अल्पाधिकार की परिभाषा , अल्पाधिकार की विशेषताएँ - Definition of Oligopoly, Characteristics of Oligopoly

अल्पाधिकार की परिभाषा , अल्पाधिकार की विशेषताएँ - Definition of Oligopoly, Characteristics of Oligopoly


अल्पाधिकार की अनेक विद्वानों ने परिभाषायें दी हैं जिनमें कुछ महत्वपूर्ण हैं-


प्रो. लेफ्टविचके अनुसार, बाजार की वे दशाएँ अल्पाधिकार कहलाती हैं, जिनमें थोड़ी संख्या में इतने से विक्रेता पाये जाते हैं कि एक सी क्रियाएँ दूसरों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।"


प्रो. स्टिगलरके शब्दों में, "अल्पाधिकार वह परिस्थिति होती है जिसमें कोई फर्म अपनी बाजार नीति कुछ निकट प्रतियोगियों के प्रत्याशित व्यवहार पर स्थापित करती है।"


अल्पाधिकार की विशेषताएँ

( Features of Oligopoly)


(1) विक्रेताओं की संख्या बहुत कम होती है इस स्थिति में विक्रेता अथवा सेवा प्रदाताओं की संख्या बहुत कम होती है। इस कम संख्या का अर्थ यह है कि प्रत्येक अत्पादक अथवा विक्रेता या सेवा प्रदाता बाजार की कुल पूर्ति का एक बहुत बड़ा भाग नियन्त्रित करता है तथा यह विक्रेता अपने क्रिया-कलापों द्वारा अन्य उसी उद्योगों के विक्रेताओं की गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।


(2) उत्पादन अथवा सेवा कार्य में लगी हुई फर्मों एक दूसरे पर बहुत अधिक मात्रा में परस्पर निर्भर हैं- बाजार की इस स्थिति में उत्पादन या सेवा कार्य में लगी हुई फर्मों एक दूसरे पर बहुत अधिक मात्रा में निर्भर रहती हैं।

अतः बाजार की इस स्थिति में एक उत्पादक अथवा सेवा प्रदाता की नीतियाँ दूसरे उत्पादक अथवा सेवा प्रदाता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, क्योंकि बाजार की इस स्थिति में विभिन्न उत्पादकों का उत्पाद निकट स्थानापन्न वस्तुएँ होती है। अतः एक उत्पादक अथवा सेवा प्रदाता की मूल्य नीतियों का अध्ययन अन्य उत्पादकों द्वारा किया जाता है तथा अन्य उत्पादक दूसरे उत्पादकों की नीतियों को विफल करने के लिए अपनी नई नीति लागू करने का प्रयास करते हैं।


( 3 ) अल्पाधिकारी फर्म का माँग वक्र अनिश्चित होता है-बाजार की इस स्थिति में एक फर्म का माँग वक्र एकदम अनिश्चित होता है, क्योंकि बाजार की इस स्थिति में प्रत्येक फर्म का व्यवहार न तो स्वतन्त्र ही रह माता है तथा न ही निश्चित होता है, क्योंकि उसका व्यवहार अन्य फर्म के आचरण पर निर्भर करता है। अतः हम फर्म के सही-सही माँग वक्र का ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते हैं।


(4) बाजार में फर्म के प्रवेश व बहिर्गमन में कठिनाई आती हैं- बाजार की इस दशा में नई फर्म के बाजार में प्रवेश लेने में पेटेन्ट राइट्स, ट्रेड मार्क्स आदि के कारण बहुत परेशानी आती है। इसी तरह से विद्यमान फर्मों द्वारा स्थाई सम्पत्तियों में अत्यधिक विनियोग के कारण वे बाजार से बाहर जाने में कठिनाई अनुभव करती हैं।


(5) प्रतियोगिता - बाजार की इस दशा में विद्यमान सभी फर्मों में आपस में कड़ी प्रतियागिता बनी रहती है ।


(6) अत्यधिक विज्ञापन तथा विक्रय संवर्द्धन लागतें बाजार की इस दशा में विज्ञापन तथा विक्रय संवर्द्धन पर बहुत अधिक धन व्यय होता है।

यदि कोई फर्म विज्ञापन तथा विक्रय संवर्द्धन पर धन व्यय करना बन्द कर दे तथा अन्य फर्मे व्यय करती रहे तो कुछ समय पश्चात् इस फर्म का हिस्सा बाजार में बहुत कम रह जायेगा। अतः जब एक फर्म विज्ञापन करती है तो दूसरी फर्मों को भी अपने बाजार भाग को बनाये रखने के लिए विज्ञापन करना पडता है।


( 7 ) प्रमाणित या विभेदात्मक वस्तुएँ तथा सेवाएँ - बाजार की इस स्थिति में फर्मे समरूप प्रमापित वस्तु का उत्पादन तथा विक्रय कर सकती हैं अथवा विभेदित वस्तु या सेवा का विक्रय कर सकती हैं। जब फर्मों समरूप वस्तु या सेवा का उत्पादन करती है तो बाजार की इस दशा को विशुद्ध अल्पाधिकार कहते हैं। इसके विपरित जब फर्मे विमेदित वस्तु का उत्पादन करती हैं तो विभेदित अल्पाधिकार कहते हैं।