राष्ट्रीय आय का आलोचनायें - Criticisms of National Income

राष्ट्रीय आय का आलोचनायें - Criticisms of National Income


प्रो० पीगू की परिभाषा मार्शल के विपरीत व्यवहारिकता का गुण रखती है और इस परिभाषा ने राष्ट्रीय आय की धारणा को काफी हद तक स्पष्टता तथा निश्चितता भी प्रदान की है। किन्तु उसके बावजूद इस परिभाषा के कुछ दोष बताये जाते हैं जो इस प्रकार हैं : (i) पीगू के विचार बहुत ही सकीर्ण तथा विरोधाभास से भरपूर हैं। उदाहरण के लिये यदि कोई व्यक्ति अपनी नौकरानी को उसकी सेवाओं के बदले में 1000 प्रतिमाह चुकाता है तो उस नौकारनी की सेवायें राष्ट्रीय आय में सम्मिलित की जायेगी क्योंकि उसकी सेवाओं की कीमत मुद्रा के रूप में व्यय की गयी है। अब यदि वह व्यक्ति अपनी नौकरानी से विवाह कर लेता है तो उसकी सेवायें राष्ट्रीय आय में सम्मिलित नहीं की जायेंगी, क्योंकि अब उनका कोई मौद्रिक मूल्य नहीं रह जाता। अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि नौकरानी की सेवाएं वही हैं

लेकिन कभी वे राष्ट्रीय आय में सम्मिलित होती है और कभी नहीं । (ii) यह परिभाषा केवल मौद्रिक अर्थव्यवस्था में ही लागू हो सकती है और जिन देशों में अधिकाश वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा द्वारा विनिमय नहीं किया जाता वरन् प्रत्यक्ष रूप से अदल-बदल हो जाता है, वहां इस परिभाषा का कोई महत्व नहीं है।


प्रो० फिशर, के शब्दों में, "राष्ट्रीय लाभाष अथवा आय में केवल अंतिम उपभोक्ताओं द्वारा प्राप्त की जाने वाली सेवाओं का चाहे ये सेवाएं भौतिक परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हों, चाहे मानवीय कारणो सैद्ध समावेश होता है प्रो० फिशर ने उपभोग के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि इस प्रकार एक पियानो अथवा ओवरकोट जो मेरे लिए इस वर्ष बनाया गया है, वह इस वर्ष की आय का हिस्सा नहीं है,

बल्कि व तो पूजी में वृद्धि मात्रा है हा वे सेवायें जो इसी वर्ष के दौरान मुझे प्राप्त हुई हैं, केवल वही राष्ट्रीय आय है।


स्पष्ट है कि फिशर के अनुसार राष्ट्रीय लाभांश में कुल उत्पत्ति का मूल्य सम्मिलित नहीं किया जाता बल्कि उत्पत्ति में केवल उस भाग का मूल्य ही राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है जिसका उस वर्ष विशेष में उपभोग किया गया है। उदाहरण के तौर पर यदि इस वर्ष के मशीन तैयार की गयी है जिसका मूल्य 50,000 रु0 है और उस मशीन का जीवनकाल 10 वर्ष है तो मशीन का इस वर्ष का उपभोग मूल्य 5000 रु० हुआ जो उस वर्ष की राष्ट्रीय आय में जुड़ जायेगा, जबकि उसके विपरीत मार्शल व पीगू के अनुसार मशीन की सम्पूर्ण कीमत यानी 50,000 रु0 इस वर्ष की आय में सम्मिलित की जायेगी।


निःसन्देह फिशर का दृष्टिकोण मार्शल एवं पीगू के दृष्टिकोण से अधिक श्रेष्ठ एवं वैज्ञानिक हैं क्योंकि उसने एक वर्ष विशेष में वास्तविक उपभोग के मौद्रिक मूल्य को ही राष्ट्रीय आय का अंग माना है। इतना ही नहीं, फिशर का दृष्टिकोण आर्थिक कल्याण की विचारधारा के अधिक निकट है क्योंकि समाज का आर्थिक कल्याण वस्तुओं एवं सेवाओं के कल उत्पादन पर नहीं बल्कि उनकी उस मात्रा पर निर्भर करता है जो एक समाज को उस वर्ष विशेष में उपभोग के लिये उपलब्ध होती है।