बैंकों द्वारा साख का निर्माण - Creation of credit by banks

बैंकों द्वारा साख का निर्माण - Creation of credit by banks


वर्तमान अर्थव्यवस्था में साख के महत्व की व्याख्या करने के पश्चात् यह आवश्यक हो जाता है कि हम यह देखें कि साख का निर्माण किस प्रकार होता है तथा उसकी सीमाएं क्या हैं? किसी भी देश में जिस प्रकार विधिग्राह्म मुद्रा का निर्माण वहाँ की सरकार तथा केंद्रीय बैंक द्वारा किया जाता है, वहाँ की बैंकिंग व्यवस्था साख का निर्माण करती है। सेयर्स के अनुसार, "बैंक केवल मुद्रा जुटाने वाली संस्थाएँ नहीं है, अपितु एक महत्वपूर्ण अर्थ में मुद्रा की निर्माता भी है।" अधिकांश मुद्रा शास्त्री - हार्टले विदर्स, केन्स, सेयर्स, हाम आदि-यह स्वीकार करते है कि बैंक का महत्त्वपूर्ण कार्य साख का निर्माण करना है। वैसे तो केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए नोट भी एक प्रकार साख पत्र ही है,

क्योंकि उनका निर्गमन शत-प्रतिशत धात्विक कोष के बजाय केंद्रीय बैंक की साख पर आधारित होता है, परंतु चूंकि इन नोटों को विधिग्राह्य मुद्रा का रूप प्राप्त होता है, इसलिए इन्हें व्यवहार में बैंक साख अथवा बैंक मुद्रा से अलग समझा जाता है।


बैंक मुद्रा अथवा साख मुद्रा का संबंध वाणिज्यिक बैंकों के पास जमा की गई उस राशि से होता है जिसे चैक के द्वारा निकाला जा सकता है। चूँकि यह माँग पर देय होती है इसलिए इसे माँग जमा अथवा जमा मुद्रा कहते है। इस प्रकार की बैंक जमा बढ़ने पर ही साख मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि होती है। बैंक अपनी कुल जमाराशि से कई गुना अधिक राशि उधार देकर साख मुद्रा का निर्माण करते है ।


केन्स तथा सी.ए. फिलिप्स के विचारों के आधार पर प्रो हाम ने दो प्रकार की जमाराशियों का उल्लेख किया है- प्रारम्भिक जमा तथा व्युत्पन्न जमा प्रारम्भ जमा से अभिप्राय उन जमाराशियों से है

जो नकदी अथवा वास्तविक मुद्रा के रूप में जमाकर्ता बैंक में जमा करते हैं। इनको निष्क्रिय जमा अथवा नकद जमा भी कहा जा सकता है। इसके विपरीत, जब बैंक किसी को ऋण देने के उद्देश्य से उसके नकद साख खाते में कुछ रकम लिख देता है, तो इस प्रकार उत्पन्न होने वाली जमा व्युत्पन्न जमा कहलाती है। इसको साख जमा अथवा गौण जमा भी कहते हैं। व्युत्पन्न जमा प्रारम्भिक जमा का ही परिणाम होती है, क्योंकि बैंक नकद जमा का कुछ भाग कोष में रखकर साख जमा की ही सृजन करता है हाम के अनुसार, व्युत्पन्न जमा का निर्माण ही साख का सृजन है।"


इस प्रकार बैंक जितना अधिक ऋण देता है उतना ही अधिक साख उत्पन्न होती है तथा ऋण का निर्माण होता है। इसलिए कहा जाता है कि जमाराशियाँ साख को जन्म देती हैं

और साख जमाराशियों को जन्म देती है। साख मुद्रा के निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन क्रमश: एक बैंक तथा बहु बैंक बैंकिंग प्रणाली के अंतर्गत किया जा सकता है।


देश में केवल एक ही बैंक होने की स्थिति में मान लीजिए इस बैंक को माँग जमा के रूप में कुल 1,000 रू. की राशि प्राप्त होती है। यदि बैंक इस सम्पूर्ण राशि को नकद कोष के रूप में अपने पास रख लेता है, तो 1,000 रू. की वास्तविक मुद्रा बैंक मुद्रा मे बदल जाती है। चूंकि बैंका को प्राप्त जमाराशि पर ब्याज देनी पड़ती है और बैंक यह जानता है कि जमाकर्ता एक साथ सम्पूर्ण राशि निकालने की माँग नहीं करेंगे, इसलिए इस रकम का एक निश्चित भाग नकद कोष में रखकर शेष 800 रू बैक किसी को ऋण के रूप में दे देता है अथवा प्रतिभूतियों आदि में निवेश करता है। बैंक को 1,000 रू. की नकद जमा प्राप्त होने पर वास्तविक मुद्रा बैंक मुद्रा में बदल गयी थी,

परंतु मुद्रा की कुल पूर्ति में कोई परिवर्तन नही हुआ था। अब 800 रू के ऋण देकर बैंक द्वारा लोगों को इतनी बैंक मुद्रा का उपयोग करने का अधिकार दिया गया है। बैंक ने अपने पास केवल 200 रू. की नकद मुद्रा रखकर जनता के लिए 1,000 रू की बैंक मुद्रा की व्यवस्था की है जिसके परिणामस्वरूप 800 रू. की नकद मुद्रा बैंक मुद्रा में बदल गई है। एक व्यक्तिगत बैंक यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि अपनी नकद जमा से अधिक मात्रा में वह ऋण दे सकता है अथवा विनियोग कर सकता है। 20 प्रतिशत नकद कोष रखने पर यह बैंक 1,000 रू की नकद जमा प्राप्त होने पर 800 रु तक के ऋण दे सकेगा, अधिक नहीं।


यद्यपि कोई एक बैंक व्यक्तिगत रूप से अपनी कुल प्रारम्भिक जमा का केवल कुछ ही भाग ऋणों व निवेशों मे लगा सकता है, परंतु बहु बैंक बैंकिंग प्रणाली के अंतर्गत अर्थव्यवस्था में संपूर्ण बैंकिंग प्रणाली कुछ प्रारंभिक जमाओं की राशि से कई गुना अधिक राशि ऋणों तथा निवेशों में लगातार साख मुद्रा का निर्माण करती है।

परिणामस्वरूप व्युत्पन्न जमाओं का आकार प्रारंभिक जमाओं के आकार से कई गुना अधिक हो सकता है। सम्पूर्ण बैंकिंग प्रणाली की दृष्टि से साख मुद्रा के निर्माण की इस प्रक्रिया को बैंक जमाओं का बहुगुणक विस्तार कहते है। इस प्रक्रिया को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।


पहले का उदाहरण लेने हुए यदि एक बैंक की प्रारंभिक जमा 1,000 रू है, तो इसमें से वह 20 प्रतिशत कोष में रखकर 800 रू का ऋण देता है जो ऋणी के माँगने पर प्राप्त किया जा सकता है। इस ऋणी को अब यह अधिकार प्राप्त है कि वह ऋण की राशि के बराबर चैक काट सकता है। इस बैंक का ऋणी जब विभिन्न भुगतानों के लिए चैक काटता है तो ये बैंक अन्य बैंकों में उनकी प्रारंभिक जमा राशि के रूप में जमा हो जाते है। इस प्रकार एक बैंक की व्युत्पन्न जमा दूसरे बैंकों की प्रारंभिक जमा बन जाती है। मान लीजिए, यह 800 रू. की रकम किसी प्रकार दूसरे बैंक के पास जमा के रूप में पहुँच जाती है जो यह बैंक इसका 20 प्रतिशत कोष में रखकर शेष 640 रु. की रकम पुन उधार दे देगा। यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा जब तक कि सम्पूर्ण बैंकिंग व्यवस्था की जमा पाँच गुनी नहीं बढ जाती ।