अग्रिम विनिमय - advance exchange

अग्रिम विनिमय - advance exchange


विदेशी विनिमय दर दो प्रकार की हो सकती है- वर्तमान अथवा हाजिर दर तथा अग्रिम दर अभी तक हमने हाजिर दर से सम्बन्धित समस्याओं का ही अध्ययन किया है। अपरिवर्तनीय पत्र मुद्रा प्रणाली के अंतर्गत विनिमय दर में निरन्तर उतार-चढ़ाव होते रहते है जिससे विदेशी व्यापार में अनिश्चितता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यापारियों को हानि होने का सदा भय बना रहता है तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रूकावट पड़ने लगती हैं। इस प्रकार की अनिश्चितता तथा जोखिम से बचने के लिए व्यापारी अग्रिम विनिमय अथवा अग्रिम सौदे कर लेते है, जिनके अन्तर्गत विदेशी मुद्राओं के कय-विक्रय का किसी भविष्य की तिथि के लिए सौदा वर्तमान में ही कर लिया जाता है जब कोई आयात अथवा निर्यातकर्ता भविष्य में विदेशों से माल खरीदने अथवा बेचने का सौदा करता है तो इसके साथ ही वह पेशबन्दी संविदा भी कर लेता है जिसके अधीन वह वर्तमान विनिमय दर पर किसी भावी तिथि में विदेशी विनिमय के कय विक्रय का सौदा कर लेता है।

इससे वह स्वयं को भविष्य में होने वाले विनिमय दर के परिवर्तन से सुरक्षित कर लेता है। इस प्रकार के सौदों के द्वारा आयातकर्ता को भुगतान के लिए विदेशी विनिमय पूर्व निश्चित दर पर प्राप्त हो जाता है और निर्यातकर्ता को भुगतान के प्राप्त विदेशी विनिमय पूर्व निश्चित दर पर बिक जाता है।


अग्रिम विनिमय दर तथा हाजिर दर में प्रायः घनिष्ठ संबंध होता है क्योकि अग्रिम दर हाजिर दर पर ही आधारित होती है अग्रिम दर का निर्धारण करते समय चूंकि भविष्य में विदेशी विनिमय की मांग तथा पूर्ति को ध्यान में रखा जाता है इसलिए विदेशों की बैंक दर ब्याज की अल्पकालीन दर, मुद्रा नीति, व्यापारिक प्रतिबंध, नियन्त्रण तथा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां आदि ध्यान में रखते हुए अग्रिम दर वर्तमान दर से कुछ ऊंची या कुछ नीची हो सकती है। डालर की अग्रिम दर वर्तमान की तुलना में ऊंची होने पर अन्य मुद्रा के लिए डालर अधिमूल्य पद होता है और डालर की अग्रिम दर नीचे होने पर डालर कटौती पर होता है।


अग्रिम सौदों के द्वारा व्यापारी तो जोखिम तथा अनिश्चितता से बच जाते है, परन्तु ऐसा सन्देह होने पर लगता है कि बैंकों को बहुत बड़ा जोखिम उठाना पड़ता है वास्तविक स्थिति यह है कि बैंको को इन सौदों से काफी लाभ होता है वे विदेशी विनिमय के अग्रिम सौदों के लिए केताओं तथा विक्रेताओं से शुल्क प्राप्त कर लेते हैं और अग्रिम विकय को अग्रिम कय से सन्तुलित करके अपने आप को तटस्य कर होते है भविष्य के लिए कय-विकय दोनों ही करने में एक सौदे की हानि को दूसरे के लाभ से पूरा कर लिया जाता है। बैंकों द्वारा सौदों के पलटने के परिणामस्वरूप जो अग्रिम कय विकय में मिलाप कर लिया जाता है उसे मेरिंग ट्रांससेक्सन कहते है इस कार्य में बैंकों को सटोरियों से बहुत सहायता मिलती है। कुछ अग्रिम सौदों का मिलाप न होने की दशा में बैंक यह निश्चित राशि या तो सम्बन्धित देश के किसी बैंक में जमा कर देते है अथवा वहां की सरकारी प्रतिभूतियों में विनियोजित कर देते है। चूंकि अग्रिम दर निर्धारित करते समय विदेशी ब्याज की दर को ध्यान में रखा जाता है, इसलिए बैंको द्वारा इस प्रकार की व्यवस्था पहले से ही कर ली जाती है

कि उन्हें विदेशों में जमा अथवा निवेशित राशियों पर ब्याज की कोई हानि न होने पाये। प्रायः दो देशों की ब्याज दरों में जितना अधिक अंतर होगा अग्रिम दरों पर उतनी ही अधिक तेजी या बड़ा होगा।


वैसे तो प्रथम महायुद्ध से बहुत पहले जर्मनी तथा इटली में अग्रिम विनिमय बाजार का विकास हो चुका था, अमेरिका तथा इंग्लैंड में अग्रिम बाजारों का विकास बाद में हुआ। इस प्रकार के बाजार के लिए एक विकसित बँकिंग व्यवस्था के अतिरिक्त विश्वास की भावना का होना आवश्यक होता है। 1931 में स्वर्णमान के पतन से विश्वास को आघात पहुंचा जिससे अग्रिम बाजार ठप्प पड़ गये। वर्तमान अग्रिम विनिमय बाजारों का विकास वर्तमान विदेशी विनिमय बाजारों के साथ-साथ हुआ है, परन्तु कुछ देशों में इनका इस आधार पर विरोध किया जाता है कि यह एक प्रकार की सद्रेबाजी ही हैं।


वास्तविकता यह है कि स्वतंत्र विदेशी विनिमय का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसके द्वारा भावी विनिमय दरों से सम्बन्धित अनिश्चितता नहीं रहती। साथ ही विनिमय दरों में होने वाले परिवर्तन अधिक नियन्त्रित हो जाते है, क्योंकि अग्रिम दर कधी होते ही इसके और ऊपर जाने की सम्भावना से अग्रिम सौदों की संख्या बढ़ जाती है, जिसके फलस्वरूप हाजिर दर भी ऊंची हो जाती है तथा अग्रिम दर और हाजिर दर में अधिक अन्तर नहीं रहता। अनिश्चितता व अभाव में विदेशी पूंजी आकर्षित होती है तथा अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह को गति मिलती है।