चीन - China

चीन - China


चीन एक दलीय गणराज्य है। 1949 में राष्ट्र की स्थापना के बाद अर्थव्यवस्था सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्र, उद्यम तथा भूमि सरकारी नियंत्रण में लाया गया। 1998 में ग्रेट लीप फॉरवर्ड जी. एल. एफ. अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य बड़े पैमाने पर देश में औद्योगिकरण करना था। सरकार ने लोगों को अपने घर में उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन की छोटी इकाई से अच्छी पैदावर पाने के लिए कम्यून आरंभ किए गए कम्यून पद्धति के अंतर्गत लोग सामूहिक रूप से खेती करते थे। 1958 में चीन में 26,000 कम्यून थे, जिनमें सभी किसान शामिल थे।


जी एल एफ एक ऐसा अभियान था जिससे चीन न अपने हर क्षेत्र में विकास को एक नई बुलंदीपर पहुंचाना था, किंतु जी एल एफ अभियान में अनेक समस्याएं आई। चीन में एक भयंकर सूखे ने तबाही मचा दी लगभग 30 मिलियन लोग मारे गए थे।


इसी दौरान रूस व चीन के बीच संघर्ष हुआ, रूस ने अपने विशेषज्ञों को चीन से वापस बुला लिया जिन्हें औद्योगीकीकरण प्रक्रिया के दौरान सहायता के लिए चीन भेजा गया था। 1965 में माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति का आरंभ किया। छात्रों और विशेषज्ञों को ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने और अध्ययन करने के लिए भेजा गया।


आज की तारीख में चीन की अर्थव्यवस्था विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंच चुकी है। इस मुकाम के पीछे 1978 में किए गए आर्थिक सुधार है। चीन में सुधार चरणों में शुरू किया गया। प्रारंभिक चरण में कृषि, विदेशी व्यापार तथा निवेश क्षेत्रों में सुधार किए गए। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र में कम्यून भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बांट दिया गया जिन्हें अलग-अलग परिवारों को आवंटित किया गया। वे प्रकल्पित कर देने के बाद भूमि से होने वाली समस्त आय को अपने पास रख सकते थे। बाद के चरण में औद्योगिक क्षेत्र में सुधार आरंभ किए गए।

सामान्य, नगरीय तथा ग्रामीण उद्यमों को निजी क्षेत्र की उन फर्मों को वस्तुएं उत्पादित करने की अनुमति थी जो स्थानीय लोगों के स्वामित्व और संचालन के अधीन थे। इस अवस्था में उद्यमों को जिन पर सरकार का स्वामित्व था और जिन्हें हम भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कहते हैं, उनको प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। सुधार प्रक्रिया में दोहरी कीमत निर्धारण पद्धति लागू थी। इसका अर्थ यह है कि कीमत का निर्धारण दो प्रकार से किया जाता था। किसानों और औद्योगिक इकाइयों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे सरकार द्वारा निर्धारित की गई कीमतों के आधार पर लागतों एवं निर्गतो की निर्धारित मात्राएं खरीदेगे और बेचेंगे और शेष वस्तुए बाजार कीमतों पर खरीदी और बेची जाती थी। गत वर्षों के दौरान उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ बाजार में बेची और खरीदी गई वस्तुओं या आगतों के अनुपात में भी वृद्धि हुई। विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित किए गए।