शाखा बैंकिंग प्रणाली के दोष - Defects of Branch Banking System
शाखा बैंकिंग प्रणाली के दोष - Defects of Branch Banking System
(क) प्रबंध, निरीक्षण तथा नियंत्रण की कठिनाइयाँ सभी शाखाओं का प्रबंध केंद्रीय कार्यालय द्वारा होता है। विस्तृत कार्य क्षेत्र तथा विशालकाय संगठन होने के कारण इस प्रणाली में कुशल प्रबन्धन, उपयुक्त निरीक्षण तथा नियंत्रण के अभाव की अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है।
(ख) एकाधिकार को प्रोत्साहन - पूँजी का अत्यधिक केंद्रीयकरण होने से आर्थिक सत्ता थोड़े से व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो जाती है जिससे एकाधिकार की प्रवृति को अनावश्यक प्रश्रय मिलता है। इससे समाज का हानि होती है।
(ग) व्ययपूर्ण प्रणाली - शाखा बैंकिंग प्रणाली काफी खर्चीली होती है, क्योंकि प्रत्येक शाखा की स्थापना पर अलग-अलग व्यय करना पड़ता है। शाखाओं की संख्या अधिक होने पर समचय, नियंत्रण तथा निरीक्षण आदि पर भी काफी व्यय करना पड़ता है।
(घ) छोटे व्यापारियों की उपेक्षा छोटे-छोटे व्यापारियों का धन इकट्टा करके बड़े व्यापारियों को दिया जाता है, क्योंकि एक तो इन बैंकों के संगठन में बड़े व्यापारियों का महत्वपूर्ण हाथ होता है और दूसरे बड़े व्यापारियों को ऋण देना अधिक सुरक्षित तथा लाभदायक समझा जाता है।
(ङ) प्रतियोगी विकास को प्रोत्साहन प्रत्येक नगर तथा क्षेत्र में सभी प्रमुख बैंकों की अलग-अलग शाखाएं होती है जिनके बीच प्रतियोगिता की संभावना रहती है। बैंकिंग सुविधाओं का अनावश्यक दोहरापन होता है तथा छोटे बैंकों के साथ हानिकारक प्रतिस्पर्धा प्रारंभ होती है।
(च) दुर्बल शाखाएं - शाखा बैंकिंग प्रणाली में दुर्बल तथा हानिप्रद शाखाएँ भी सुदृढ़ तथा लाभदायक शाखाओं के बल पर जीवित बनी रहती है।
यह बैंकों के लिए बहुत अहितकर होता है क्योंकि यदि बैंक की कुछ शाखाओं में हानि होती है तो उसका प्रभाव समस्त शाखाओं पर पड़ता है ।
(छ) लोच एवं पहल की प्रेरणा का अभाव- शाखाओं को प्रधान कार्यालय के आदेशों का पालन करना होता है, जिसके कारण स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शाखाओं के मैनेजर स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पाते। फलस्वरूप कार्य में लोच का अभाव रहता है। चूँकि प्रत्येक कार्य कार्यालय से पूछकर करना पड़ता है, इसलिए इसमें पहल करने की प्रेरणा का अभाव पाया जाता है।
(ज) पिछड़े क्षेत्रों के विकास में बाधा- देश के सभी क्षेत्रों में शाखाएं होने के कारण छोटे तथा पिछडे स्थानों से पूँजी एकत्रित होकर बड़े-बड़े औद्योगिक तथा व्यावसायिक केंद्रों में पहुँच जाती है, क्योंकि बैंक पूँजी का निवेश वहाँ करना अधिक लाभपूर्ण समझते हैं। इससे पिछड़े क्षेत्रों का विकास नहीं हो पाता,
क्योंकि वे विकास के लिए स्वयं अपनी बचतों के प्रयोग से भी वंचित रह जाते हैं।
(झ) विदेशों में कठिनाइयाँ विदेशों में शाखाएँ स्थापित करने से अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि विदेशो में बैंकिग कानून, व्यापारिक परिस्थितियाँ तथा मौद्रिक नीतियाँ अलग-अलग होती है। विदेशों में इन शाखाओं के राष्ट्रीयकरण का भय भी सदैव बना रहता है। इस प्रकार शाखा बैंकिंग प्रणाली के अनेक गुण होते हुए भी एक सीमा के भीतर ही रहना पड़ता है क्योंकि सीमा का उल्लंघन करने में व्यापक हानियाँ होती है। शाखाओं का अंधाधुध विस्तार करने से बैंकिंग में दोष उत्पन्न होने लगते हैं।
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