भारत के आर्थिक वातावरण का इतिहास (सन 1990 ) तक - History of India's Economic Environment (up to 1990)
भारत के आर्थिक वातावरण का इतिहास (सन 1990 ) तक - History of India's Economic Environment (up to 1990)
(1) सन 1951 से 1990 तक का आर्थिक वातावरण
(2) सन 1991 से नवीन आर्थिक नीति का सूत्रपात एवं उसका व्यवसाय व उद्योग पर प्रभाव
(क) उदारीकरण
(ख) निजीकरण
(ग) वैश्वीकरण
सन 1991 से भारत सरकार द्वारा आर्थिक नीति में सुधार किए गए प्रमुख सुधार - (1) नई औद्योगिक नीति, (2) नई व्यापार नीति, (3) नई राजकोषीय नीति, (4) नई मौद्रिक नीति, (5) नई निवेश नीति (6) पूंजी बाजार सुधार (7) अनुदान एवं मूल्य नियंत्रण । ऐतिहासिक रूप से
भारत एक बहुत विकसित आर्थिक व्यवस्था थी, जिसके विश्व के अन्य भागों के साथ मजबूत व्यापारिक संबंध थे। औपनिवेशित युग (1773-1947) के दौरान अंग्रेज भारत से सस्ती दरों पर कच्ची सामग्री खरीदा करते थे और तैयार माल भारतीय बाजारों में सामान्य मूल्य से कहीं अधिक उच्चतर कीमत पर बेचा जाता था, जिसके परिणामस्वरूप स्त्रोतों का द्विमार्गी हास होता था। इस अवधि के दौरान विश्व की आय में भारत का हिस्सा 1700 ईस्वी के 22.3 प्रतिशत से गिरकर 1952 में 3.8 प्रतिशत रह गया। 1947 में भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अर्थव्यवस्था की पुनर्निर्माण प्रक्रिया प्रारंभी हुई। इस उद्देश्य से विभिन्न नीतियां और योजनाएं बनाई गई और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कार्यान्वित की गई।
1950 में जब भारत की 3.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर ली थी तो कई अर्थशास्त्रियों ने इसे ब्रिटिश राज के अंतिम 50 सालों की विकास दर से तिगुना हो जाने का जश्न मनाया था।
समाजवादियों ने इसे भारत की आर्थिक नीतियों की जीत करार दिया था, वे नीतियां जो अंतमुख थी और सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों के वर्चस्व वाली थी। हालांकि 1960 के दशक में ईस्ट इंडियन टाइगरों ने भारत से दोगुनी विकास दर हासिल कर ली थी। जो इस बात का प्रमाण थी कि उनकी बाह्यमुखी और निजी क्षेत्र को प्राथमिकता देने वाली आर्थिक नीतिया बेहतर थीं। ऐसे में भारत के पास 80 मे दशक की बजाज एक दशक पहले 1971 में ही आर्थिक सुधारों को अपनाने के लिए एक अच्छा उदाहरण मिल चुका था।
भारत में 1980 तक जीएनपी की विकास दर कम थी, लेकिन 1981 में आर्थिक सुधारों के शुरू होने के साथ ही इसने गति पकड़ ली थी। 1991 में सुधार पूरी तरह से लागू होने के बाद तो यह मजबूत हो गई थी।
1950 से 1980 के तीन दशको में जीएनपी की विकास दर केवल 149 प्रतिशत थी। इस कालखंड में सरकारी नीतियों का आधार समाजवाद था। आयकर की दर में 9775 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई। कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। सरकार ने अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह से नियंत्रण के प्रयास और अधिक तेज कर दिए थे। 1980 के दशक में हलके से आर्थिक उदारवाद ने प्रति व्यक्ति जीएनपी की विकास दर को बढ़ाकर प्रतिवर्ष 2.89 कर दिया। 1990 के दशक में अच्छे खासे आर्थिक उदारवाद के बाद तो प्रति व्यक्ति जीएनपी बढ़कर 4.19 प्रतिशत तक पहुंच गई। 2001 मे यह 6.78 प्रतिशत तक पहुच गई।
1991 में भारत सरकार ने महत्वपूर्ण आर्थिक सुधार प्रस्तुत किए जो इस दृष्टि से वृहद प्रयास थे कि इनमें विदेश व्यापार उदारीकरण, वितीय उदारीकरण कर सुधार और विदेशी निवेश के प्रति आग्रह शामिल थी। इन उपायों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद की। तब से भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत आगे निकल आई है। सकल स्वदेशी उत्पाद की औसत वृद्धि दर जो 1951-91 के दौरान 4.34 प्रतिशत थी, 1991-2011 के दौरान 6.24 प्रतिशत के रूप में बढ़ गई। 2015 में भारतीय अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन अमेरिकी डालर से आगे निकल गई।
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