साझेदारी की अवधारणा एवं निर्माण ,विशेषताएँ - Concept and Formation of Partnership, Features
साझेदारी की अवधारणा एवं निर्माण ,विशेषताएँ - Concept and Formation of Partnership, Features
अंग्रेजी साझेदारी अधिनियम, 1890 के अनुसार, साझेदारी लाभ की दृष्टि से मिलजुलकर व्यापार करने के लिए व्यक्तियों के मध्य पाया जानेवाला संबंध है।
भारतीय साझेदारी अधिनियम 1932 की धारा 4 के अनुसार, " साझेदारी उन व्यक्तियों का पारस्परिक संबंध है जिन्होंने किसी ऐसे कारोबार के लाभ को आपस में बाँटने का ठहराव किया हो जिसे वह सब अथवा उन सबकी ओर से कार्यकरते हुए उनमें से कोई एक व्यक्ति द्वारा चलाया जाता हो।"
वे व्यक्ति जो एक-दूसरे के साथ साझेदारी कारोबार में सम्मिलित हुए हैं, व्यक्तिगत रूप से साझेदार तथा सामूहिक रूप से फर्म कहलाते हैं और जिस नाम से उनका कारोबार चलाया जाता है वह फर्म का नाम कहलाता है।
साझेदारी की विशेषताएँ
साझेदारी की निम्नलिखित विशेषताएँ है:
I. दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होना साझेदारी के लिए दो या दो से अधिक व्यक्तियों का हो परम आवश्यक हैं क्योंकि कोई भी अकेला व्यक्ति स्वयं का साझेदार नहीं हो सकता है। यदि किसी संस्था में किसी साझेदार की मृत्यु अथवा दिवालिया होने के कारण साझेदारी की संख्या एक ही रह जाती हैं, तो साझेदारी का अनिवार्य रूप से समापन हो जायेगा।
ii. ठहराव का होना अनुबंध के द्वारा ही साझेदारी का जन्म होता है अत: यह आवश्यक है कि साझेदारी के बीच ठहराव हो, क्योंकि साझेदारों का अनुबंध से संबंध है, स्थिति से नहीं ।
iii. कारोबार का होना - साझेदारी के लिए किसी भी कारोगार का होना आवश्यक है। यदि बिना किसी कारोबार की दृष्टि से दो या दो से अधिक व्यक्ति आपस में समझौता करे तो उसे साझेदारी का समझौता नहीं कहेंगे।
iv. लाभ कमाना तथा उसे आपस में बाँटना कोई भी कारोबार जो कल्याणकरने अथवास परोपकार की दृष्टि से किया जाता है, साझेदारों के वास्ते लाभ कमाने के लिए नहीं, साझेदारी नहीं हो सकती, क्योंकि साझेदारी का मूल उद्देश्य लाभ कमाना तथा उसे आपस में बाँटना होना चाहिए।
V. संचालन सबके द्वार अथवा सबकी सहमति से किसी एक के द्वारा साझेदारी कारोबार का - संचालन सबके द्वारा अथवा सभी साझेदारों की सहमति से किसी एक साझेदार के द्वारा किया जा सकता है।
इस प्रकार सभी साझेदारों का सक्रिय रूप से साझेदारी कारोबार में भाग लेना आवश्यक नहीं होता है। प्रत्येक साझेदार अपनी फर्म का एजेन्ट एवं स्वामी दोनों साझेदारी में प्रत्येक साझेदार अपनी फर्म का एजेन्ट होता है क्योंकि वह अपने कार्यों के द्वारा फार्म को बद्ध कर सकता है।
VI. किस भी साझेदार के द्वार किया गया कार्य फर्म द्वारा किया गया कार्य माना जाता है। साथ ही प्रत्येक साझेदार फर्म का स्वामी होता है, क्योंकि वह फर्म के दूसरे साझेदार के कार्य के प्रति स्वयं बद्ध होता है।
vii. साझेदारों की अधिकतम संख्या भारतीय साझेदारी अधिनियम में साझेदारों की न्यूनतम संख्या का उल्लेख किया गया है परन्तु अधिकतम संख्या का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है।
viii. असीमित दायित्व का होना साझेदारी में प्रत्येक साझेदार का दायित्व असीमित होता है। यह दायित्व व्यक्तिगत तथा समूहिक दोनों ही स्थितियों में होता है।
ix. फर्म का निश्चित नाम साझेदार जिस नाम से कारोबार करते हैं वह फर्म का नाम कहलाता है। किसी भी साझेदारी फर्म का निश्चित नाम होना अनिवार्य है।
X. केवल व्यक्ति ही साझेदार किसी भी साझेदारी फर्म में केवल व्यक्ति ही साझेदार बन सकते हैं। कोई भी समामेलित संस्था जैसे- कम्पनी, निगम, फर्म आदि साझेदार नहीं बन सकते है।
xi पूँजी लगाना अनिवार्य नहीं - साझेदारी के कारोबार में प्रत्येक साझेदार द्वारा पूँजी लगाना अनिवार्य नहीं होता है। साधारणतया प्रत्येक कुछ व्यक्ति अपनी व्यावसायिक कुशलता के कारण साझेदार बन जाते है।
xii. हानि में भी भाग लेना आवश्यक जिस अनुपात में साझेदार फर्म के लाभों में भाग लेते हैं किसी विपरीत अनुबंध के अभावमें उसी अनुपात में फर्म के हानियों में भी सभी साझेदारों को भाग लेना आवश्यक हाता है।
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