायक हुई है और न ही दुर्बल वर्गों को पर्याप्त सहायता मिली है।


(च) पूँजी पर्याप्तता बनाए रखने कर समस्या- बैंकों के पूँजी पर्याप्तता निर्धारण के लिए जोखिम आस्ति भार प्रणाली अपनाई गई हैं। अक्टूबर 1998 में यह निर्णय किया गया है कि बैंकों द्वारा मार्च 2000 तक 9 प्रतिशत तथा मार्च 2002 तक 10 प्रतिशत का पूँजी पर्याप्तता अनुपात प्राप्त करे ।


(छ) बैंक ऋण की वृद्धि दर में कमी हुई है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के ऋणों और अग्रिमों की वृद्धि दर जो कि मार्च 2005 के अंत में 332 प्रतिशत की ऊँचाई पर थी, तब से मंद होती जा रही है। 2013-14 के अंत में कम होकर यह 14 प्रतिशत रह गई। बैंकों द्वारा उद्योग, व्यक्तिगत ऋण और सेवा क्षेत्र को दिये गये ऋण की वृद्धि दर में गिरावट हुई है।