सहायिकी पर बहस - debate on subsidies
सहायिकी पर बहस - debate on subsidies
आजकल कृषि क्षेत्र को दी जा रही आर्थिक सहायिकी का आर्थिक औचित्य एक गरमा-गरमा बहस का मुद्दा बन गया है। इस बात से तो सभी सहमत हैं कि किसानों द्वारा और सामान्यत: छोटे किसानों द्वारा विशेष रूप से नई एच. वाई. वी. प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु सहायिकी दी जानी आवश्यक थी। किसान प्रायः किसी भी नई प्रौद्योगिकी को जोखिम पूर्ण समझते हैं। अत किसानों द्वारा नई प्रौद्योगिकी की परख के लिए सहायिकी आवश्यक थी। कुछ अर्थशास्त्रियों का मत है कि एक बार प्रौद्योगिकी का लाभ मिल जाने तथा उसके व्यापक प्रचलन के बाद सहायिकी धीरे-धीरे समाप्त कर देनी चाहिए, क्योंकि उनका उद्देश्य पूरा हो गया है। यही नहीं यद्यपि सहायिकी का ध्येय तो किसानों को लाभ पहुंचाना है, किंतु उर्वरक सहायिकी की लाभ बड़ी मात्रा में प्राय: उर्वरक उद्योग तथा अधिक समृद्धि क्षेत्र के किसानों को ही पहुंचता है।
अतः यह तर्क दिया जाता है कि उर्वरकों पर सहायिकी जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। इनसे लक्षित समूह को लाभ नहीं होता और सरकारी कोष पर अनावश्यक भारी बोझ पड़ता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि सहायता जारी रखनी चाहिए क्योंकि भारत में कृषि एक बहुत ही जोखिम भरा व्यवसाय है। भारत में अधिकांश किसान गरीब है और सहायता समाप्त करने से वे आगतों का प्रयोग नहीं कर पाएंगे। सहायता समाप्त कर देने से गरीब तथा धनी किसानों में असमानता और बढ़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सहायता का लाभ धनी किसानों को अधिक हो रहा है। समाधन सहायता को कम या समाप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी नीति बनाना है जिनसे केवल गरीब किसानों को इसका लाभ मिले 1960 के दशक के अंत तक देश में कृषि उत्पादन में वृद्धि से भारत खाद्यान्नों में आत्म निर्भर हो गया था।
यह भारत के लिए एक गौरवपूर्ण उपलब्धि रही है। इसके बावजूद इसका नकारात्मक पहलू यह रहा है कि 1990 तक भी देश भी 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में लगी थी। अर्थशास्त्री इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि जैसे-जैसे देश संपन्न होता है, सकल घेरलू उत्पाद में, कृषि के योगदान में और उस पर निर्भर जनसंख्या में पर्याप्त कमी आती है। भारत में 1950 – 1990 की अवधि में जी.डी.पी. में कृषि के योगदान में भारी कमी आई है पर कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में कमी नहीं आई है। कृषि क्षेत्र में इतनी उत्पादन वृद्धि तो न्यूनतम श्रम के प्रयोग द्वारा ही संभव थी फिर भी इस क्षेत्र में इतनी मात्रा में लोगों के लगे रहने की क्या आवश्यकता थी । हम अतिरिक्त श्रम को सेवा क्षेत्र में नही खपा पाए।
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