अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आलोचनाएं / असफलताएं - Criticisms/failures of the International Monetary Fund
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की आलोचनाएं / असफलताएं - Criticisms/failures of the International Monetary Fund
इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मुद्रा कोष अपने उद्देश्यों में पूर्ण रूप से सफल हुआ है। इसकी अनेक कमियां हैं, जिनके आधार पर ही आलोचना की गई है। मुद्रा कोष की आलोचनाएं निम्नलिखित हैं:
(i) वैधानिक आधार नहीं मुद्रा कोष ने अपने सदस्य राष्ट्रों के अभ्यशों का निर्धारण उनकी राष्ट्रीय आय, स्वर्ण कोष, विदेशी व्यापार एवं भुगतान शेष की स्थिति के आधार पर किए हैं। परंतु यह तरीका वैज्ञानिक नहीं है।
(ii) विनिमय नियंत्रणों को दूर करने में असमर्थता:- मुद्रा कोष विदेशी व्यापार पर लगाए गए प्रतिबंधों तथा विनिमय नियंत्रण को समाप्त नहीं कर सका है। ससार के कई देशों ने संरक्षण की नीति को और बढ़ा दिया है।
(iii) स्वर्ण के मूल्य में स्थिरता का अभाव - मुद्रा कोष में स्वर्ण की कीमतों की स्थिरता लाने में सफल नहीं हो सका। सोने का मूल्य सन 1971 तक 35 डॉलर प्रति औस स्थिर रखा गया। परंतु इसके पश्चात यह मूल्य स्थिर नहीं रह सका। यह बढ़कर 1500 डालर प्रति औसत तक हो गया।
(iv) विनिमय स्थिरता का अभाव- मुद्रा कोष विनिमय स्थिरता के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सका। सन 1971 तक कोष स्थिर विनिमय दर निर्धारित करने में सफल रहा। परंतु सन 1971 के पश्चात विनिमय दर में दुबारा परिवर्तन हो गया। यह मुद्रा कोष की सबसे बड़ी असफलता है। यहां तक की अनेक देशों ने कोष से नाममात्र के परामश के बाद अपनी विनिमय दरों में परिवर्तन कर लिए हैं।
(v) सदस्य देशों के साथ समान व्यवहार का अभाव- मुद्रा कोष का सभी सदस्य देशों के साथ एक सा व्यवहार नहीं है। कोष द्वारा धनी देशों को विशेष सुविधायें प्रदान की जाती हैं, परंतु अविकसित देशों की उपेक्षा की जाती है। अफ्रीका के कुछ राष्ट्रों ने तो मुद्रा कोष को अमीरों का क्लब कहा है।
(vi) दानी संस्था - आलोचकों का विचार है कि मुद्रा कोष केवल एक दानी संस्था है। इसका मुख्य कार्य कुछ धनी देशों के धन का प्रयोग उनके समर्थक राष्ट्रों को सहायता देने के लिए किया जाता है, ताकि वे अपने भुगतान शेष के असंतुलन को ठीक कर सके। इस कारण उनका आर्थिक विकास नहीं होता, अपितु विदेशी ऋणग्रस्तता में वृद्धि होती है।
(vii) बहुमुखी विनिमय दर का अंत न हो सका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष बहुमुखी विनिमय प्रणाली को समाप्त नहीं कर सका है। बहुमुखी विनिमय प्रणाली के अंतर्गत एक देश विभिन्न सौदों के लिए विभिन्न दरे अपनाता है। उदाहरण के लिए 1971 में फ्रांस ने दो प्रकार की विनिमय दरों को अपनाया था, एक वास्तविक व्यापार के लिए स्थिर विनिमय दर तथा दूसरे सट्टा सौदों के लिए परिवर्तनशील विनिमय दर को अपनाया था।
(viii) 1971 के मौद्रिक संकट का समाधान नहीं - सन् 1971 में अमेरिका ने डालर की स्वर्ण में परिवर्तनशीलता समाप्त कर दी तथा उसका अवमूल्यन कर दिया। परिणामस्वरूप संसार में मौद्रिक संकट उत्पन्न हो गया। मुद्रा कोष इस संकट का समाधान नहीं कर सका।
इस सकट के फलस्वरूप मुद्रा कोष के स्वर्णमान तथा स्थिर विनिमय दर के उद्देश्यों को छोड़ना पड़ा। यह मुद्रा कोष की सबसे बड़ी असफलता है।
(ix) अंतरराष्ट्रीय तरलता का समाधान नहीं ले पाया मुद्रा कोष अंतरराष्ट्रीय तरलता का उचित समाधान नहीं कर सका है। यद्यपि फंड ने अपने स्थायी कोष में काफी वृद्धि की है तथा विशेष प्राप्त अधिकार के रूप में नई करसी का निर्माण भी किया है। लेकिन फिर भी तरलता की समस्या बनी हुई है। फलस्वरूप आई.एम.एफ. के लिए विकासशील देशों को पर्याप्त मात्रा में धन उधार देना कठिन होगा तथा उनके भुगतान संतुलन के घाटे को पूरा करने के लिए सहायता देना संभव नहीं होगा।
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