ऋणों के लिए जमानत - collateral for loans

ऋणों के लिए जमानत - collateral for loans


ऋणों की सुरक्षा के लिए बैंक अपने ग्राहकों से किसी न किसी प्रकार की जमानत अवश्य लेता है ये जमानते प्राय: दो प्रकार की होती है- (1) व्यक्तिगत जमानत तथा (2) सहायक जमानत । 


(1) व्यक्तिगत जमानत बिना किसी माल या संपत्ति को जमानत के रूप में लिए व्यक्तिगत साख अथवा जमानत के आधार पर दिए गए ऋण आरक्षित अथवा स्वच्छ ॠण कहलाते हैं। व्यक्तिगत जमानत अथवा प्रतिभूति के आधार पर ऋण देने के पूर्व बैंक ऋणी की आर्थिक स्थिति, व्यवसाय, साख, व्यापारिक कुशलता तथा चरित्र आदि से संबंधित विश्वसनीय जानकारी प्राप्त कर लेता है। भारत में व्यक्तिगत जमानत पर दिए जाने वाले ऋणों में अधिकवर्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

कभी-कभी ऋणी की व्यक्तिगत जमानत के अतिरिक्त किसी अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति अथवा संस्था की गारंटी भी माँगी जाती हैं, जिसके अंतर्गत ऋणों की रकम न चुकाने पर गारण्टी करने वाला दायित्व को अपने ऊपर लेने का आश्वासन देता है। ऐसे ऋणी के दो हस्ताक्षरों वाले कागजी ऋण कहते हैं। व्यक्तिगत जमानत केवल एक विशिष्ट ऋण से संबंधित होने पर उसे विशिष्ट व्यक्तिगत जमानत कहते है तथा भविष्य में लिए जाने वाले समस्त ऋण से संबंधित होने पर उसे चालू जमानत कहते हैं।


(2) सहायक जमानत - ऋण की सुरक्षा के लिए ऋणी द्वारा बैंक के पास जमानत के रूप में रखी गई भौतिक संपत्ति तथा वस्तऍ सहायक जमानत कहलाती है। इस प्रकार की जमानत बैंक के पास प्राय: तीन प्रकार से रखी जाती है-


(1) रहन अथवा धरणाधिकार इसमें जमानत के रूप में रखी गई संपत्ति बैंक के पास रहती हैं तथा ऋण वसूल न होने पर बैंक अदालत की आज्ञा से इसे बेचकर अपना ऋण वसूल कर


सकता है।


(2) गिरवी इसमें भी संपत्ति बैंक के पास रहती है तथा ऋण का भुगतान न होने की दशा में बैंक ऋणी को सूचना देकर जमानत की संपत्ति को बेच सकता है। इसके लिए अदालत की आज्ञा की आवश्यकता नहीं होती।


(3) बन्धक:- जब भुगतान के रूप में भूमि, भवन, आदि अचल संपत्ति की जमानत दी जाती है तो वह बैंक के पास नहीं रहती, उस पर बैंक का अधिकार मात्र होता है परंतु ऋणी द्वारा भुगतान न करने पर इस संपत्ति पर बैंक का स्वामित्व हो जाता है। सामान्यतः निम्नलिखित प्रकार की भौतिक संपत्तियों को सहायक जमानत के रूप में स्वीकार किया जाता है।


(क) स्टॉक एक्सचेन्ज प्रतिभूतियां - स्टॉक एक्सचेन्ज से नियमित रूप से क्रय विक्रय की जाने वाली प्रतिभूतियों में सरकारी अर्द्ध सरकारी स्वायत संस्थाओं तथा अन्य संस्थाओं द्वारा जाती की गई प्रतिभूतियों के अतिरिक्त व्यावसायिक तथा औद्योगिक कंपनियों के अंश, ऋणपत्र, प्रतिज्ञा पत्र तथा अन्य प्रकार के विनिमयसाध्य साख पत्र सम्मिलित किए जाते है। इन प्रतिभूतियों की जमानत पर ऋण देना बैंकों के लिए अच्छा समझा जाता है क्योंकि इससे अनेक लाभ होते है. (1) इन्हें आसानी से बेचा जा सकता है, इसलिए ये बहुत तरल होती है। (2) इनके स्वामित्व परिवर्तन में कोई कठिनाई नहीं होती। (3) इनका मूल्यांकन करने के कोई कठिनाई नहीं होती । (4) इनके मूल्य में अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होते तथा (5) इनकी जमानत पर स्वयं बैंक भी ऋण प्राप्त कर सकता है।


इन प्रतिभूतियों में अनेक गुण होने के कारण बैंक इन्हें सदा प्राथमिकता देते है परंतु ऐसी प्रतिभूतियों को स्वीकार करने समय बैंक को यह चाहिए कि कुछ बातों के प्रति सावधान रहे जैसे (1) इनके स्वामित्व में दोष न हो तथा उनका हस्तारण बैंक के पक्ष में उचित प्रकार से किया गया हो। (2) इनका किसी मान्य शेयर बाजार में क्रय विक्रय होता हो, (3) इनके मूल्य में अधिक परिवर्तन न हो तथा (4) पूर्ण प्रदत हों। 


(ख) माल और माल के स्वत्व लेख्यः अनेक बार माल के गोदाम पर बैंक अपना ताला लगाकर उनकी जमानत पर ऋण देते हैं। जैसे-जैसे ऋणों का भुगतान होता जाता है गोदाम से माल निकाला जा सकता है। माल के स्वत्व लेख्य जैसे गोदाम की रसीद, रेलवे की रसीद डाक वारण्ट आदि की जमानत पर भी बैंक द्वारा ऋण दिया जाता है। माल तथा माल के स्वत्व लेख्य की जमानत पर ऋण देने में ये लाभ है (1) इनको किसी भी समय आसानी से बेचा जा सकता है तथा ऋण का भुगतान न होने पर माल की बिक्री से बैंक रकम प्राप्त कर सकता है। (2) ये ऋण प्रायः अल्पकालीन होते है। (3) मूल्यांकन में विशेष कठिनाई नहीं होती (4) चूँकि मूल्यों में परिवर्तन एकदम नहीं होते इसलिए गिरावट आरम्भ होते ही सुरक्षा के लिए उचित प्रबंध किया जा सकता है। अतः जोखिम कम रहता है तथा (5) व्यावसायिक उन्नति को प्रोत्साहन मिलता है।


परंतु माल तथा माल के स्वत्व लेख्य की जमानत पर ऋण देने में कई दोष तथा कठिनाई भी है- (1) अच्छे गोदामों के अभाव के कारण माल के खराब होने का भय रहता है। (2) माल का मूल्य गिर जाने पर पूरा ऋण वसूल करने में कठिनाई होती है। (3) माल की विभिन्न किस्मों के कारण उनका सही मूल्य आँकने में कठिनाई होती है (4) गोदाम में माल रखते समय धोखे का भय रहता है जैसे असली माल के बीच नकली या घटिया माल भरा जा सकता है।

(5) स्वत्व लेख्य में धोखा होने की संभावना रहती है।


बैंक को चाहिए कि वह कुछ सावधानियां रखे जैसे- (1) ऋण की रकम तथा माल के मूल्य में यथेष्ट अंतर होना चाहिए ( 2 ) शीघ्र बिकने वाले माल को ही जमानत के रूप में स्वीकार करना चाहिए। (3) नाल के मूल्य तथा अधिकार पत्रों को ठीक प्रकार से जाच कर लेनी चाहिए। (4) जमानत के रूप में रखा गया माल न तो शीघ्र नष्ट होने वाला हो और न ही उसके मूल्यों में बहुत उतार-चढाव होता हो। (5) ऋण प्रार्थी विश्वसनीय तथा ईमानदार हो (6) ऋण का उद्देश्य व्यावसायिक हो न कि मुनाफाखोरी के लिए अधिक समय तक माल रोकना (7) गोदामों का प्रबंध कुशल, ईमानदार तथा उतरदायी कर्मचारियों के हाथ में हो तथा (8) माल का गोदाम सहित बीमा करा लेना चाहिए। 


(ग) विनिमय बिल - विनिमय बिलों की परिपक्वता के पूर्व उनकी कटौती करके उनका मूल्य चुका देने पर ये बिल बैंक के अधिकार में आ जाते है तथा इनके बदले में दी गयी रकम की जमानत के रूप में ये बैंक के पास रहते है।


इनके अनेक लाभ होते है (1) इन बिलों के मूल्य स्थिर रहते है, ( 2 ) आवश्यकता पडने पर इन्हें आसानी से बेचा जा सकता है तथा केंद्रीय बैंक से पुनः कटौती के आधार पर रकम प्राप्त की जा सकती है तथा (3) इनकी वसूली में आसानी होती है क्योंकि बिल के दोनों पक्ष उतरदायी होते है।


विनिमय बिलों को स्वीकार करने में सबसे बड़ा दोष यह होता है कि यदि बिल को स्वीकार करने वाला बिल का भुगतान करने से इंकार कर देता है तो बैंक के लिए काफी असुविधा हो जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि बैंक उतम श्रेणी के बिलों को ही स्वीकार करे तथा इनके लिखने वाले और स्वीकार करने वाले पक्षों के चरित्र, साख एवं आर्थिक दशा आदि से संबंधित पर्याप्त जानकारी प्राप्त कर लें।


(घ) संपत्ति-संपत्ति दो प्रकार की होती है-चल तथा अचल दोनों प्रकार की संपत्तियों के आधार पर बैंक ऋण देते हैं। चल संपत्ति के अंतर्गत माल तथा स्टॉक एक्सचेन्ज प्रतिभूतियों के अतिरिक्त सोना,

चाँदी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुएँ आती है। बैंकों द्वारा बहुमूल्य धातुओं तथा आभूषणों के आधार पर भी ऋण दिया जाता है। चूँकि इन्हें ऋण का भुगतान न होने पर तत्काल बाजार में बेचा जा सकता है, इसलिए इन्हें अत्यन्त तरल संपत्ति समझा जाता है। परंतु धातुओं आदि की जमानत पर ऋण देने के पूर्व बैंकों को चाहिए कि इनकी वास्तविक शुद्धता का अनुमान लगवा ले तथा उनका सही मूल्यांकन करा लें।


जमीन, मकान, दुकान, मशीन आदि अचल संपत्ति है। अचल संपत्ति के आधार पर ऋण देने से लाभ ये है (1) किसान, जो अपनी भूमि के अतिरिक्त अन्य प्रकार की जमानत नहीं दे पाता, अचल संपत्ति के आधार पर बैंक से ऋण प्राप्त कर सकते हैं। (2) व्यापारी वर्ग के लोगों को भी अन्य कोई जमानत के न रहने पर अपनी अचल संपत्ति की जमानत पर ऋण मिल जाता है, (3) मकान तथा जमीन की जमानत पर ऋण देकर बैंक भवन निर्माण कार्यों में सहायक होते है

तथा (4) संपत्ति के मूल्य में विशेष कमी आने की आशंका नहीं होती। परंतु व्यावहारिक रूप में बैंक अचल संपत्ति की जमानत पर ऋण देना उचित नहीं समझते, क्योंकि इसमें कई दोष है - (1) संपत्ति को आसानी से उचित मूल्य पर नहीं बेचा जा सकता, (2) संपत्ति के स्वामित्व को तय करना कठिन होता है और इसके लिए कानूनी सलाह लेनी पड़ती है। (3) ऋणी द्वारा उसी संपत्ति पर अनेक व्यक्तियों से ऋण ले लेने का भय रहता है । (4) संपत्ति का उचित मूल्यांकन करना भी कठिन होता है। (5) संपत्ति के मूल्य में हास आदि के कारण कमी आ जाती है तथा (6) भूमि अथवा मकान को बंधक आदि रखने के लिए अदालती कार्यवाही करनी पड़ती है।


अचल संपत्ति की जमानत पर ऋण देने के पूर्व उसके स्वामित्व से संबंधित सही जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए तथा हस्तातरण संबंधी पूरी कानूनी कार्यवाही कर लेनी चाहिए। संपत्ति के मूल्य तथा ऋण की मात्रा में पर्याप्त अंतर रखना आवश्यक है।

इस प्रकार बैंक का चाहिए कि सहायक जमानतों से संबंधित गुण दोषों को ध्यान में रखते हुए सावधानी से काम ले।