चौथी औद्योगिक नीति, 1980 - Fourth Industrial Policy
चौथी औद्योगिक नीति, 1980 - Fourth Industrial Policy
24 जुलाई, 1980 को सरकार द्वारा चौथी औद्योगिक नीति की घोषणा की गई। औद्योगिक नीति का निर्णय औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 के आधार पर किया गया। इस नीति की प्रमुख विशेषताएं या लक्ष्य निम्नलिखित थे -
(i) उद्योगों की वर्तमान उत्पादन क्षमता का अधिकतम संभव उपयोग करना,
(ii) उद्योगों की उत्पादकता एवं क्षमता बढ़ाना।
(iii) अर्थव्यवस्था में अधिकतम संभव रोजगार के अवसर उत्पन्न करना,
(iv) एकाधिकार और आर्थिक केंद्रीकरण का विरोध करना
विशेषताएं
(क) पूंजी सीमा में वृद्धि सूक्ष्म इकाइयों की पूंजी सीमा एक लाख रूपये से बढ़कर दो लाख रूपये, लघु उद्योगो की सीमा दस लाख रूपये से बढ़ाकर बीस लाख रूपये तथा सहायक इकाइयों की सीमा 25 लाख रूपये तक कर दी गई।
(ख) अधिक उत्पादन की अनुमति-कुछ विशेष उद्योगों को लाइसेंस में अंकित उत्पादन सीमा से अधिक उत्पादन की अनुमति दी गई।
(ग) आवश्यकताओं के अनुसार उद्योग: देश के प्रत्येक जिले में स्थानीय आवश्यकताओं और संसाधनों के अनुकूल कुछ बड़े उद्योग स्थापित किए, ताकि इन उद्योगों के आधार पर छोटे और सहायक उद्योग पनप सके।
(घ) छोटे और बड़े उद्योगों में विभाजन नहीं सरकार सक्षम, लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों के बीच कोई कृत्रिम विभाजन नहीं करेगी। सभी श्रेणियों के बीच आदान-प्रदान और विकास की संभावनाएं खुली रहने दी जाएगी।
(ङ) राष्ट्रीयकरण का भय नहीं - बीमार उद्योगों को केवल अत्यधिक कठिनाई के सदर्भ में ही राष्ट्रीयकृत करने का निर्णय लिया जाएगा। कमजोर उद्योगों को बीमार होने से बचाने के लिए सरकार समय-समय पर जरूरी सूचना एकत्रित करती रहेगी।
(च) प्रबंध में सुधार - सार्वजनिक उपक्रमों का कामकाज ठीक करने के लिए सरकार आवश्यक कदम उठाएगी जिनका प्रबंध सुधारने के लिए सरकार वित्त,
तकनीकी प्रबंध तथा औद्योगिक संबंधों के क्षेत्र में कुशल और योग्य व्यक्तियों का कैडर बनाने की दिशा में कदम उठाएगी।
(छ) निर्यात को प्रोत्साहन सारा उत्पादन निर्यात करने वाले उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। - इसके अलावा उत्पादन बढाकर अतिरिक्त उत्पादन निर्यात करने की भी अनुमति दी जाएगी। (ज) आधुनिक तकनीक का प्रयोगः- सरकार उन उद्योगों को आधुनिक तकनीक अपनाने को कहेंगी जिनसे देश के निर्यातों में वृद्धि हो सके। आधुनिक तकनीक अपनाने से वस्तुओं की किस्म में सुधार होगा तथा उत्पादन लागत गिरेगी।
(झ) लाइसेंसिंग प्रणाली- औद्योगिक लाइसेंस का तरीका सरल किया जाएगा। (ञ) अच्छे औद्योगिक सम्बन्ध-अच्छे औद्योगिक संबंधों की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसके
लिए त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन किए जाएंगे। (ट) बीमार मिलें - सरकार ऐसी बीमार मिलों को जिनके सुधार की संभावना हो, स्वस्थ मिलों के साथ विलय की अनुमति देगी।
टूल बाक्स - 07
(ठ) उद्योगों का सामाजिक दायित्व:- उद्योगों को अपना सामाजिक दायित्व निभाना होगा। अर्थात
उन्हें मूल्य वृद्धि और जमाखोरी को रोकने के लिए प्रयत्नशील रहना होगा।
(ड) संतुलित क्षेत्रीय विकास- बड़े शहरों में जहां पहले ही उद्योग स्थापित है वहां नए उद्योग स्थापित नहीं किए जाएंगे।
ऐसे क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना की जाएगी जहां उद्योगों का अभाव होगा। इस प्रकार क्षेत्रीय संतुलन किया जाएगा।
आलोचना
यद्यपि नई औद्योगिक नीति में अधिक उन्नति व विकास की संभावनाएं निहित है फिर भी यह दोषरहित नहीं है। इस नीति की प्रमुख आलोचनाएं निम्नलिखित हैं:
(क) आधारभूत परिवर्तन का अभाव- इस नीति में कोई आधारभूत परिवर्तन नज़र नहीं आता। इसका आधार 1956 की नीति ही है।
(ख) स्पष्ट दिशा-निर्देश का अभाव यह नीति स्पष्ट नहीं है। इसमें यह नहीं बतलाया गया कि - क्या उत्पादन किया जाना है और किसके लिए किया जाना है।
(ग) विदेशी पूंजी की अवहेलना- इसमें औद्योगिक विकास के लिए विदेशी पूंजी के योगदान की अवहेलना की गई है।
(घ) आधारभूत संरचना की उपेक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर, जैसे शक्ति, सिंचाई, यातायात आदि के विकास के लिए पर्याप्त निवेश की व्यवस्था नहीं की गई।
(ङ) मूल वस्तुओं की अपर्याप्त पूर्ति देश में पाई जाने वाली आधारभूत वस्तुओं, जैसे- सीमेंट, इस्पात, कोयले आदि की पूर्ति में वृद्धि करने के लिए कोई ठोस नीति प्रस्तुत नहीं की गई।
(च) निजी क्षेत्र के पक्ष में इस नवीन नीति का झुकाव निजी क्षेत्र के पक्ष में है।
इसमें निजी क्षेत्र के स्वत विकास की सुविधा की गई है। अनाधिकृत अतिरिक्त क्षमता को नियमित करने की बात कही गई है। उनमें निवेश सीमा को बढ़ाने, राष्ट्रीयकरण के भय से मुक्ति व निर्यातोन्मुख उत्पादन को प्रोत्साहन देने व मितव्ययिता के लिए तकनीकी विकास आदि की सुविधा भी निजी क्षेत्र को दी गई है।
(छ) लाइसेंसिंग नियमों के उल्लघन को प्रोत्साहन नवीन नीति में अनाधिकृत अतिरिक्त क्षमता को नियमित करने की बात कही गई है। इससे नियमों के उल्लघन को प्रोत्साहन मिलेगा व एकाधिकारी प्रवृत्ति को बल मिलेगा।
(ज) पूंजी गहन उद्योग नवीन नीति में उन्नत तकनीक अपनाने की अनुमति देने की बात कही गई है।
इससे पूंजी गहन उद्योगों की ओर झुकाव बढ़ेगा जिसका प्रभाव रोजगार पर पड़ेगा ।
(झ) राजनीति पर आधारित यद्यपि यह नीति व्यावहारिक है, लेकिन फिर भी इसे राजनीति से प्रेरित या राजनीतिक पर आधारित बताया जाता है।
संक्षेप में, यह नीति व्यावहारिक व सामाजिक है। उत्पादन क्षमता का पूरा-पूरा उपयोग व नियमित करने से भावी बचतों का विकास होगा। आय उत्पादन व रोजगार भी बढ़ेगा। निर्यातोन्मुख उद्योगों के विकास से विदेशी असंतुलन में कमी होगी। उन्नत तकनीक अपनाने से न केवल लागत में मितव्ययताएं ही मिलेंगी, बल्कि वस्तु की क्वालिटी में भी सुधार होगा। जिससे टूट-फूट कम होगी। गरीबी मिटाने या कम करने में भी सहायता मिलेगी अर्थव्यवस्था में भी सुधार होगा।
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