समग्र माँग , समग्र माँग के निर्धारक तत्व - Aggregate Demand Determinants of Aggregate Demand
समग्र माँग , समग्र माँग के निर्धारक तत्व - Aggregate Demand Determinants of Aggregate Demand
यह उन विभिन्न मौद्रिक राशियों की सूची है जो एक अर्थव्यवस्था के सभी उद्यमी मिलकर रोजगार के विभिन्न स्तरों पर अपनी वस्तुओं के विक्रय से प्राप्ति की आशा रखते हैं। समग्र मांग तकनीकी तत्वों के स्थान पर मनोवैज्ञानिक तत्वों पर अधिक निर्भर करती है। दुसरे दृष्टिकोण से समग्र माँग द्वारा यह ज्ञात होता है कि उत्पादन की विभिन्न मात्राओं पर उपभोक्ता कितनी संभावित राशी व्यय कर सकता है ।
उपर्युक्त समग्र माँग सूची का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि,
• रोजगार के स्तर में वृद्धि के साथ समग्र मांग में वृद्धि होती है तथा रोजगार में कमी आने पर समग्र मांग में भी कमी आती है।
• रोजगार के स्तर तथा समग्र माँग में धनात्मक सह संबंध है
• समग्र माँग अनुसूची रोजगार के वृद्धिमान नियम की क्रियाशीलता को बताती है ।
समग्र माँग के निर्धारक तत्व
माँग उपभोक्ता तथा उत्पादक के मनोवैज्ञानिक स्थिति पर निर्भर करता है समग्र समग्र पूर्ती तो अल्पकाल में स्थिर ही रहती हैअतः देश की अर्थव्यवस्था में रोजगार की मात्रा समग्र माँग में हुई वृद्धि अथवा कमी पर निर्भर है। समग्र माँग के निर्धारक तत्व निम्न हैं:
11. उपभोग क्रिया एक देश की अर्थव्यवस्था में उपभोग की मात्रा समाज के व्यक्तिगत सदस्यों के उपभोग संबंधी निर्णय पर आधारित है। उपभोग क्रिया को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व व्यय योग्य आय है। आय में वृद्धि से उपभोग की प्रवृत्ति भी बढती है तथा आय में कमी होने पर उपभोग प्रवृत्ति में कमी आती है ।
1. अल्पकाल में उपभोग प्रवृत्ति में कोई विशेष अंतर नहीं आता है लेकिन दीर्घ काल में परिवर्तन संभव है ।
2. आय का पुनर्वितरण धनवान व्यक्तियों की तुलना में गरीब व्यक्तियों की उपभोग प्रवृत्ति ज्यादा होती हैकी और आय पुनर्वितरण किया जाय तो कुल उपभोग अतः धनवानों से गरीबों प्रवृत्ति में वृद्धि होगी। यह कार्य निम्न तरीकों से संभव है :
• गरीब व्यक्तियों की उत्पादकता बढाई जाय उन्हें रोजगार के अधिक अवसर दिये जाय ।
• धनवानों पर प्रगतिशील कर लगाया जाय तथा इस धन को गरीबों की सहायता एवं कल्याण पर खर्च किया जाय ।
• गरीबों को कम मूल्य पर वस्तुएँ उपलब्ध कराई जाय उन्हें विभिन्न तरह के अनुदान दिये जाये।
3. सुसंगठित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था यदि देश की अर्थव्यवस्था में सुसंगठित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था अपनाया जाता है तो उपभोग प्रवृत्ति में वृद्धि होती है । इसके लिए निम्न तारीकी अपनाये जाते हैं:
• बेरोजगारी बीमा
• स्वास्थ्य एवं चिकित्सा भत्ता
• दुर्घटना बीमा
• वृद्धावस्था पेंशन
• बेरोजगारी भत्ता
4. विज्ञापन एक अच्छीवैज्ञानिक तथा प्रतिस्पर्धात्मक वैज्ञानिक नीति से अर्थव्यवस्था के उपभोग में वृद्धि होती है।
5. मजदूरी की दरों में वृद्धि द्वारा मजदूरों को सीमान्त उत्पादकता बढाकर यदि मजदूरी में वृद्धि की जाती है तो इससे रोजगार में वृद्धि होती है
6. परिवहन एवं संचार साधनों में वृद्धि करके परिवहन एवं संचार के साधनों में वृद्धि से बाजार की अपूर्णताएँ दूर हो जाती है। परिवहन लागतों में कमी आने से वास्तु का मूल्य्घत्ता है तथा उपभोग की मात्र में वृद्धि होती है
7. बैंकिंग एवं साख सुविधाओं में वृद्धि बैंकिंग एवं साख सुविधाओं के विस्तार से उपभोग प्रवृत्ति में वृद्धि होती है
8. शहरीकरण को प्रोत्साहन ग्रामीण उपभोक्ता की तुलना में शहर के उपभोक्ताओं में उपभोग प्रवृत्ति अधिक होती हैअतः जनसँख्या को गाँव से सहरों में भेजना चाहिए ।
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