नीतियों के निर्धारण के चरण - Benefits of HR Policies

नीतियों के निर्धारण के चरण - Benefits of HR Policies


नीतियाँ स्थायी तथा दीर्घकालीन होती हैं, अतः आवश्यकता इस बात की होती है कि नीतियाँ का निर्धारण विचार-विमर्श के पश्चात किया जाना चाहिए। विचार-विमर्श की प्रक्रिया सतत चलने वाली प्रक्रिया है। एक बार नीति निर्धारण हो जाने के पश्चात भी अनुभव एवं सुझावों के आधार पर नीतियों में परिवर्तन तथा संशोधन का क्रम चलता ही रहता है। इस प्रकार नीतियों में लोच लाकर उन्हें वर्तमान समय के अनुरूप बनाने का प्रयास किया जाता है। नीति निर्धारण प्रक्रिया के विभिन्न चरण निम्नलिखित है-


(i) नीति की बात उठाना - नई नीति की बात उठाने की क्रिया प्रबंधक, कर्मचारी अथवा श्रम संगठन की ओर से की जा सकती है। मानव संसाधन विभाग नीति निरुपण में संगठन के मस्तिष्क की भाँति कार्य करता है।

इस विभाग की सजगता इसमें है कि नीतियों की आवश्यकता की माँग उठने से पहले ही प्रबंधकों का ध्यान इस ओर आकृष्ट कर इस विषय में से विचार-विमर्श आरंभ कर दें।


(ii) कारणों का पता लगाना कारणों को पता करने का कार्य विषय, विशेषज्ञ, सलाहकारों या मानव संसाधन विभाग को सौंपा जा सकता है। साक्षात्कार तथा बैठकों की सहायता से संगठन के अंदर व बाहर इस प्रकार की खोज का कार्य किया जाता है। इस कार्य के लिए उपलब्ध साहित्य तथा अन्य संगठन की नीतियों एवं व्यवहार का गहराई से अध्ययन करना आवश्यक होता है। संगठन में कार्यरत सभी कर्मचारियों एवं वर्गों के सुझावों का स्वागत किया जाना चाहिए।

(iii) नीति की अनुशंसा तथ्यों की जाँच-पड़ताल करने के पश्चात् मानव संसाधन विभाग, प्रबंधन की प्रस्तावित नीति के संबंध में अनुशंसा करता है। इस अनुशंसा का उद्देश्य प्रबंधन का विश्वास अर्जन करना एवं नीति का अनुमोदन करना होता है।


(iv) नीति का लेखन नीतियों को लिखना करना एक अत्यन्त कठिन कार्य है। लिखित नीतियों में कमियों निकालना, उनकी अलग-अलग तरह से व्याख्या करना, विभिन्न मतों एवं स्वार्थों के द्वारा उनकी अपने अपने पक्ष के समर्थन में खींचतान करना, कुछ ऐसी बातें है, जिनका प्रत्येक लिखित नीति को सामना करना पड़ता है, नीतियों का लेखनी से स्पष्टता एवं दृढ़ता आती है। साथ ही साथ नीतियों का लेखनी बद्ध करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि प्रबंधन नीतियों के प्रति आस्थावान एवं वचनबद्ध है।

(v) नीति का स्पष्टीकरण नीतियों पर चर्चा की प्रक्रिया उनके लेखनीबद्ध करने से पूर्व ही आरंभ हो जाती है। लिखने से पूर्व नीतियाँ अस्पष्ट होती हैं। जब नीतियों को लिख दिया जाता है तो उनका स्पष्ट रूप सभी के सामने आ जाता है। अतः इस स्थिति में विवेचन आवश्यक होने के साथ-ही-साथ काफी हद तक सार्थक सिद्ध होता है। अगर नीतियों को बिना पूर्व विवेचन के ही स्वीकार कर उपयोग में लाया जाएगा तो बाद में होने वाला विचार विमर्श एवं विवेचना विध्वंसात्मक प्रवृत्ति का होगा। विवेचन का उद्देश्य यह पता करना होता हैं कि -


(अ) नीतियाँ स्पष्ट हैं या नहीं


(ब) नीतियाँ स्वीकार्य हैं या नहीं, तथा

(स) नीतियों, क्रिया विधियों, कार्यक्रमों सिद्धांतों तथा नियमों आदि में एकरूपता है या नहीं।


(vi) नीति को अपनाना प्रस्तावित नीति पर पर्याप्त चर्चा एवं विश्लेषण से जो रूप सामने आता है उस नीति को अपनाने का कार्य एवं दायित्व उच्च प्रबंध का होता है।


(vii) नीति को निर्मुक्त करना उच्च प्रबंध द्वारा नीति को अपनाने के पश्चात उसका सही समय पर सही ढंग से निर्मुक्त करना आवश्यक होता है। संगठन के प्रत्येक कर्मचारी को प्रबंध द्वारा निर्धारित नीतियों की जानकारी न केवल निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु आवश्यक है, अपितु उनके सही क्रियान्वयन तथा विभिन्न शंकाओं के निवारण के लिए भी महत्वपूर्ण है।

अतः मानव संसाधन विभाग को ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए जिनके माध्यम से संगठन का हर एक कर्मचारी नीतियों से जागरूक हो जाये। इस हेतु जिन माध्यमों को प्रयोग किया जाता है, उनमें कर्मचारी हैण्डबुक तथा सुपरवाईजर का मौखिक स्पष्टीकरण एवं समझाना मुख्य है।


(viii) नीति को लागू करना नीति का वास्तविक स्वरूप उसके प्रयोग एवं लागू करने से ही प्रकट होता है। कर्मचारी, श्रम संगठन तथा अधिशास्त्री नीतियों को किस प्रकार समझते हैं एव उनकी व्याख्या करते हैं, यह उनके प्रयोग में लाने से ही स्पष्ट हो जाता है।

(ix) फलो अप - यह नीतियों की परीक्षण की अवस्था है। इस स्तर पर यह ज्ञात किया जाता है कि नीति का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हुआ है अथवा नहीं तथा नीति, संस्था के उद्देश्यों के अनुरूप सार्थक सिद्ध हो रही है अथवा नहीं। नीति में किस प्रकार की कमियाँ हैं तथा किस सीमा तक हैं, इसकी जानकारी पर्यवेक्षकों के द्वारा की जाती है।


(x) विद्यमान नीतियों का मूल्यांकन यदि संगठन में संचार व्यवस्था द्विमार्गीय है तो मूल्यांकन का कार्य काफी सरल हो जाता है। प्रबंधकों को नीतियों के प्रति सभी की प्रतिक्रिया की जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि नीतियाँ समय एवं उपयोगिता की कसौटी पर खरी उतरती हैं,

तो उन्हें पुनः पुष्ट कर दिया जाना चाहिए अन्यथा उनमें आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए। -


(xi) संशोधन एवं पुनः निर्धारण अनुपरीक्षण एवं मूल्यांकन के साथ-साथ परिस्थितियों में परिवर्तन, सरकार की नीति में परिवर्तन, बाजार दशाओं में परिवर्तन, प्रतियोगियों की नीतियों में परिवर्तन, प्रबंध के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन आदि ऐसे कारण हैं जिनके कारण से नीतियों में संशोधन एवं पुनः निर्धारण करना होता है। मानव संसाधन प्रबंध, सामान्य प्रबंध की एक शाखा है जो गतिशील है अतः इस गतिशीलता को बनाये रखने के लिए मानव संसाधन नीतियों में संशोधन एवं उनका पुनः निर्धारण होता ही रहना चाहिए।