उपभोक्ता के अधिकार - consumer rights

उपभोक्ता के अधिकार - consumer rights


विज्ञान एवं प्रौधोगिकी के तेजी से विकास की ओर अग्रसर होने के कारण तकनीकी एवं उच्च विशेषता वाले असहज उत्पादों के निर्माण होने से उपभोक्ताओं में उनके उपभोग के लिए सस्ता एवं अच्छा उत्पाद के 'चुनाव व के लिए व्यापक संशय उत्पन्न हो गया है। आधुनिक व्यावसायिक तकनीकों और लुभावने विज्ञापनों पर विश्वास कर लोग वस्तु को खरीद तो करते हैं परन्तु यह उनके उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतरती है। उपभोक्ता के हितों की देखरेख के लिए संगठनों के अभाव होने से यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए कई संस्थागत प्रणाली की शुरूआत विभिन्न देशों में की गई।


बीसवीं शताब्दी में पहली बार महात्मा गांधी का ध्यान उपभोक्ता अधिकारों की ओर गया जिनका यह मानना था कि सभी व्यवसाय उपभोक्ता की संतुष्टि के लिए होते हैं।

कुछ समय पश्चात उपभोक्ता अधिकारों पर चर्चा संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संबंधी विषयों पर भी हुआ। उपभोक्ता अधिकारों पर पह वक्तव्य अमेरिका के राष्ट्रपति जान एफ कैनेडी के द्वारा दिया गया। इन्होंने 15 मार्च 1962 को कांग्रेस को संबोधित करते हुए मूलभूत उपभोक्ता अधिकारों को परिभाषित करते हुए उन्हें मान्यता दी तत्पश्चात संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार के घोषणा पत्र में सुरक्षा का अधिकार, सूचना पाने का अधिकार, चुनाव या पसंद का अधिकार एवं मानवाधिकार के अन्तर्गत सुनवाई या अपील का अधिकार आदि को शामिल किया गया। 15 मार्च को प्रत्येक वर्ष विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाये जाने की घोषणा की गई।


उपभोक्ता संघों के अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के गठन से उपभोक्ता अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों को एक नया आयाम मिला। देश के हर क्षेत्र में उपभोक्ता अधिकारों को कार्यानिवत करने एवं लोकप्रिय बनाने के लिए भारत में भी भारतीय उपभोक्ता संगठनों के संघ की स्थापना हुई। उपभोक्ता अधिकारों की सूची में और कई नये अधिकार शामिल हुए। उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए एक नयी प्रणाली के गठन की मांग उठी।