तीसरी औद्योगिक नीति 1977 - Third Industrial Policy 1977
तीसरी औद्योगिक नीति 1977 - Third Industrial Policy 1977
23 दिसंबर, 1977 को जनता सरकार के तत्कालीन उद्योग मंत्री श्री जॉर्ज फर्नाण्डीज ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की।
नई नीति की आवश्यकता- 1956 की औद्योगिक नीति की सफलता संतोषजनक नहीं थी, क्योंकि-
(i) पिछले 10 वर्षो में राष्ट्रीय आय में लगभग 15 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हुई। यह वृद्धि अपर्याप्त थी।
(ii) बेरोजगारी बढ़ गई थी ।
(iii) गांव तथा शहरों के बीच असमानताएं बढ़ गई थी।
(iv) निवेश दर में स्थिरता सी आ गई थी।
(v) बीमार उद्योगों की समस्या जटिल हो गई थी।
(vi) आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण हो गया था।
(vii) बड़े औद्योगिक केंद्रों में उद्योगों का जमाव हो गया था।
नई औद्योगिक नीति के पहले की कमियों को दूर करने की दिशा में कार्य करने की व्यवस्था की गई ताकि समयबद्ध आर्थिक विकास कार्यक्रम के उद्देश्य को पूरा किया जा सके। विशेषताएं इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(क) लघु व कुटीर उद्योगों को विशेष महत्व:- 1977 की औद्योगिक नीति में लघु व कुटीर उद्योगों के विकास को सर्वाधिक महत्व दिया गया।
नई औद्योगिक नीति में 504 वस्तुएं लघु व कुटीर उद्योगों के लिए सुरक्षित रखी गई, जबकि अभी तक इन वस्तुओं की संख्या केवल 180 थी छोटे उद्योगों को कई तरह की रियायतों की घोषणा की गई। इन उद्योगों को गांवों में स्थापित किए जाने को प्रोत्साहन दिया गया। इन उद्योगों की सहायता के लिए प्रत्येक जिले में जिला उद्योग केन्द्र खोले गए।
बहुत छोटे क्षेत्र- लघु उद्योग क्षेत्र में से बहुत छोटे क्षेत्र को विशेष महत्व दिया गया। बहुत छोटा क्षेत्र वह है जिसमें किया गया निवेश एक लाख रूपये से कम है।
(ख) बड़े उद्योगों का क्षेत्र - यद्यपि इस नीति में छोटे उद्योगों को अधिक महत्व दिया गया, परंतु बड़े पैमाने के उद्योगों की भूमिका को स्पष्ट किया गया। बड़े उद्योगों का क्षेत्र निम्नलिखित चार वर्गों में बांटा गया
(i) आधारभूत उद्योग जैसे इस्पात, अलौह धातुएं, सीमेंट, तेलशोधक कारखाने आदि जो लघु व कुटीर उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक है।
(ii) पूँजीगत उद्योग - जिसमें लघु व कुटीर उद्योगों को मशीनरी मिल सके।
(iii) उच्च तकनीक वाले उद्योग-जैसे खाद, कीटाणुनाशक दवाइयां, पेट्रो-केमिकल्स आदि ।
(iv) अन्य उद्योग जो विकास के लिए आवश्यक हो तथा लघु क्षेत्र के लिए सुरक्षित नहीं है।
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका:- इस नीति में स्पष्ट किया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बढ़ती हुई होगी। इस क्षेत्र का उपयोग न केवल आधारभूत उद्योगों के लिए किया जाएगा, वरन उपयोग वस्तुओं के उत्पादन में भी किया जाएगा ताकि उपभोक्ताओं को आवश्यक वस्तुएं उचित कीमतों पर उपलब्ध हो सके।
(घ) देशी व विदेशी तकनीक इस नीति में स्पष्ट किया गया कि जहां तक संभव हो सके, भविष्य में औद्योगिक विकास देशी तकनीक पर ही आधारित होगी। विदेशी तकनीक का प्रयोग उन उद्योगों के लिए रखा जाएगा जहां भारतीय तकनीक अभी विकसित नही हो पाई है।
(ङ) विदेशी पूंजी :- विद्यमान विदेशी कंपनियों पर विदेशी विनिमय को कठोरता से लागू किया जाएगा। विदेशी विनियोग व तकनीक की अनुमति उन्हीं शर्तों पर दी जाएगी जो राष्ट्रीय हित में हो ।
(च) बड़े औद्योगिक घराने:- इस नीति में कहा गया कि बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा अपने उद्योगों के विस्तार एवं नई इकाइयों की स्थापना को एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार अधिनियम द्वारा ही अनुमति दी जाएगी। बड़े घरानों को अपने उद्योग के लिए स्वयं के साधनों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा
(छ) संयुक्त उपक्रम - भारतीय उद्योगपतियों द्वारा विदेशों में जो संयुक्त उपक्रम स्थापित किए जाएंगे, वे मुख्य रूप से तकनीकी जानकारी और प्रबंधकीय योग्यता पर ही आधारित होंगे, क्योंकि भारत में पूंजी का निर्यात न तो संभव ही है और न ही उचित ।
(ज) पिछड़े क्षेत्रों का विकास नई औद्योगिक नीति में पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर बल देते हुए क्षेत्रीय असंतुलन को कम करने की बात कही गई। ग्रामीण भारत में आवश्यकता इस बात की है कि गावों में अधिकाधिक विकास किया जाए। इस नीति के अनुसार जिन शहरों एवं कस्बों की आबादी 5 लाख से कम है, उनमें लघु व कुटीर उद्योगों का विकास किया जाएगा।
(झ) लाइसेंसिंग नीति को सरल बनाना सरकार ऐसे तरीके अपनाएगी जिससे उद्योगों को लाइसेंस देने का कार्य सरल हो सके।
(ञ) बीमार मिलें - इस नीति में कहा गया है कि सरकार भविष्य में बीमार मिलों की उचित देखभाल के बाद ही अपने अधिकार में लेगी।
(ट) प्रबंध में श्रमिक की भागीदारी इस संबंध में सरकार की नीति यह होगी कि सरकार ऐसे उपायों को विकसित करेगी, जिससे कर्मचारियों में अपने उपक्रम के संचालन के प्रति लगाव उत्पन्न हो सके। इसके लिए सरकार को अंश पूजी में श्रमिक-भागिता, शॉप फ्लोर से लेकर बोर्ड स्तर तक निर्णय लेने में श्रमिकों के सहयोग की नीति पर जोर देगी।
(ठ) खादी एवं ग्राम उद्योग इस नीति में कहा गया है कि सरकार खादी कार्यक्रम के संबंध एवं इसके विपणन में सहायता देने के लिए वचनबद्ध है। सरकार यह भी प्रयास करेगी कि खादी व ग्राम उद्योगों को संगठित उद्योगों की प्रतिस्पर्धा का सामना न करना पड़े।
(ड) मूल्य नीति मूल्य नीति के संबंध में सरकार उद्योगों को इस बात की अनुमति नहीं देगी किं वे अपनी क्षमता से कम कार्य पर अधिक लाभ उठाए,
परंतु जिन उद्योगों में मूल्य नियंत्रण है वहां नियंत्रित मूल्यों में उद्यमियों को पर्याप्त लाभ दिलाने के प्रयत्न किए जाएंगे।
(ढ) विदेशी व्यापार- उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों के विकास के लिए आयात के उदारीकरण की नीति अपनाई जाएगी। निर्यातों को बढावा दिया जाएगा। आत्म निर्भरता के उद्देश्य की प्राप्ति की जाएगी।
नीति की आलोचनात्मक समीक्षा
इस नीति के संबंध में भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखी गई। कुछ लोगों ने इस नीति का समर्थन किया जबकि कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की। इस नीति के समर्थकों का कहना है कि इस नीति से (i) पिछड़े क्षेत्रों का विकास होगा।
(ii) भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुकूल कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास होगा। (iii) बड़े घरानों पर प्रतिबंध लगाने से एकाधिकारी प्रवृत्ति समाप्त होगी ।
(iv) यह नीति अधिक स्पष्ट, विस्तृत एवं व्यावहारिक है।
लेकिन कुछ लोगों ने इस नीति की आलोचना इस प्रकार की है-
(i) जनता सरकार एक बिल्कुल नई नीति का निर्माण नहीं कर सकी।
(ii) बड़े उद्योगों के विस्तार पर प्रतिबंध लगाने से देश में वस्तुओं का अभाव होगा।
(iii) नई नीति में देश में शक्ति की कमी के विषय मे कुछ नहीं कहा है।
(iv) वर्तमान औद्योगिक झगड़ों को कम करने के विषय में कोई नए सुझाव नहीं दिए गए।
(v) बड़े औद्योगिक घरानों पर प्रतिबंध लगाना भी राष्ट्र हित में नहीं होगा, क्योंकि ये व्यक्ति प्रबंधकीय योग्यता में निपुण होते हैं।
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