साझेदारों की विद्यमानता का निर्णय - Decision of Existence of Partners

 साझेदारों की विद्यमानता का निर्णय - Decision of Existence of Partners


कभी-कभी दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा सामूहिक कारोबार होते देखकर यह निर्णय करना अत्यन्त कठिन हो जाता है कि उनके बीच साझेदारी विद्यमान है या नहीं। किसी साझेदारी की विद्यमानता का निर्णय निम्न बातों के आधार पर किया जा सकता है:


1. किसी संपत्ति से होने वाले लाभ अथवा सकल आय में तथा उस संपत्ति में संयुक्त अथवा सामान्य हित रखनेवाले व्यक्तियों को साझेदार नहीं बना देता है।


2. किसी व्यक्ति द्वारा केवल किसी कारोबार के लाभ में से एक भाग की प्राप्ति अथवा ऐसे भुगतान की प्राप्ति जो लाभ कमाने पर संभावित हो अथवा जो कारोबार से पैदा किये हुए लाभ के अनुसार बदलता हो, उसे कारोबार चलाने वाले व्यक्तियों के साथ साझेदारनहीं बना देता।

निम्नलिखित परिस्थितियों में एक व्यक्ति जो कि कारोबार के लाभ में हिस्सा पाता है, साझेदार नहीं बन सकता:


i) ऋणदाता द्वारा लाभ लेना।


ii) कर्मचारी अथवा एजेन्ट द्वारा लाभ में हिस्सा पाना।


iii) मृतक साझेदार की विधवा अथवा बच्चों द्वारा लाभों में से हिस्सा प्राप्त करना।


iv) ख्याति के विक्रेता द्वारा लाभों में हिस्सा पाना।


v) संयुक्त हिन्दू परिवार की दशा में।


3. साझेदार को सहस्वामित्व से भिन्न समझना चाहिए सह स्वामित्व का अर्थ किसी वस्तु के एक से अधिक स्वामियों से है, जबकि साझेदारी का अर्थ किसी कारोबार के लाभ को एक निश्चित अनुपात में बाँटने के लिए एक से अधिक व्यक्तियों का मिलान है।


4. फर्म के प्रबंधन एवं संचान में भाग लेना साझेदारी में प्रत्येक साझेदार फर्म के प्रबंधन एवं संचालन में भाग ले सकता है।


5. प्रत्येक साझेदार फर्म का स्वामी व एजेन्ट होता है साझेदारी की सबसे प्रमुख विशेषता है कि प्रत्येक साझेदार फर्म का एजेन्ट व स्वामी दोनों ही होता है। एजेन्ट के रूप में वह अपने कार्यों से सभी शेष साझेदारों को बद्धकरता है तथा स्वामी के रूप में अन्य साझेदारों के द्वारा किये गये किसी भी कार्य से स्वयं बद्ध होता है।


6. साझेदारी का निर्माण अनुबंध से होना, स्थिति से नहीं साझेदारी का निर्माण अनुबंधसे होता है, स्थिति से नहीं


7. साझेदारी अनुबंध में समस्त आवश्यक लक्षणों का समावेश होना साझेदारी अनुबंध में एक वैधानिक अनुबंध के सभी आवश्यक लक्षण होना चाहिए। जैसे साझेदारों की स्वतंत्र सहमति, अनुबंध करने की क्षमता वैधानिक प्रतिफल, आदि।


8. फर्म की पुस्तकों एवं खातों तक पहुँच - साझेदारी में प्रत्येक साझेदार को यह अधिकार होता है वह फर्म की कोई भी पुस्तक एवं खाताबही देख सके, जाँच कर सके अथवा उसकी प्रतिलिपि ले सके। 


9. वैधानिक कारोबार साझेदारी का अनुबंध किसी वैधानिक कारोबार के लिए होना चाहिएजो राजनियम के विरूद्ध न हो।


10. साझेदारों की संख्या साझेदारों में साझेदारों की संख्या कम से कम दो तथा अधिकतम बैंकिंग व्यवसाय की दशा में 10 और दूसरे प्रकार के व्यवसाय की दशा में 20 से अधिक नहीं होना चाहिए।