नई औद्योगिक नीति के दोष - Defects of the new industrial policy

नई औद्योगिक नीति के दोष - Defects of the new industrial policy


इस नीति के मुख्य दोष निम्नलिखित है-


नई औद्योगिक नीति के गुण होते हुए भी कई अर्थशास्त्रियों तथा राजनीतिज्ञों ने इसकी आलोचना की है। श्री मधु दण्डवते के अनुसार, इस नीति ने एकाधिकारी घरानों की सीमा समाप्त कर दी है। इसके परिणामस्वरूप लघु उद्योगों को हानि उठानी पडेगी बेरोजगारी तथा निर्धनता बढ़ेगी।" श्री चंद्रशेखर ने इसकी आलोचना करते हुए कहा है, यह नीति गांधीवादी से बिल्कुल अलग है।"


1. निजी क्षेत्र को अधिक महत्व इस नीति ने निजीकरण को आवश्यकता से अधिक महत्व दे दिया है। नीति की मान्यता कि निजीकरण से कार्यकुशलता में वृद्धि होती है, वास्तविक नहीं है। मात्र निजीकरण से कार्य कुशलता मे वृद्धि नहीं होती। यह तो प्रतियोगिता से होती है।


2. सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्व - सार्वजनिक क्षेत्र के आकार को अनावश्यक रूप से संकुचित कर दिया गया। अनेक उद्योगों के निजीकरण के कारण तथा कुछ उद्योगों के बंद होने से सार्वजनिक क्षेत्र का महत्व कम हो गया। 


3. क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि इस नीति से देश में क्षेत्रीय असमानताएं भी बढ़ेगी। लाइसेंसिंग नीति के उदारवादी होने के कारण तथा कुछ उद्योगों की स्थापना पर लगे प्रतिबंध हटने से उद्यमी अब विकसित क्षेत्रों में ही नए उद्योग लगाना पसंद करेंगे।


4. आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण में वृद्धि कई आलोचकों के अनुसार, नई नीति से देश में आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति बढ़ी, क्योंकि नीति में एम.आर.टी. पी. एक्ट में संशोधन करके बड़े औद्योगिक घरानों को अपना विस्तार करने की स्वतंत्रता दे दी गई है।


5. लघु उद्योगों पर विपरीत प्रभाव नई नीति विदेशी पूंजी को आकर्षित करेगी और इसके फलस्वरूप देश में प्रतियोगिता बढ़ी किंतु देश के लघु उद्योग इस प्रतियोगिता के सामने टिक न पाएंगे। परिणामस्वरूप लघु उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।


6. बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिक महत्व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अत्यधिक स्वतन्त्रता देने से देश की आर्थिक सार्वभौमिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।


7. आर्थिक असमानताओं में वृद्धि राजनीतिक आलोचकों के अनुसार, इस नीति ने हमारी आर्थिक योजनाओं में निर्धारित सामाजिक उद्देश्यों,

जैसे- निजी क्षेत्र की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र का अधिक विस्तार, आर्थिक शक्ति के केंद्रीयकरण को रोकना, लघु उद्योगों को महत्व आदि की उपेक्षा की है। अतः इस नीति के फलस्वरूप देश में आर्थिक असमानताएं बढ़ी।


8. विदेशी निवेश को अधिक महत्व:- औद्योगिक नीति में विदेशी निवेश को अधिक महत्व दिया गया है। विदेशी पूंजी पर निर्भरता के कारण विदेशी ऋण में भी वृद्धि हो गई। नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत किए गए सुधार- 


(क) उद्योगों की ऋण सीमा में वृद्धि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग की ऋण सीमा में वृद्धि कर दी गई है। उद्योगों के लिए पहले ऋण 5 करोड़ रूपये तक दिया जाता था उसे बढ़ाकर 50 करोड़ रूपए कर दिया गया।


(ख) सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन: सार्वजनिक क्षेत्र के सुरक्षित उद्योगों की संख्या में कमी हो गई। 1999 से इनकी संख्या केवल 4 थी जो कि निम्नलिखित है (i) रेलवे परिवहन, (ii) रक्षा उत्पादन, (ii) परमाणु खनिज, (iv) परमाणु ऊर्जा अब इनकी संख्या केवल 3 रह गई है। शेष सभी उद्योग निजी क्षेत्र के अंतर्गत आते है। 


(ग) लाइसेंस की कमी सन 1999 से अनिवार्य लाइसेंसिंग केवल 6 उद्योगों के लिए कर दिया गया था। अब इनकी संख्या कम होकर 5 रह गई है। 


(घ) शुल्कों में कमी - पूजीगत वस्तुओं की लागत कम करने के लिए उत्पादन शुल्कों में कमी की गई। 


(ङ) बड़े उद्योगों का विस्तार:-बड़े उद्योगों का काफी विस्तार किया गया है, जैसे रेडीमेड कपड़े का उत्पादन केवल लघु उद्योगों के अंतर्गत होता था। अब बड़े उद्योग भी कर सकते है, परंतु उन्हें 1 करोड़ रूपए के अचल पूजी के निवेश के साथ उत्पादन 50 प्रतिशत भाग निर्यात करना होगा।


(च) निर्यात को प्रोत्साहन:-100 प्रतिशत उत्पादन का निर्यात वाली इकाइयों के लिए वित्त मंत्रालयों के पास विशेष अधिकार था। सन 1993 से यह विशेष अधिकार विकास कमीशनर को दे दिया गए, ताकि निर्यात को प्रोत्साहन मिल सके।


(छ) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन :- औद्योगिकरण के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को विशेष प्रोत्साहन दिया गया।

इसके लिए उन्हें विशेष रियायते दी गई। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि हुई। सन 1991-92 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 408 करोड़ रूपए का था जो सन 2006-07 में बढ़ कर 45098 करोड़ रूपए हो गया। इस प्रकार 1991-92 से 2006-07 तक 23204 करोड़ रूपए का विदेशी निवेश हुआ। इस अवधि के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 100 गुना वृद्धि हुई।


(ज) ब्याज दर में कमी उद्योगों को ऊंची ब्याज दर पर ऋण दिया जाता था। न्यूनतम ब्याज की दर को काफी कम कर दिया गया है।


(झ) बीमार औद्योगिक एक्ट में संशोधन 1981 के बीमार औद्योगिक कंपनी एक्ट का सन 1993 में संशोधन कर दिया गया। इसके दो मुख्य उद्देश्य थे


(i) कंपनियों की रूग्णता का आरंभ में ही ज्ञान प्राप्त करना


(ii) उपचार के उपायों को शीघ्रता से लागू करना इन दो उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक्ट में संशोधन किया गया था।


(ञ) पिछड़े इलाकों में करों में छूट-कुछ इलाके औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। ऐसे राज्यों में नए उद्योगों की स्थापना करने पर विशेष तौर पर बिजली उत्पादन करने पर 5 वर्ष तक के करों की छूट दे दी गई है।


संक्षेप में, केंद्रीय सरकार की औद्योगिक नीति का राज्य सरकारों ने भी स्वागत किया। राज्य सरकारों ने औद्योगिक नीति के विभिन्न उपायों को प्रभावपूर्ण ढंग से लागू करने का प्रयत्न किया।