उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम: एक परिचय - Consumer Protection Act: An Introduction
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम: एक परिचय - Consumer Protection Act: An Introduction
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 एक ऐसा अधिनियम है जिसका लाक्ष्य देश के सभी उपभोक्ताओं को शोषण से बचाना है। यह सर्व विदित है कि अधिकांश उपभोक्ता निर्धन, बाजार व्यवस्था प्रणाली से अनभिज्ञ तथा गैर-जागरूक है । भारतीय बाजार विक्रेता बाजार है, जहाँ उपभोक्ता को सरलतापूर्वक धोखा दिया जा सकता है। शोषित उपभोक्ता न्यायालय तक जाने की स्थिति में नहीं होता है। अतः उसे शीघ्र एवं सस्ते न्याय की आवश्यकता होती है। यह अधिनियम उपभोक्ताओं के अधिकारों को मान्यता देता हैं तथा सुव्यवस्थित समाधान व्यवस्था स्थापित करता है। यह ऐसा अधिनियम है जिसमें यह प्रावधान रखा गया कि उपभोक्ताओं के अधिकारों को क्षति पहुँचाने वालों को दंडित किया जाना चाहिए तथा उपभोक्ताओं को जागरूक किया जाना चाहिए।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 को 1991, 1992 तथा 2002 में संशोधित कर इसे और अधिक असरदार एवं उद्देश्य पूर्ण बनाया गया।
पूँजीवादी समाज में उपभोक्ता ही राजा होता है क्योंकि वह उद्योगपतियों के उत्पादों के प्रति जो अनुक्रिया अपनाता है, उनसे ही उस समाज की पूरी अर्थव्यवस्था का स्वरूप निर्धारित होता है। दूसरे शब्दों में, बाजार नियंत्रित समाजों की मूलभूत प्रकृति यह है कि यहां उत्पादक एवं उपभोक्ता पूरी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए दो पहियों की तरह काम करते हैं मगर व्यवहारत: उपभोक्ता उत्पादक की तुलना में अधिक आधार प्रदान करता है। यह स्थति तब और स्पष्ट हुई जब विश्व के विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण की संकल्पना को अपनाया गया तथा बाजार के विभिन्न कारोबारियों के बीच प्रतिस्पर्धा की शुरूआत हुई।
इस परिस्थिति में कम से कम सिद्धान्ततः उपभोक्ताओं को अधिक से अधिक सुरक्षा की आवश्यकता हुई हाल के वर्षों में सिद्धान्तहीन एवं अधिक मुनाफा कमाने की सोच वाले उत्पादक एवं व्यापारी द्वारा उपभोक्ताओं की भलाई के विपरीत काम किया गया है और वस्तुओं तथा सेवाओं के खरीद पर उपभोक्ताओं को असहाय एवं उपेक्षा का शिकार बनाया गया है। जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उपभोक्ता प्रायः व्यापारियों द्वारा बड़े पैमाने पर फैलाए गये झूठे वादे के झांसे में आ जाते हैं। इस दिशा में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए और उनके दावे के निराकरण हेतु तकनीक के विकास के लिए देश में उपभोक्ता संरक्षण कानून को 1986 में पारित किया गया। उपर्युक्त शीर्षक के तहत उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा से संबंधित विभिन्न मुश्किलों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। इसके अलावा उपभोक्ताओं के अधिकार एवं दायित्व का भी विश्लेषण किया गया है। साथ ही देश में शिकायत निवारण तंत्र की स्थिति पर विशेष जोर देते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के कार्यों की विश्लेषणात्मक व्याख्या पर भी जोर दिया गया है।
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