बैंक की निवेश नीति , सिद्धांत - Bank's Investment Policy Principles
बैंक की निवेश नीति , सिद्धांत - Bank's Investment Policy Principles
विभिन्न साधनों से प्राप्त पूँजी बैंक के पास बेकार नहीं पड़ी रहती, बल्कि उसके निवेश द्वारा बैंक लाभ कमाता है। बैंक द्वारा किए गए कुछ निवेश अलाभप्रद भी होते हैं, परंतु बैंक की स्थापना का प्रधान उद्देश्य तो पूँजी के निवेश द्वारा लाभ कमाना ही होता है। विभिन्न देशों में आर्थिक परिस्थितियाँ तथा बाजार की दशाएँ अलग-अलग होने के कारण वहाँ बैंकों के निवेश की नीतियाँ भी अलग-अलग होती है। बैंको की निवेश नीति क्या हो, इस संबंध में कोई निश्चित नियम नहीं बनाए जा सकते। फिर भी बैंक को निवेश नीति निश्चित करते समय बडी सावधानी से काम लेना चाहिए।
निवेश नीति का सिद्धांत
सामान्यतः निम्नलिखित सिद्धांतों के आधार पर पूँजी का निवेश करने से बैंक सुरक्षित रूप से लाभ कमाने में समर्थ को सकते हैं:
(1) निधि की सुरक्षा - निवेश करने समय बैंक का उद्देश्य सुरक्षा सर्वप्रथम होना चाहिए, क्योंकि निवेश के सुरक्षित न रहने पर स्वयं बैंक का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। निवेश की सुरक्षा के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है जैसे- (1) बैंक को अपना समस्त धन किसी एक ही व्यक्ति अथवा व्यवसाय को ऋण के रूप में नहीं देना चाहिए। (2) बैंक को यथासंभव दीर्घकालीन ऋण नही देने चाहिए। (3) ऋणी द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली जमानत की भली-भाँति जांच कर लेनी चाहिए और यह देख लेना चाहिए कि जमानत का बाजार मूल्य ऋण के मूल्य से अधिक है अथवा नहीं, (4) ऋणी के व्यक्तिगत आचरण तथा चरित्र के विषय में सूचना प्राप्त कर लेनी चाहिए तथा (5) बैंकों को चाहिए कि वे सस्ती साख नीति न अपनाए ताकि ऋणियों में अपव्यय की भावना उत्पन्न न होने पाए।
(2) तरलता - तरलता से अभिप्राय जमा के बदले में नकद मुद्रा देने की क्षमता से है।
बैक का अस्तित्व जनता के विश्वास पर निर्भर करता है और जनता का विश्वास इस बात पर आधारित रहता है कि बैंक में जमाराशि को नकद मुद्रा में परिवर्तित करने की क्षमता सदा होगी। तरलता की दृष्टि से ये बातें आवश्यक है - (1) बैंक का सर्वाधिक तरल साधन नकद कोष है, इसलिए साधारणतः अपनी कुल जमाओं का 20 से 25 प्रतिशत तक बैंक अपने पास नकदी के रूप में रखना चाहिए। (2) बैंक को चाहिए कि उन साधनों में निवेश करे, जिसमें बिना क्षति के स्थानापरिवर्ती साध्यता का गुण हो जैसे बैंक के अभियोचित एवं अल्पकालीन ऋण तथा अल्पकालीन सरकारी प्रतिभूतियों एवं उच्चकोटि के वाणिज्यिक पत्र जैसे अंश व ऋणपत्र आदि, (3) बैंक को केवल उन्हीं सरकारी प्रतिभूतियों तथा उच्चकोटि के व्यावसायिक पत्रों में निवेश करना चाहिए जो कुछ आवश्यक शर्तों की पूर्ति करते हैं तथा केंद्रीय बैंक द्वारा पुनः कटौती के लिए स्वीकार किए जा सकते है, ताकि सकट की स्थिति में बैंकों के द्वारा केंद्रीय बैंक की अंतिम सहायता के रूप में सहायता प्राप्त की जा सके।
स्टीड के अनुसार, "बैंक को केवल कार्यशील पूँजी की पूर्ति के लिए ही ऋण देना चाहिए, अचल या स्थायी पूँजी बनाने के लिए नहीं । "
(3) लाभदायकता:- चूँकि बैंक का उद्देश्य अपने निवेश द्वारा लाभ कमाना होता है, इसलिए बैंक को अपने धन का इस प्रकार निवेश करना चाहिए कि उसे नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में लाभ प्राप्त होता रहे। इस संबंध में ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्राय तरलता तथा लाभदायकता दोनों एक दूसरे से विपरीत होते हैं। नकद कोष पूर्णत तरल साधन हैं परंतु इससे कोई आय प्राप्त नहीं होती। दूसरी ओर दीर्घकालीन ऋण तथा अग्रिम अधिक लाभदायक होते है, परंतु तरल नहीं होते।
( 4 ) जोखिम का विभिन्नीकरण - बैंकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके अधिकाश घन का निवेश एक ही प्रकार के ऋणों,
व्यवसायों तथा प्रतिभूतियों में न हो। बैंकों को अपना धन विविध प्रकार के ऋणों अथवा व्यवसायों आदि में लगाना चाहिए ताकि एक ओर ही हानि को दूसरी ओर के लाभ से पूरा किया जा सके। इनके अतिरिक्त जैसा पहले कहा गया है समस्त ॠण एक ही व्यक्ति अथवा फर्म को देने के बजाय अनेक व्यक्तियों तथा फर्मों को छोटे-छोटे ऋण देना अधिक अच्छा होता है।
(5) प्रतिभूतियों की विक्रेयता- सुरक्षा तथा तरलता की दृष्टि से ऐसी प्रतिभूतियों में निवेश करना अच्छा होता है जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर आसानी से बाजार में बेचा जा सके। सरकारी तथा उत्तम श्रेणी की व्यावसायिक प्रतिभूतियों, अच्छी कंपनियों के अशो तथा ऋणपत्रो, विनिमयसाध्य साख पत्रों तथा तैयार माल की जमानत पर ऋण देने से बैंकों द्वारा निवेश करना अच्छा होता है। इसके विपरीत, अचल संपति के आधार पर दिया गया ऋण अच्छा नहीं माना जा सकता है। (6) अन्य सिद्धांत - बैंकों को निवेश करने समय यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि (1) यथासंभव निवेश ऐसी प्रतिभूतियों अथवा वस्तुओं में किया जाय जिनकी कीमतों में अपेक्षाकृत अधिक स्थिरता रहती है। (2) यथासंभव ऐसी प्रतिभूतियों में निवेश को प्राथमिकता दी जाय जो आय कर से मुक्त हो, अथवा जिन पर कर कम लगता हो । (3) बैंकों को अपनी निवेश नीति सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित नियमों के आधार पर तय करनी चाहिए।
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