विकास संकेतकों की तुलना - Comparison of Growth Indicators
विकास संकेतकों की तुलना - Comparison of Growth Indicators
(क) जनांकिकीय संकेतक
यदि हम विश्व की जनसंख्या पर विचार करें तो पाएंगे कि विश्व में रहने वाले प्रत्येक छह व्यक्तियों में से एक व्यक्ति भारतीय है और दूसरा चीनी पाकिस्तान की जनसंख्या बहुत कम है और वह चीन या भारत की जनसंख्या का लगभग दसवां भाग है।
यद्यपि इन तीनों में चीन सबसे बड़ा देश हैं, तथापि इसका जनसंख्या का घनत्व सबसे कम है और भौगोलिक रूप से इसका क्षेत्र सबसे बड़ा है। पाकिस्तान में जनसंख्या वृद्धि सबसे अधिक है उसके बाद भारत और चीन का स्थान है। विद्वानों का मत है कि चीन में जनसंख्या की वृद्धि का मुख्य कारण यह था कि 1970 के दशक के अंत में चीन में केवल एक संतान नीति लागू की गई थी। उनका यह भी कहना था कि इसके कारण लिंगानुपात में गिरावट आई। आजकल तीनों देशों में स्थिति को सुधारने के लिए विभिन्न उपाय कर रहे हैं।
एक संतान नीति और उसे लागू किए जाने के परिणास्वरूप जनसंख्या वृद्धि थमने के अन्य प्रभाव भी थे ।
उदाहरण के लिए, कुछ दशकों के बाद चीन में वायोवृद्ध लोगों की जनसंख्या का अनुपात युवा लोगों की अपेक्षा अधिक होगा। इसके कारण कुछ कामगारों को सामाजिक सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने के लिए कदम उठाने के लिए चीन को बाध्य होना पड़ा और 2015 में एक संतान नीति बंद की गई। चीन की प्रजनन दर भी बहुत अधिक है। पाकिस्तान और चीन दोनों में नगरीकरण अधिक है। भारत में नगरीय क्षेत्रों में 28 प्रतिशत लोग रहते हैं।
(ख) सकल घरेलू उत्पाद एवं क्षेत्रक
चीन के बारे में विश्व में बहुचर्चित एक मुद्दा उसके सकल घरेलू उत्पाद 10.1 ट्रीलियन विश्व में दूसरे स्थान पर हैं।
भारत का सघ उत्पाद 42 ट्रीलियन तथा पाकिस्तान का जी. डी. पी. 0.47 ट्रीलियन डॉलर भारत के जी.डी.पी. के लगभग 10 प्रतिशत है। जब अनेक विकसित देश 5 प्रतिशत तक की संवृद्धि दर बनाए रखने में कठिनाई महसूस कर रहे थे, तब चीन एक ऐसा देश था जो दो दशकों से भी अधिक लगभग इसकी दोगुनी संवृद्धि बनाए रखने में समर्थ था।
1980 के दशक में पाकिस्तान भारत से आगे था। चीन की सवृद्धि दोहरे अंको में थी और भारत सबसे नीचे था। 2000 -10 के दशक में भारत और चीन की संवृद्धि दरों में मामूली गिरावट आई, जबकि पाकिस्तान में 4.7 प्रतिशत की अत्याधिक गिरावट आई। कुछ विद्वानों का मत हैं कि पाकिस्तान में 1988 में आरंभ की गई सुधार प्रक्रिया तथा राजनीतिक अस्थिरता इस प्रवृति का मुख्य कारण था।
चीन तथा पाकिस्तान में भारत की अपेक्षा नगर में रहने वाले लोगों का अनुपात अधिक है। चीन में स्थलाकृति तथा जलवायु दशाओं के कारण कृषि के लिए उपयुक्त क्षेत्र अपेक्षाकृत कम अर्थात भूमि क्षेत्र का लगभग 10 प्रतिशत है। चीन में कुल कृषि योग्य भूमि भारत में कृषि क्षेत्र की 40 प्रतिशत है। 1980 के दशक तक चीन में 80 प्रतिशत से भी अधिक लोग जीविका के एकमात्र साधन के रूप में कृषि पर निर्भर थे। उस समय से सरकार ने लोगों को कृषि कार्य त्यागने और हस्तशिल्प, वाणिज्य तथा परिवहन जैसी गतिविधियां अपनाने के लिए एस.ई. जैड (स्पैशल इकनॉमिक जोन) के जरीए प्रेरित किया। चीन में 2008 में 40 प्रतिशत श्रमिकों के साथ कृषि ने चीन में सकल उत्पाद में 10 प्रतिशत में योगदान दिया।
भारत और पाकिस्तान में जी. डी. पी. के लिए कृषि का योगदान 19 तथा 21 प्रतिशत था। परंतु इस क्षेत्र में श्रमिकों का अनुपात भारत में अधिक है। पाकिस्तान में लगभग 45 प्रतिशत लोग कृषि कार्य करते हैं,
जबकि भारत में 56 प्रतिशत उत्पादन तथा रोजगार में क्षेत्रवार हिस्सेदारी भी यह दर्शाती है कि तीनों अर्थव्यवस्थाओं में उद्योग तथा सेवा क्षेत्रों में श्रमिकों का अनुपात कम है। परंतु उत्पादन की दृष्टि से उनका योगदान अधिक है। चीन में विनिर्माण से जी.डी.पी. में सबसे अधिक अर्थात 47 प्रतिशत योगदान होता है, जबकि भारत और पाकिस्तान में केवल सेवा क्षेत्र द्वारा ही सबसे अधिक योगदान अर्थात 50 प्रतिशत से अधिक होता है।
विकास की सामान्य प्रक्रिया के दौरान इन देशों ने सबसे पहले रोजगार और कृषि उत्पादन से संबंधित अपनी नीतियों को बदलकर उन्हें विनिर्माण और उसके बाद सेवाओं की ओर परिवर्तित कर दिया। ऐसा ही चीन में हो रहा है। भारत और पाकिस्तान में विनिर्माण में लगे श्रमबल का अनुपात बहुत कम अर्थात क्रमश 19 तथा 20 प्रतिशत था। जी.डी.पी. में उद्योगों का योगदान कृषि के उत्पादन के बराबर या थोड़ा अधिक था।
भारत और पाकिस्तान में सीधे सेवा क्षेत्र पर जोर दिया जा रहा है। इस प्रकार भारत और पाकिस्तान दोनों में सेवा क्षेत्र विकास के लिए एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभर कर आ रहा है। यह जी. डी. पी. में अधिक योगदान कर रहा है और साथ ही यह सभावित नियोक्ता बन रहा है। 1980 के दशक में श्रमिकों के अनुपात पर विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि पाकिस्तान, भारत और चीन के अपेक्षा सेवा क्षेत्र में अपने श्रमिकों को तेजी से भेज रहा है। 1980 के दशक में भारत, चीन तथा पाकिस्तान में सेवा क्षेत्र में क्रमश 17, 12 और 27 प्रतिशत श्रमबल कार्यरत था। वर्ष 2000 में यह बढ़कर 25, 33 और 35 प्रतिशत हो गया है।
पिछले दो दशकों में तीनों ही देशों में कृषि क्षेत्र, जिसमें उक्त तीनों देशों में श्रमबल का सबसे बड़ा अनुपात कार्यरत था, की संवृद्धि में कमी आई है।
चीन में तो द्विअंकीय संवृद्धि दर बनी रही, किंतु भारत और पाकिस्तान में इसमें गिरावट आई है। चीन में 2008-10 के दशक के दौरान सेवा क्षेत्र मे संवृद्धि दर बढ़ी है, जबकि भारत और पाकिस्तान की इस क्षेत्र में संवृद्धि रूक गई है । इस प्रकार चीन की आर्थिक संवृद्धि का मुख्य आधार विनिर्माण क्षेत्र है और भारत की संवृद्धि सेवा क्षेत्र से हुई है। पाकिस्तान में इस अवधि में तीनों ही क्षेत्र में गिरावट आई है।
चीन भारत और पाकिस्तान से आगे है। यह बात अनेक संकेतकों के विषय में सही है, जैसे आय संकेतक अर्थात प्रतिव्यक्ति जी.डी.पी. अथवा निर्धनता रेखा से नीचे की जनसंख्या का अनुपात अथवा स्वास्थ्य संकेतको जैसे कि मृत्यु दर, स्वच्छता साक्षरता तक पहुच,
जीवन प्रत्याक्षा अथवा कुपोषण | पाकिस्तान निर्धनता रेखा के नीचे के लोगो का अनुपात कम करने में भारत से आगे है। शिक्षा, स्वच्छता और जल तक पहुंच मामलों में इसका निष्पादन भारत से बेहतर है, किंतु ये दोनों देश महिलाओं को मातृमृत्यु से बचा पाने में असफल रहे हैं। चीन में प्रति एक लाख पर केवल 38 महिलाओं की मृत्यु होती है, जबकि भारत और पाकिस्तान में यह संख्या 200 से ऊपर है। आश्चर्य की बात यह है कि तीनों देश उत्तम जल स्त्रोत उपलब्ध करा रहे है। आप यह भी देखेंगे कि एक डॉलर प्रतिदिन की अंतरराष्ट्रीय निर्धनता दर के नीचे के लोगों का अनुपात भारत में तीनों देशों से अधिक गरीब व्यक्ति है।
इनके साथ की स्वतंत्रता संकेतकों की भी आवश्यकता है। सामाजिक व राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में लोकतांत्रिक भागीदारी की सीमा के सकेतक को इसके माप के रूप में जोड़ दिया गया है।
ऐसे कुछ स्पष्ट स्वतंत्रता संकेतक इनमें अभी तक नहीं जोड़े गए हैं, जैसे नागरिक अधिकारों की संवैधानिक संरक्षण की सीमा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक संरक्षण की सीमा या न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संरक्षण देने की संवैधानिक सीमा तथा विधि सम्मत शासन अभी तक लागू नहीं किया गया है। इन्हें और कुछ उपायों को सूची में शामिल किए बिना तथा इन्हें महत्व दिए बिना, मानव विकास सूचक का निर्माण अधूरा रहेगा तथा इसकी उपादेयता भी सीमित होगी।
(ग) विकास नीतिया
सामान्यतः यह देखा जाता है कि किसी देश की विकास नीतियों को अपने देश के विकास के लिए मार्गदर्शन एवं सीख के रूप में ग्रहण किया जाता है
विश्व के विभिन्न भागों में सुधार कार्यक्रमों के लागू होने के पश्चात ऐसा विशेष रूप से देखा जा सकता है। अपने पड़ोसी देशों की आर्थिक सफलताओं से कुछ सीखने की आवश्यकता है कि हम उनकी सफलताओं तथा विफलताओं के मूल कारणों को समझें। यह भी आवश्यक है कि हम उनकी रणनीतियों के विभिन्न चरणों के बीच अंतर और विभेद करे। विभिन्न देश अपनी विकास प्रक्रिया अलग-अलग तरीकों से पूरा करते हैं। आइए सुधार कार्यक्रमों के आरंभ को हम संदर्भ बिंदु के रूप में लें। हम जानते है कि सुधार कार्यक्रम का आरंभ चीन में 1978 में पाकिस्तान में 1988 में और भारत में 1991 में हुआ।
चीन में सरचनात्मक सुधारों को 1978 में प्रारंभ किया। चीन को इन्हें प्रारंभ करने के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की कोई बाध्यता नहीं थी जैसे कि भारत और पाकिस्तान को थी।
चीन के तत्कालीन नए नेता माओवादी शासन के दौरान चीन की धीमी आर्थिक संवृद्धि और देश में आधुनिकीकरण के अभाव को लेकर संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने महसूस किया कि विकेंद्रीकरण, आत्मनिर्भरता, विदेश औद्योगिकी और उत्पादों तथा पूंजी के बहिष्कार पर आधारित आर्थिक विकास माओवादी दृष्टिकोण से विफल रहा है। व्यापक भूमि सुधारों, सामुदायिकीकरण और ग्रेट लीप फॉरवर्ड तथा अन्य पहलों के बाद भी 1978 में प्रतिव्यक्ति अन्न उत्पादन उतना ही था जितना 1950 के दशक के मध्य में था यह भी देखा गया कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में आधारिक संरचना की स्थापना किए जाने के फलस्वरूप भूमि सुधारों, दीर्घकालिक विकेंद्रीकृत योजनाओं और लघु उद्योगों से सुधारोतर अवधि में सामाजिक और आय संकेतकों में निश्चित रूप से सुधार हुआ था। सुधारों के प्रारंभ होने से पूर्व ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़े व्यापक स्तर पर प्रसार हो चुका था। कम्यून व्यवस्था के कारण खाद्यान्नों का अधिक समतापूर्ण वितरण था । विशेषज्ञ यह भी कहते है कि प्रत्येक सुधार के पहले छोटे स्तर लागू किया गया और बाद में उसे व्यापार पैमाने पर लागू किया गया।
विकेंद्रीकृत शासन के प्रयोग के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक लागतों की सफलता या विफलता का आकलन किया जा सका। उदाहरण के लिए, जब छोटे-छोटे मूखंड कृषि के लिए व्यक्तियों को दिए गए तो बहुत बड़ी संख्या में लोग समृद्ध बन गए। इसके फलस्वरूप ग्रामीण उद्योगों के अपूर्व विकास की स्थिति बनी और आगे और सुधारों के लिए मजबूत आधार बनाया गया। विद्वान ऐसे अनेक उदाहरण देते हैं कि चीन में सुधारों के कारण किस प्रकार तीव्र संवृद्धि हुई।
विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि सुधार प्रक्रिया से पाकिस्तान में तो सभी आर्थिक संकेतकों में गिरावट आयी है। पाकिस्तान में 1980 दशक की तुलना में जीडीपी और वृद्धि दर 1990 के दशक में कम हो गई ।
यद्यपि पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से संबंधित आकडे बहुत सामारात्मक रहे हैं, परंतु पाकिस्तान के सरकारी आकड़ों का प्रयोग करने वाले यह संकेत देते हैं कि वहां निर्धनता बढ़ रही है। 1960 के दशक में निर्धनों का अनुपात 40 प्रतिशत था, जो 1980 के दशक से गिर कर 25 प्रतिशत हो गया और 1990 के दशक में पुन बढ़ने लगा। विद्वानों ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सवृद्धि दर की कमी और निर्धनता के पुनः आविर्भाव के ये कारण बताए -
(क) कृषि संवृद्धि और खाद्य पूर्ति, तकनीकी परिवर्तन संस्थागत प्रक्रिया पर आधारित न होकर अच्छी फसल पर आधारित था। जब फसल अच्छी होती थी तो अर्थव्यवस्था भी ठीक रहती थी और फसल अच्छी नहीं होती थी तो आर्थिक विकास भी नकारात्मक प्रवृतिया दर्शाते थे।
(ख) पाकिस्तान को अपने भुगतान संतुलन संकट को ठीक करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से उधार लेना पड़ा था। विदेशी मुद्रा प्रत्येक देश के लिए एक अनिवार्य घटक है और यह जानना आवश्यक है कि इसे कैसे अर्जित किया जाता है। यदि कोई देश अपने विर्निर्मत उत्पादों के धारणीय निर्यात द्वारा विदेशी मुद्रा कमाने में समर्थ हैं, तो उसे कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान में अशिकांश विदेशी मुद्रा मध्यपूर्व में काम करने वाले पाकिस्तानी श्रमिकों की आय प्रेषण तथा अति अस्थिर कृषि उत्पादों के निर्यातों से प्राप्त होती है। एक ओर विदेशी ऋणों पर निर्भर रहने की प्रवृति बढ़ रही थी, तो दूसरी ओर पुराने ऋणों को चुकाने में कठिनाई बढ़ती जा रही थी।
जैसा कि पाकिस्तान की वार्षिक योजना 2011-12 में कहा गया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की धीमी संवृद्धि के लिए विभिन्न कारक उतरदायी है। उद्धृत किया गया है
कि निम्न कारणों से अर्थव्यवस्था की गति धीमी रही जैसे बाढ़ का आना आर्थिक सुधारों को लागू करने में देरी करना; सुरक्षा स्थिति का पुराना होना और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की कमी के कारण सभी मुख्य क्षेत्रों में सवृद्धि की गति का धीमा होना अत्याधिक बाढों के कारण कृषि एवं आधारभूत संरचना का भारी नुकसान हुआ है, जबकि 2010-11 में ऊर्जा संकट विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में भारी कमी के कारण और बढ़ गया है, जिसके कारण व्यावसायिक गतिविधियां कम हो गई हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में वर्ष 2010-11 के दौरान 24 प्रतिशत की वृद्धि दर की उम्मीद थी जबकि पिछले वर्ष के दौरान यह लक्ष्य 45 प्रतिशत था, इसके साथ-साथ ऊंची मुद्रास्फीति दरें और तीव्र निजीकरण के कारण, सरकार उन विभिन्न क्षेत्रों में अधिक खर्च कर रही है जो निर्धनता को कम कर सकते है।
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