नीति की आलोचनात्मक समीक्षा - critical review of policy

नीति की आलोचनात्मक समीक्षा - critical review of policy


औद्योगिक नीति, 1956 की निम्नलिखित आधारों पर कटु आलोचना की गई-


(i) निजी क्षेत्र की उपेक्षा- इस नीति में निजी क्षेत्र का दायरा संकुचित करके सरकार ने उनके साथ अन्याय किया है। इसमें भी राष्ट्रीयकरण की धमकी परोक्ष रूप से विद्यमान हैं।


(ii) अस्पष्ट नीति - यह नीति अस्पष्ट व अनिश्चित है। इसमें राष्ट्रीयकरण की नीति को स्पष्ट नहीं किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकार किसी भी उपक्रम अथवा उद्योग को अपने अधिकार में ले सकती है।


(iii) राजकीय पूंजीवाद को बढ़ावा आधारभूत उद्योगों की स्थापना में सार्वजनिक क्षेत्र को जो महत्व दिया गया है, उससे राजकीय पूंजीवाद को भी बढ़ावा मिलता है। 


(iv) आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण निजी क्षेत्र की अपेक्षा राजनीतिज्ञों और पदाधिकारियों के हाथों में था जो देश के हित में नहीं था। 


(v) श्रम हितों की रक्षा:-इन नीतियों में श्रमिकों के हितों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। 


(vi) अस्पष्ट विदेशी पूंजी नीति- विदेशी पूंजी के विषय में इस नीति के अंतर्गत कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं की गई।


(vii) स्थिरता का अभाव- इस नीति में स्थिरता का अभाव है। नीति में बार-बार परिवर्तन लाने से निजी क्षेत्र को ठेस पहुंचती है।


(viii) अवास्तविक इस नीति में सैद्धांतिक पहलू पर अधिक बल दिया गया है। समाजवादी समाज की स्थापना के जोश में आकर वास्तविकता को भुला दिया गया है।