पैमाने की अमितव्ययिताएँ - Diseconomies of Sale
पैमाने की अमितव्ययिताएँ - Diseconomies of Sale
उपर्युक्त अध्ययन से हमें ज्ञात होता है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन करने से हमें अनेक तरह की बचते प्राप्त होती है लेकिन यदि फर्म अपने व्यवसाय को अनुकुलतम पैमाने के पश्चात् भी बढ़ाये तो उसे आन्तरिक एवं बहि बचतों के स्थान पर अमितव्ययितायें प्राप्त होने लगेंगी, जससे फर्म के उत्पादन की लागत बढ़ जायेगी तथा अकुशलताओं में वृद्धि होगी। इसी कारण प्रत्येक फर्म अपने व्यवसाय को अनुकूलतम आकार तक ही बढ़ाना पसन्द करती है। यदि कोई फर्म अनुकूलतम आकार पश्चात् भी उत्पादन बढ़ाती है तो असे निम्न अमितव्ययिताओं का सामना करना पड़ता है।
(1) प्रबन्धकीय कठिनाइयाँ - उद्योग का आकार जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तो उसकी प्रबन्ध-व्यवस्था लडखडाने लगती है तथा निम्न बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं
1 विभागों तथा उत्पादन कियाओं में समन्वय की समस्या
2. नीति निर्धारण में वैचारिक भिन्नता की समस्या
3. लाल फीताशाही का बोलबाला
4. मालिकों तथा श्रमिकों के मध्ये दूरी बढ़ने से आपसी मनमुटाव में वृद्धि जिससे हड़ताल एवं तालाबन्दी का बोलबाला
5. प्रबन्धकीय कुशलता में कमी।
(2) आर्थिक कठिनाइयाँ- अनुकुलतम आकार के पश्चात् यदि फर्म के आकार में वृद्धि होती है तो निम्न वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है
1. प्रभावी नियन्त्रण नहीं रह पाता है।
2 ब्याज अधिक दर से चुकाना पड़ता है।
3. सरकारी नियन्त्रण बढ़ जाते हैं।
4 समाज में संस्था को शोषक के रूप में मान्यता मिल जाती है।
(3) सेविवर्गीय कठिनाइयाँ - अनुकुलतम आकार के पश्चात् भी यदि फर्म के आकार में वृद्धि की जाती है तो निम्न सेविवर्गीय कठिइयाँ आती हैं
1. श्रम सम्बन्धों में कटुता बढने लगती है।
2 परस्पर समन्वय तथा नियन्त्रण के अभाव में अकुशलता बढ़ती है।
3 हड़ताले, तालाबन्दी, काम रोको, धीरे काम करो आदि आन्दोलनों की संख्या बढ़ जाती है।
4. कर्मचारियों के निरीक्षण में बाधा आती है।
5 श्रम विभाजन का कुशल प्रयोग नहीं हो पाता है।
(4) विपणन कार्य में कठिनायें - एक सीमा के पश्चात् यदि फर्म के आकार में वृद्धि की जाती है तो निम्न विपणन बाधाओं का सामना करना पड़ता है
1. समन्वय, नियन्त्रण एवं निरीक्षण में कठिनाई आती है।
2 कट्टर प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ता है।
3 विज्ञापन व्यव में वृद्धि होती है।
4. दूर-दूर के बाजारों पर नियन्त्रण करने के लिए व्यय में वृद्धि करनी पड़ती है।
(5) सरकार द्वारा नियन्त्रण - एक सीमा से अधिक फर्म का आकार बढ़ जाने पर सरकार को एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार नियन्त्रण अधिनियम के अन्तर्गत प्रतिबन्ध लगाने पड़ते हैं।
सरकार जो छोटे उद्योग को सुविधाएँ देती है, उनसे वंचित रहना पड़ता है। कच्चे माल के कोटे में कमी आ सकती है तथा फर्म के विस्तार के लिए स्थान का अभाव हो सकता है।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि फर्म के आकार में वृद्धि उसी सीमा तक करना श्रेष्ठ है जब तक फर्म को आन्तरिक एवं बहि बचतें प्राप्त होती रहे, इस बिन्दु के पश्चात् आकार में वृद्धि नहीं करनी चाहिए क्योंकि इससे संस्था को अमितव्ययिताएँ ही प्राप्त होंगी।
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