मुद्रा के दोष - currency demerits

मुद्रा के दोष - currency demerits


मुद्रा में अनेक गुणों के होते हुए भी यह मानव के लिए एक अमिश्रित वरदान नहीं है। जहाँ इससे अनेक लाभ है इसमें कुछ दोष भी है कुछ आर्थिक और कुछ सामाजिक दृष्टिकोण से । 


(क) आर्थिक दोष


(1) धन की विश्वासघातिनी संरक्षिका मुद्रा का मूल्य स्थिर नहीं रहता। पत्र मुद्रा और बैंक मुद्रा के प्रचलन में अस्थिरता और भी बढ़ गई है। वास्तव में मुद्रा के मूल्य में गिरावट की समस्या एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। कभी-कभी तो स्थिति अत्यन्त गंभीर हो जाती है। जर्मनी मे युद्ध के पूर्व लोग दुकानों पर मुद्रा जेब में रखकर ले जाते थे और सामान टोकरियों में लाते थे।

युद्ध के पश्चात् स्थिति यह हो गई कि मुद्रा तो टोकरियों में भरकर जाने लगी और माल जेबों में आने लगा। लोगों ने मुद्रा को अपने संचित धन का संरक्षण सौंपा और उनका धन लुट गया। प्रायः यह ताना दिया जाता है कि मुद्रा हमारे धन की एक विश्वासधातिनी संरक्षिका है।


(2) आर्थिक जीवन में अनिश्चिता मुद्रा व्यापार चक्रों को जन्म देती है। व्यापार चक्रों के अंतर्गत कभी आर्थिक तेजी से कभी मंदी की स्थिति उत्पन्न होती है और यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। वैसे तो व्यापार चक्रों के अनेक कारण बताए जाते हैं। परंतु इन सब में मौद्रिक कारण ही अधिक प्रभावपूर्ण है। केंस के अनुसार, व्यापारिक उतार-चढाव बचत तथा निवेश संबंधी निर्णयों में असमानता का परिणाम होते है। बचत तथा विनियोग दोनों ही मुद्रा से संबंधित होते हैं, इसलिए व्यापार चक्र एक मौद्रिक घटना ही तो है।


(3) शोषण-यंत्र - मुद्रा के विकास से ही पूँजीवाद का जन्म हुआ और पूँजी को केंद्रीयकरण कुछ लोगों के हाथों में हो गया। पूरा समाज हुजूर तथा मजूर दो वर्गों में बट गया। श्रमिक पूँजीपतियों पर आश्रित हुए और मजदूरी कम देकर पूँजीपतियों ने उनका शोषण किया। धन और संपति के वितरण में असमानताएँ बढ़ी। परिणामतः धनी अधिक धनी और निर्धन अधिक निर्धन बनते गए। एकाधिकार स्थापित हो जाने से उपभोक्ता के हितों की रक्षा न हो पायी। यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी धनी देशों ने निर्धन देशों का आर्थिक एवं राजनीतिक शोषण किया है। 


( 4 ) अपव्ययता में वृद्धि - मुद्रा ने मनुष्य को अपव्ययी बना दिया है। अति पूँजीकरण तथा अति उत्पादन को प्रोत्साहन मिला है,

जिससे अस्थिरता का वातावरण उत्पन्न होता है। अनुचित रूप से उपभोग पर अनावश्यक व्यय तथा सङ्केबाजी की प्रवृतियाँ भी मुद्रा का परिणाम है। मुद्रा के उपभोग में ऋणग्रस्तता में भी वृद्धि हुई है। 


(5) सेवक नहीं स्वामी मुद्रा हमारे जीवन की समस्त क्रियाओं पर इस तरह छा गयी है कि हमारे अधीन नहीं रही, बल्कि हम इसके अधीन हो गए हैं। मुद्रा उपयोगी तभी होती है जब सेवक के रूप मे हो, स्वामी के रूप में तो यह संपूर्ण अर्थव्यवस्था को अस्त व्यस्त करती है।


(ख) सामाजिक दोष


मुद्रा अनेक सामाजिक तथा नैतिक बुराइयों की जड है। जीवन के अभौतिक एवं नैतिक गुणों को समाप्त कर समाज का भौतिकतावादी शोषण मुद्रा के ही कारण होता है। मीसेस ने तो यहाँ तक लिखा है कि मुद्रा को चोरी, हत्या, छल तथा प्रतिज्ञा भंग का कारण माना गया है। जब वेश्या अपना शरीर तथा न्यायधीश अपना न्याय बेचता है तो मुद्रा की निंदा होती है। चरित्रवादी जब बहुत अधिक भौतिकवाद की निंदा करना चाहता है तब वह मुद्रा के ही विरूद्ध कहता है। लालच को मुद्रा प्रेम कहना और सब बुराइयों को लालच से उत्पन्न मानना अपना महत्व रखता है। रस्किन ने कहा कि मुद्रा के शैतान ने आत्माओं को दबा दिया है किसी भी धर्म या दर्शन में इसे बहिष्कृत करने की शक्ति नहीं दिखाई पड़ती है। ऐसा लगता है कि मुद्रा ने साधन के बजाय साध्य का रूप धारण कर लिया है, जिससे न केवल अभौतिक कल्याण में कमी हुई है बल्कि राजनीतिक भ्रष्टाचार रिश्वत, बेईमानी आदि को प्रोत्साहन भी मिला है।