फर्म के आकार को मापने के मापदण्ड- Criteria for measuring the size of a firm
फर्म के आकार को मापने के मापदण्ड- Criteria for measuring the size of a firm
वर्तमान समय तक फर्म का आकार छोटा है या बड़ा है, यह निर्धारित करने के लिये कि किसी फर्म का आकार छोटा है या बड़ा कोई सर्वमान्य मापदण्ड नहीं है। अतः फर्म का आकार बड़ा है या छोटा, यह निर्धारित करने के लिए निम्न तरीकों का संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है:
1 आदान पद्धति के आधार पर (Inputs Method)
2 प्रदान पद्धति के आधार पर (outputs Method)
3 प्रबन्धकीय जटिलता के आधार पर (Management )
अब हम उपर्युक्त तीनों पद्धतीयों का विस्तार से वर्णन करेंगे:
1. आदान पद्धति के आधार पर - आदान पद्धति के अन्तर्गत निम्न प्रमापों का प्रयोग किया जाता है :
(1) विनियोजित पूँजी फर्म के आकार को मापने को श्रेश्ठतम प्रमाप उस फर्म में विनियोजित पूँजी की मात्रा ही है। विनियोजित पूँजी की मात्रा की गणना करते समय निम्न का योग किया जाता है।
i. Paid up Share Capital
ii. Debentures
iii. Loan From Financial Institutions
iv. Amount of Working Capital.
हमारे देश में लघु उद्योग एवं बड़े उद्योग का निर्धारण करते समय इस तरीके को ही अपनाया जाता है। यदि किसी फर्म में 10 लाख रूपये से अधिक पूंजी का विनियोग है तो वह बड़ी फर्म कहलाती है और कम का विनियोग होने पर छोटी फर्म कहलाती है। आत की इस मुद्रा स्फीति की स्थिति में यह तरीका अधिक व्यावहारिक प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि मुद्रा स्फीति के कारण पुरानी फर्म में विनियोजित पूँजी की राशि कम होगी और नये उद्योग में मुद्रा स्फीति के कारण विनियोजित पूँजी की राशि अधिक होगी।
(2) श्रमिकों को उपलब्ध रोजगार श्रमिकों को उपलब्ध रोजगार को श्रमिकों की संख्या अथवा मजदूरी भुगतान बिल की राशि द्वारा मापा जा सकता है।
जिस फर्म में श्रमिकों की संख्या अथवा मजदूरी भुगतान बिल की राशि कम है तो फर्म का आकार छोटा माना जायेगा आज के मशीन युग में जहाँ सब उत्पादन प्रक्रियायें स्वचालित हैं तथा कम्प्यूटर के माध्यम से संचालन होता है यह तरीका अव्यावहारिक प्रतीत होता है। क्योंकि यह सम्भव है कि स्वचालित यन्त्रों द्वारा थोड़े से श्रमिको से बड़ी मात्रा में उत्पादन किया जा सकता है।
( 3 ) उत्पादन में प्रयुक्त कच्चे माल की मात्रा इस मापदण्ड के अनुसार जो औद्योगिक फर्म अधिक कच्चे माल का प्रयोग काती है वह बड़ी फर्म कहलाती है तथा तुलनात्मक दृष्टि से जो औद्योगिक इकाई कम कच्चे माल का प्रयोग करती है वह छोटी फर्म कहलाती है। इस मापदण्ड को भी वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उत्पादन में कटौती, हड़ताल, तालाबन्दी, उत्पादन कार्य में स्तब्धता आदि कारणों से भी कम कच्चा माल प्रयोग में लिया जा सकता है।
(4) उत्पादन में प्रयुक्त विद्युत शक्ति या ईंधन की मात्रा - इस मापदण्ड के अनुसार जो फर्म विद्युत शक्ति या ईंधन का तुलनात्मक रूप से अधिक प्रयोग करती है वह फर्म बड़ी फर्म कही जाती हैं।
व्यवहार में यह मापदण्ड भी वैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह सम्भव है कि किसी फर्म ने ऐसी आधुनिक मशीनें बना रखी हों जिनके माध्यम से कम ईंधन या विद्युत उपभोग से अधिक उत्पादन सम्भव हो, यह भी सम्भव है कि फर्म अधिकतर उत्पादन हाथ से करती हो जिसमें ईंधन के स्थान पर श्रम शक्ति का अधिक प्रयोग होता हो।
( 5 ) मशीनों की संख्या या क्षमता- इस मापदण्ड के अनुसार जो फर्म अधिक बड़ी अथवा अधिक संख्या में मशीनें लगी होती हैं
वह फर्म आकार की दृष्टि से छोटी मानी जाती है। इस मापदण्ड को और अधिक वैज्ञानिक बनाने के लिए मशीनों की संख्या के स्थान पर मशीन कितनी अश्व शक्ति से संचालित होती है, उसको ध्यान में रखा जा सकता है।
2 प्रदान पद्धति के आधार पर - प्रदान पद्धति के अन्तर्गत निम्न प्रमापों का प्रयोग किया जा सकता हैं
1. फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मात्रा- जब एक ही उद्योग की विभिन्न फर्मों की तुलना करनी हो जो एक समान वस्तु का उत्पादन करती है तो इन फर्मों के उत्पादन की भौतिक मात्रा के आधार पर उनके आकार का निर्धारण सम्भव है। इस प्रमाप के अनुसार तुलनात्मक दृष्टि से अधिक मात्रा में उत्पादन करने वाली फर्म का आकार बड़ा और थोड़ी मात्रा में उत्पादन करने वाली फर्म का आकार छोटा माना जाता है। यह मापदण्ड सीमेन्ट, कोयला एवं चीनी उत्पादन करने वाली फर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
2. फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुओं की मूल्य इस मापदण्ड के अनुसार उत्पादित वस्तुओं के मौद्रिक मूल्यों का प्रयोग किया जाता है। यह प्रमाप उस समय सर्वश्रेष्ठ है जब फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुएँ समान किस्म एवं प्रमाप की नहीं होती है। लेकिन इस प्रमाप का सबसे बड़ा दोष यह है मन्दी एवं तेजी काल में उत्पादन के मूल्य में काफी उतार-चढ़ाव हो सकते हैं जिसके कारण परिणाम भ्रामक हो सकते हैं।
3. उत्पादन की मात्रा एवं मूल्यों का योग - इस पद्धति में उपर्युक्त दोनों पद्धतियों के गुणों का समावेश किया गया है।
3. प्रबन्धकीय जटिलता के आधार पर - प्रबन्ध वैज्ञानिकों ने प्रबन्धकीय जटिलता के आधार पर उद्योग के आकार का विभाजन किया है। पीटर एफ. ड्रकर के अनुसार, "जिन व्यावसायिक फर्मों की प्रबन्ध व्यवस्था जितनी अधिक जटिल होगी वह फर्म उतनी ही बड़े आकार वाली कही जायेगी।"
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