अंतरराष्ट्रीय आर्थिक वातावरण के विभिन्न पक्ष - Different aspects of the international economic environment
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक वातावरण के विभिन्न पक्ष - Different aspects of the international economic environment
1 विदेशी निवेश
आधुनिक युग में, "भारत जैसे विकासशील देश में विदेशी निवेश, भारी मात्रा में आर्थिक वातावरण को प्रभावित कर रहा है। वैश्वी निवेश न कि वैश्वी व्यापार अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की चालक शक्ति है। इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी सहयोग उद्यमों, अंतर सरकारी ऋणों, अंतरराष्ट्रीय विदेशी संस्थानों तथा वाणिज्य ऋणों आदि द्वारा व्यक्त किया जाता है।
(क) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश
विदेशी निवेशकर्ता भारत में लाभ के उद्देश्य से प्रत्यक्ष रूप में निवेश करते हैं। ऐसा निवेश देश में संगठित निगर्मित क्षेत्र द्वारा किया जाता है जो भारत में स्वतंत्र कंपनी की स्थापना करके अथवा सहायक अथवा अपनी शाखा की स्थापना करके लाभ आय अर्जित करने के लक्ष्य से निवेश करता है। इसके अतिरिक्त विदेशी लोग भारतीय कंपनियों के शेयर तथा ऋण-पत्रों को खरीद कर भी प्रत्यक्ष रूप से निवेश करते हैं।
2003-04 में पूजी बाजार में विदेशी निवेशकों ने भारी मात्रा में पूजी प्रवाह, भारत तथा एशिया के अन्य पूजी बाजारों में किया है जिसे पोर्टफोलियो निवेश का नाम दिया जा रहा है। 1995 से 2015 तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की राशि औसतन 1116.82 मिलियन यूएस डालर थी जो 2008 में 5670 मिलियन डालर तक बढ़ गई और 2014 में 60 मिलियन यूएस डालर तक घट गई। यह निवेश मुख्य रूप से दूर संचार, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, आटो क्षेत्र में किया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत औद्योगिक दृष्टि से विश्व में उच्चस्तरीय सम्मान प्राप्त कर चुका है तथा प्रत्येक विदेशी निवेशक भारत की श्रम शक्ति, प्राकृतिक संसाधनों तथा तकनीकों को प्रयोग करने के लिए यहां निवेश करने के लिए तैयार है। इसके अतिरिक्त भारत में उपभोक्ता वर्ग अधिक होने के कारण, प्रत्येक वस्तु के लिए माग बड़ी मात्रा में की जाती है। विदेशी निवेशक इस पक्ष को महत्व देते हुए यहां पर भारी मात्रा में प्रत्यक्ष निवेश करना पसंद करते हैं। भारत में विदेशी निवेश का हिसाब भारतीय रीर्जव बैंक करता है।
(ख) भारत सरकार की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सम्बन्धी नीति
भारत सरकार आरंभ से ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को महत्व देती हैं। 1949 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस संबंध में अपने एक वक्तव्य में विदेशी निवेशकों को निम्न तीन आश्वासन दिए:
(i) भारत सरकार विदेशी तथा स्थानीय उद्यमों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखेगी।
(ii) विदेशी निवेशकों को उनकी पूंजी पर प्राप्त लाभों तथा लाभांशों को विदेशी निवेश में हस्तांतरित करने की अनुमति होगी।
(iii) राष्ट्रीयकरण की अवस्था में विदेशी निवेशकों को उचित क्षतिपूर्ति प्रदान की जाएगी।
इसीलिए भारत के 1948 तथा 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव विदेशी पूंजी का पक्ष लिया गया। 1971 की औद्योगिक नीति में भारत सरकार ने उन विदेशी निगमों को भारत में स्थापित होने की आज्ञा दी जो अपना शत-प्रतिशत उत्पादन विदेशों में निर्यात करेंगे। अब 100 प्रतिशत से कम निर्यात करने वाले विदेशी उद्योगों को भी देश में निवेश करने की आज्ञा दे दी गई है। औद्योगिक नीति 1991 में इंद्रिरा कांग्रेस ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए निम्न चार शर्तें रखी-
(i) उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत शेयर्ज तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी दी जाएगी। विदेशी मशीनरी तथा उपकरण मंगवाने की स्वीकृति विदेशी विनिमय अधिनियमों के आधार पर दी जाएगी।
(ii) लाभांश हस्तांतरण की रिजर्व बैंक देखभाल करेगी जिससे उद्योग विशेष के निर्यातों को ध्यान में रखा जाएगा।
(iii) निर्यात करने वाली कंपनियों को अपनी शेयर पूंजी 51 प्रतिशत तक रखने की अनुमति होगी।
(iv) उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में तकनीक हस्तांतरण की 1 करोड़ रूपए तक स्वयंचलित आज्ञा होगी।
वर्तमान उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के युग में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए नई आर्थिक नीति में विशेष सुधार किए गए जो इस प्रकार से हैं-
• विदेशी विनिमय नियमन एक्ट फेरा तथा फेमा को समाप्त कर दिया गया।
• विदेशी कंपनियों को शत प्रतिशत शेयर पूंजी रखने की आज्ञा दी गई।
• लाभांश हस्तांतरण पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण हटा दिया गया।
• 15 सितंबर 1992 के बाद विदेशी कंपनियों को स्टॉक मार्किट में अपने शेयर्ज बेचने की आज्ञा दी गई तथा वह इस पूजी को विदेशों में भेज सकते हैं।
इस समय भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बहुत तीव्रता से हस्तांतरित हो रहा है जो कि भारत को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विकास के उच्च स्तर पर लाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है
(ग) विदेशी सहयोग पर आधारित उद्यम
विदेशी सहयोग द्वारा विदेशी तथा घरेलू पूजी निवेश के संयुक्त सहयोग द्वारा महत्वपूर्ण तथा लाभदायक क्षेत्रों में उद्यम स्थापित किए जाते हैं। ऐसे उद्यम निम्न प्रकार के हो सकते हैं:
(i) निजी समूहों द्वारा संयुक्त योगदान
(ii) निजी फर्मों तथा भारत सरकार में परस्पर सहयोग
(iii) भारत सरकार तथा विदेशी सरकारों में सहयोग
आर्थिक नियोजन के आरंभ में विदेशी सहयोगी उद्यमों को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिला। 1960-70 तक 2475 विदेशी सहयोगी उद्यमों की स्वीकृति तथा 1971-80 तक 3041 ऐसे उद्यमों को और स्वीकृति दी गई। किंतु 1981-90 तक यह संख्या 7436 उद्यमों की हो गई जिनमें 1274 करोड़ रू के कुल निवेश किए जाने थे। इनमें निवेश का लगभग 25 प्रतिशत अमेरिका के सहयोग के साथ किया गया। पांच देशों-अमेरिका, पश्चिमी जर्मनी, जापान, यू.के. तथा इटली के अधिकतम सहयोगी उद्यन 63 प्रतिशत के थे।
आधारभूत वस्तु क्षेत्र में सबसे अधिक सहयोगी उद्यम उपलब्ध है। इनमें भी ऊर्जा के क्षेत्र में 156 प्रतिशत सहयोगी उद्यम स्थापित करने की स्वीकृति दी गई।
इसी प्रकार विदेशी सहयोगियों की अधिक रूचि सेवा क्षेत्र में थी जो कुल स्वीकृतियों का 371 प्रतिशत था। अभी भी दूर संचार, कंप्यूटर साफ्टवेयर, बैंकिंग तथा अन्य सेवाओं के क्षेत्र में विदेशी, भारत सरकार तथा निजी निवेशकों के साथ सहयोग के आधार पर निवेश करना बहुत पसंद करते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की आर्थिक सेहत के लिए इसे स्वास्थ्यजनक भी माना जाता हैं, इसलिए भारत सरकार इन्हें हर तरह से प्रोत्साहन प्रदान कर रही है।
(घ) अंतर सरकारी ऋण
विदेशी निवेश का तीसरा रूप अंतर-सरकारी ऋणों तथा अनुदानों का हैं। भारत में ऐसे ऋण तथा अनुदान निम्न तीन प्रकार के हैं- (i) ऋण (ii) अनुदान, (iii) बहुपक्षीय तथा द्विपक्षीय समझौते
(i) ऋण ऐसे ऋण मुख्य रूप से उत्पादकीय था, जिनका उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायता करना था।
(ii) अनुदान- भारत अब विकसित देश होने के कारण विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले देशों में नहीं शामिल किया जाना चाहिए।
(iii) बहुपक्षीय तथा द्विपक्षीय समझौते भारत सरकार ने विदेशी सरकारों से बहुपक्षीय तथा द्विपक्षीय समझौते किए हैं। कुछ विदेशी ऋण विदेशी सरकारों ने भारत से निर्यात मंगवाने के लिए किए है।
(ङ) अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से ऋण
विभिन्न देशो मे परस्पर विरोधता तथा तनाव दूर करने तथा विश्व में सहकारिता लाने के लिए दूसरे महायुद्ध के बाद कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं स्थापित की गई।
इनमें अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय विकास संस्थाएं तथा एशियन विकास बैंक आदि की स्थापना की गई। इन संस्थाओं की स्थापना में अमेरिका का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं। इन संस्थापकों को विकसित करने के निम्न उद्देश्य थे
(i) विश्व स्तर पर मौद्रिक तथा राजनैतिक एकीकरण,
(ii) अल्पविकसित देशों के विकास में सहायता प्रदान करना,
(iii) अंतरराष्ट्रीय व्यापार को उत्साहित करना,
(iv) विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की वैश्वी स्तर पर विश्वसनीयता स्थापित करना,
(v) युद्ध से जुड़े देशों को पुन स्थापित करना,
(vi) अल्पविकसित देशों के भुगतान संतुलन के घाटे को दूर करना भारत जैसे विकासशील देशों में इन संस्थाओं का बहुत योगदान रहा है। आई.डी.ए. की सहायता का लक्ष्य देश मे राष्ट्रीय मार्गों की स्थापना, उत्तर प्रदेश से ट्यूबवैल तथा हरियाणा में सिचाई के लिए नालियों का निर्माण करना था।
(च) बाहरी वाणिज्य ॠण
भारत वित्त प्राप्त करने के लिए निर्यात साख संस्थानों जैसे अमेरिकन एगजिम बैंक, जापान का एगजिम बैंक, निर्यात साख गारंटी निगम तथा संयुक्त राज्य आदि से पूंजी प्राप्त कर रहा है।
इस ऋण का उद्देश्य विदेशी व्यापार को नियमित बनाए रखना तथा प्रोत्साहित करना है। हाल में रिजर्व बैंक ने ऐसे ऋण प्राप्त करने की सीमा को बढ़ा दिया है। भारत ने विदेशी संस्थाओं तथा सरकारों से भारी मात्रा में ऋण प्राप्त किए हैं।
दूसरे महायुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने के लिए अमेरिका ने वैश्वी स्तर पर कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं स्थापित की। इनका उद्देश्य विश्व में आर्थिक तथा मौद्रिक सहयोग स्थापित करना, युद्ध से विस्थापित देशों का पुनः निर्माण तथा विश्व व्यापार को उत्साहित करना था।
इसके लिए विश्व में अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक कोष, अंतरराष्ट्रीय पुनःनिर्माण तथा विकास का बैंक आदि 1944 में स्थापित किए गए तथा अन्तर्राष्ट्रीय विकास संस्था, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहयोग आदि अल्पविकसित देशों को विकसित करने के लिए तथा वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए स्थापित किया गए।
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