विपणन लागत का वर्गीकरण - Classification of Marketing Costs
विपणन लागत का वर्गीकरण - Classification of Marketing Costs
विपणन लागत के वर्गीकरण निम्न शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है।
(i) प्रत्यक्ष विक्रय व्यय इसमें विक्रय कर्मचारियों का पारिश्रामिक यात्रा व्यय एवं शाखा कार्यालय व्यय को सम्मिलित किया जाता है।
(ii) विज्ञापन एवं विक्रय संवर्द्धन व्यय: इसमें निम्न व्ययों को सम्मिलित किया जाता है।
(अ) भडार संबंधी व्यय ।
(ब) परिवहन संबंधी व्यय
(स) साख एवं वसूली व्यय
(द) वित्तीय एवं लिपिकों के व्यय
(य) विपणन प्रशासन व्यय
(र) सामान्य प्रशासन व्यय।
विपणन लागत में सम्मिलित होने वाले विभिन्न व्ययों को जानने के पश्चात विपणन लागत के मूल तत्वों को निम्नलिखित क्रम में प्रस्तुत किया जा सकता हैं।
(i) उत्पादन की विपणन लागत उत्पादन लागत की भांति विपणन लागत के आंकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं किन्तु सामन्यतः औद्योगिक वस्तुओं की अपेक्षा उपभोक्ता वस्तुओं की विपणन लागत अधिक होती है
क्योंकि औद्योगिक वस्तुओं के मूल्य अधिक होते है और उपभोक्ता वस्तुओं के कम।
(ii) परिवहन संबंधी लागत - अमेरिका में परिवहन संबंधी आंकड़े उपलब्ध होते हैं, किन्तु भारत में ऐसा नहीं है। फिर भी ऐसा अनुमान है कि कुल विपणन लागत में इनका महत्वपूर्ण स्थान होता है विशेष रूप से भारी तथा कम मूल्य की वस्तुओं में
(iii) थोक व्यापार की लागत - थोक व्यापार की लागत ज्ञात करना एक कठिन कार्य है, क्योंकि बहुत कम से थोक विक्रेता फुटकर विक्रय का और बहुत से फुटकर थोक विक्रेता का भी कार्य करते है। सामान्त थोक विक्रेता कम लाभ पर कार्य करते है तथा कुल विपणन लागत में इनका हिस्सा बहुत कम होता है।
(iv) फुटकर व्यापार की लागत सम्पूर्ण विपणन लागत में फुटकर व्यापार की लागत बहुत महत्वपूर्ण होती है।
साधारणतः अनेक फुटकर व्यापारी छोटी-छोटी इकाइयों के रूप में कार्य करते है। उन्हें विपणन संबंधी कोई विशिष्ट ज्ञान नहीं होता है तथा वे व्यापार में असफल होते रहते है यह कारण है विपणन लागत को बढ़ाता है जो अच्छे एवं समृद्ध व्यापारी होते है अधिक लाभ पर कार्य करते हैं, उनका भी विपणन व्यय अधिक होता है। ये सभी लोग विपणन लागतों की यथेष्ट रूप से प्रभावित करते है।
(v) मध्यस्थ एवं विपणन लागत थोक एवं फुटकर व्यापारी विपणन लागत बढ़ाने में योगदान देते हैं। लोगों की ऐसी धारणा भी है कि मध्यस्थों के होने से वस्तु की विपणन लागत में पर्याप्त वृद्धि होती है।
कुछ लोगों की मान्यता है कि विपणन क्रियाओं का विभाजन इतना अधिक हो गया है कि उत्पादक से अन्तिम उपभोक्ता तक पहुंचने में वस्तु को अनेक वाहिकाओं से गुजरना पड़ता है ये सभी कारक विपणन लागत में वृद्धि में सहयोग देते है।
उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने में वितरण वाहिका में दो प्रकार से मध्यस्थ जुड़े हुए होते हैं प्रथम उदग्र रूप से जुड़े मध्यस्थ तथा द्वितीय क्षैतिज से जुड़े हुए मध्यस्थ उदय रूप से जुड़े हुए मध्यस्थों की संख्या जितनी कम होती है. वस्तु उत्पादक से उपभोक्ता तक शीघ्र पहुंचती है तथा वितरण लागत भी कम होती है। किन्तु मध्यस्थों की संख्या बढ़ने के साथ वितरण लागत में ही वृद्धि नहीं होती है अपितु उपभोक्ता को वस्तु भी देर से प्राप्त होती है। विपणन कियाओं में विभाजन एवं विशिष्टीकरण के कारण वस्तु की वितरण लागत बढ़ती रहती है। क्षतिज रूप से जुड़े हुए मध्यस्थों में सेवा प्रदान करने वाले माल की दलाली करने वाले आदि को सम्मिलित किया जाता है ये सभी वस्तु की लागत को बढ़ाने में सहायक होते है।
मध्यस्थों की संख्या अधिक होने से केवल विपणन लागत ही नहीं बढ़ती है, बल्कि इसमें उपभोक्ताओं को विभिन्न प्रकार की सेवाओं की प्राप्ति होती है
जैसे मुफ्त सुपुर्दगी, माल वापसी की सुविधा, साख की सुविधा आदि। ये सभी महंगी सेवाएं है जो विपणन लागत में वृद्धि करती हैं। किन्तु ये आवश्यक रूप से मध्यस्थों के प्रयोग का परिणाम नहीं है। नयी तथा विविध प्रकार की वस्तुओं की उपभोक्ताओं द्वारा माग मध्यस्था की विपणन सेवाओं को महंगा बनाती है। अनेक बाड़ों की वस्तुएं रखने से भी उत्पादन लागत पर असर पड़ता है। यदि यह सिद्ध भी हो जाये कि मध्यस्थ होने के कारण वितरण लागत अधिक होता है तो भी यह अन्तिम निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि कुछ वस्तुएं ऐसी भी है जिनमें मध्यस्थ कम होने के बावजूद भी विपणन लागत अधिक होती है कुछ परिस्थितियों में वस्तुओं के विपणन के मध्यस्थों के कारण विपणन लागत ऊँची भी हो सकती है, किन्तु यह आम बात नहीं हो सकती हैं।
सामान्यतः विपणन लागत को कम करने की दृष्टि से विपणन व्ययों को दो भागों में बांटा जा सकता है।
(i) वे व्यय जो ज्ञात कारकों से अधिक है तथा जिन्हें कम किया जा सकता है। उपभोक्ताओं को अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान करने के कारण इस प्रकार के व्यय करने पड़ते है। अतः इनमें कमी लायी जा सकती है।
(ii) वे व्यय जो विपणन व्यवस्था की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न होते हैं। ये व्यय ज्ञान की कमी, व्यवहार प्रशासन में अवैज्ञानिक रीति का प्रयोग, अपर्याप्त पूजी दूरदर्शिता का अभाव व असावधानी के कारण उत्पन्न होने वाल अपव्यय से संबंधित है।
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