समंकों का विश्लेषण - data analysis

समंकों का विश्लेषण - data analysis


विपणन अनुसंधान के अंतर्गत संकलित समकों के विश्लेषण हेतु (अंतरों की सार्थकता की जांच ) अनेक सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। जैसा कि प्रारम्भ में बताया जा चुका है कि समको का संकलन मात्र ही किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता है। अन्य शब्दों में, संगृहित समको के विश्लेषण के दो प्रमुख उद्देश्य या सिद्धान्त है


→ सकलित किये गये समको के अंतरों की सार्थकता का परीक्षण करना तथा


→ उन अंतरों की व्याख्या करना।


(1) संकलित किये गये समको के अंतरों की सार्थकता ज्ञात करने हेतु निम्न विधियों का प्रयोग किया जा सकता है


(a) निदर्शन सिद्धान्त वर्तमान में अधिकतर अनुसंधान निदर्शन रीति द्वारा किये जाते है,

क्योंकि अनुसंधानकर्ता द्वारा ऐसा विश्वास किया जाता है कि किसी क्षेत्र में वैज्ञानिक ढंग से चुनी गयी निदर्श इकाइयों में वे सब विशेषताएं पायी जाती है जो पूरे समय में अन्तर्निहित होती है। इसी कारण विपणन अनुसंधान को ही नहीं, हमारे दैनिक जीवन की समान्य क्रियाए निर्णय भी कुछ इकाइयों के गहन अध्ययन पर आधारित होते हैं। प्रश्न यह है कि कुछ चुनी हुई इकाइयों के विश्लेषण द्वारा समग्र की सभी इकाइयों के बारे में विश्वसनीय जानकारी कसे प्राप्त की जा सकती है. अर्थात निदर्श के आधार पर सम्पूर्ण क्षेत्र के संबंध में हमारे अनुमान कहां तक विश्वसनीय है? यही मूल प्रश्न निदर्शन सिद्धान्त का आधार है। निदर्शन के उद्देश्य निदर्शन के निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्य हैं जिनकी प्राप्ति के लिए निदर्श कर अध्ययन किया जाता है 


(i) प्राचल का अनुमान निदर्शन का प्राथमिक उद्देश्य निदर्श का अध्ययन करके पूरे समय के बारे में कम से कम समय में और कम खर्च से अधिकाधिक यथार्थ सूचना उपलब्ध करना है।


(ii) परिकल्पना परीक्षण द्वितीय महत्वपूर्ण उद्देश्य निदर्श के आधार पर मूल समग्र के संबंध में किसी सुनिश्चित परिकल्पना की जांच करना है। परिकल्पना परीक्षण के अंतर्गत इस तथ्य की जाच की जा सकती है कि अवलोकित प्रतिदर्शज और परिकल्पित प्राचल में पाया जाने वाला अंतर केवल निदर्शन के उच्चावचनों के कारण है या वह सार्थक है तथा किसी अन्य कारण से है। यही परिकल्पना परीक्षण या सार्थकता कहलाता है। उदाहारणार्थ, एक मोटर टायर निर्माता द्वारा निर्मित टायरों की औसत आयु 20000 किलोमीटर और प्रताप विचलन 1000 किलेमीटर है। सादृचिदक रूप से 100 टायर चुन जाते है और उनकी औसत आयु 10500 किलोमीटर तथा प्रमाण विचलन 980 किलोमीटर परिकल्पिक किया जाते है। इस स्थिति में हम यह जान करना चाहेंगे कि निर्मित टायरों की औसत आयु तथा परिवर्तित आयु का यह अंतर निदर्शन के उच्चावचनों के कारण है या वास्तव में टायरों की किस्म में गिरावट हुई है। यदि अंतर (500 किलोमीटर) सार्थक है तो वह निदर्शन से उत्पन्न हुआ नहीं है वरन किस्म की गिरावट का परिणाम है। इसके विपरीत, यदि अंतर अर्थहीन है, तो वह निदर्शन के कारण संयोगवश ही उत्पन्न हुआ है और उसकी उपेक्षा की जा सकती है।