वर्तमान व्यवस्था - current system
वर्तमान व्यवस्था - current system
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने विनिमय दरो के निर्धारण के लिए प्रबन्धित लोच की व्यवस्था स्थापित की थी। 1971 के पश्चात् यह व्यवस्था लड़खड़ाने लगी और 1973 के पश्चात सभी देशों ने मनमाने ढंग से विनिमय दरों का निर्धारण करना आरंभ कर दिया औद्योगिक देशों ने ये तर्क प्रस्तुत किये है कि भुगतान सन्तुलन में साम्यावस्था बनाये रखने तथा रोजगार स्तर को गिरने से बचाने के लिए परिवर्तनशील विनिमय दर ही उपयुक्त हैं। दूसरी और विकासशील देश विनिमय दरों में स्थिरता का समर्थन करते है।
1 अप्रैल 1978 से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोप के समझौता पत्र में हुए द्वितीय संशोधन के अंतर्गत सभी देशों को अपनी इच्छानुसार विनिमय दरों के निर्धारण करने की प्रणाली अपनाने का अधिकार मिल गया है। परन्तु प्रत्येक देश का यह उतरदायित्व माना गया है
कि वह अपनी आन्तरिक नीतियों का प्रयोग इस प्रकार करेगा कि नियमित आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ उपयुक्त कीमत स्थिरता भी प्राप्त की जा सके। किसी भी सदस्य देश द्वारा विनिमय दरों का प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जायेगा कि भुगतान संतुलन की समायोजन प्रक्रिया में कोई बाधा उत्पन्न हो अथवा इनसे उसे कोई अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त हो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को अधिकार दिया गया है कि वह सदस्य देशों की विनिमय दरो की नीतियों से संबंधित उनके दायित्वों तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा व्यवस्था के संचालन पर निगरानी रखे वास्तविकता यह है कि सभी देशों को अपनी मुद्राओं की विनिमय दरे स्वयं निर्धारित करने का अधिकार मिल गया है और ये मनमाने ढंग से इनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर सकते हैं।
अधिकांश देशों ने अपनी मुद्राएं किसी अन्य मुद्रा के समूह अथवा एस.डी.आर के साथ बांध रखी हैं। कुछ देश कुछ सूचकांकों के आधार पर समय-समय पर अपनी मुद्राओं के मूल्यों ने परिवर्तन कर लेते हैं।
यूरोपीय आर्थिक समुदाय के देशों ने सामूहिक विनिमय व्यवस्था अपनायी है। अन्य देशो ने कुछ अन्य व्यवस्थाएं अपनायी है। अधिक लचीली मुदाए प्रबन्धित अथवा स्वतंत्र रूप से तैर रही है। सत्तर के दशक के प्रारम्भ से अपनायी गयी लचीली विनिमय दर प्रणाली के कारण मौदिक प्राधिकरण का मार्गदर्शी सिद्धान्त यह रहा है कि विनिमय दर को स्थूल आर्थिक तत्वों के अनुरूप रहने दिया जाये तथापि अधिक खुली अर्थव्यवस्था वाले देश विनिमय दर के उतार-चढ़ाव को उस सीमा के भीतर रखना पसन्द करते है जिसको पार करने पर यह उतार-चढ़ाव अर्थव्यवस्था के मूल तत्वों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। विनिमय दर का उतार-चढ़ाव एकीकृत वित्तीय व्यवस्था के सन्दर्भ में नीतिगत दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया है। बाजार की कार्यक्षमता की परिकल्पना के अनुसार वायदा दरे भावी हाजिर दरों की निष्पक्ष भविष्य सूचक हैं।
भारत में विनिमय दर नीति इस मुख्य सिद्धान्त पर आधारित है कि विनिमय दरों में लचक के साथ-साथ इसका सावधानीपूर्ण प्रबन्धन किया जाए। मांग और पूर्ति की स्थिति के अनुसार विनिमय दरों का निर्धारण हो, परन्तु इसमें होने वाले परिवर्तनों को अव्यवस्थित न होने दिया जाए। इस उद्देश्य से रिजर्व बैंक की यह जिम्मेदारी है कि अनियमित उतार-चढ़ाव होने पर हस्तक्षेप करे ताकि अस्थिरता तथा सहेबाजी की प्रवृत्ति को रोका जाए। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में विदेशी विनिमय कोष रखना और एक नियमित विदेशी विनिमय बाजार विकसित करना आवश्यक समझा जाता है।
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