रोजगार का प्रतिष्ठित विशेषताएँ , आलोचनाएँ - Distinguished Characteristics, Criticisms of Employment
रोजगार का प्रतिष्ठित विशेषताएँ , आलोचनाएँ - Distinguished Characteristics, Criticisms of Employment
2 वस्तुओं की पूर्ती अपनी मांग स्वयं उत्पन्न कर लेती है ।
3 अर्थव्यवस्था में मांग एवं पूर्ती स्वतः स्थापित कर लेती है । .
4 किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में सामान्य अति उत्पादन नहीं हो सकता है।
5 किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में सामान्य बेरोजगारी असंभव है ।
- 6 मजदूरी दर में कटौती द्वारा अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार प्राप्त किया जा सकता है ।
7 अर्थव्यवस्था में बचत एवं विनियोग में समानता ब्याज द्वारा स्थापित होती है
8 यह सिद्धांत दीर्घकालीन सिद्धांत है ।
9 अर्थव्यवस्था में व्याप्त अल्पकालीन बेरोजगारी को आर्थिक शक्तियों की सहायता से पूर्ण रोजगार की अवस्था में बदला जा सकता है ।
10 अर्थव्यवस्था में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति होती है ।
11 नागरिकों की मौद्रिक आय जैसे ही उन्हें प्राप्त होती हैउसे वे खर्च कर देते हैं तथ बचतों को भी शीघ्र नियोजित कर दिया जाता है।
- 12 सर्कार आर्थिक क्रियाओं में कोई हस्तक्षेप नहीं करती है ।
आलोचनाएँ
1 पूर्ति अपनी मांग स्वयं उत्पन्न कर लेती है- यह मान्यता गलत है, प्रतिष्ठित सिद्धांत यह मनकर चलता है की पूर्ति अपनी मांग स्वयं उत्पन्न कर लेती हैत्रुटिपूर्ण तथा धरना गलत वास्तव में यह क्योंकि उत्पादन के सभी साधन अपनी आय को पूर्ण रूप से उसी समय खर्च नहीं करते अव्यावहारिक है बल्कि उसका कुछ भाग बचा लेते हैं हैं। तह वर्तमान समस्त आय पूर्ती के बराबर नहीं होती है बल्कि रोजगारी को जन्म देती हैमांग की तुलना में पूर्ति अधित होती है जो बे|
2 राजकीय हस्तक्षेप सभी तरह से उचित एवं आवश्यक है यह सिद्धांत यह मानकर चलता है की सर्कार किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करती हैजबकि वर तमान समय में सरकार का प्रत्येक आर्थिक क्रिया पर नियंत्रण रहता है। इस सिद्धांत की एक मान्यता को पूरा करने के लिये भी राजकीय हस्तक्षेप जरूरी है।
यह मान्यता है कि मांग एवं पूर्ति में संतुलन बनाये रखना जरूरी है। आधुनिक युग में मांग एवं पूर्ति में संतुलन के लिये भी सरकार का हस्तक्षेप जरूरी है। सरकार राजकोषीय एवं मौद्रिक नीतियों के माध्यम से हस्तक्षेप करके मांग एवं पूर्वी में संतुलन लाती है
3 व्यवहार में पूर्ण प्रतियोगिता किसी भी अर्थव्यवस्था में नहीं पाई जाती है यह सिद्धांत पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति को मानकर चलता है जबकि व्यवहार में पूर्ण प्रतियोगिता कहीं नहीं पाई जाती है. । यह केवल काल्पनिक स्थिति है अतः यह सिद्धांत भी एक काल्पनिक महत्व ही रखता है।
4 पूर्ण रोजगार को सामान्य स्थिति मानना गलत है इस सिद्धांत में पूर्ण रोजगार को अर्थव्यवस्था की सामान्य स्थिति माना गया है जो गलत हैव्यवहार में बेरोजगारी का कुछ न कुछ मात्र अर्थव्यवस्था में र पाई जाती है तथा पूर्ण रोजगार केवल काल्पनिक स्थिति हैजरू। आज अधिकांश विकसित देशों में तो स्थायी बेरोजगारी पायी जाती है।
5 मजदूरी डर में कमी से बेरोजगारी समाप्त नहीं होती है इस सिद्धांत में यह माना गया है कि अति उत्पादन होने से बेरोजगारी उत्पन्न होती है। अतः मजदूरी की दरें कम करके उत्पादन की कीमत कम की जाती है जो अव्यावहारिक तथा कल्पना मात्र है क्योंकि वस्तुओं की कीमतें केवल मजदूरी डर पर ही निर्भर नहीं करती है।
6 बचत एवं विनियोग में साम्य ब्याज दर द्वारा नहीं होता है इस सिद्धांत में ब्याज दर द्वारा बचत एवं विनियोग में साम्य स्थापित किया जाता है जो गलत है। इस सिद्धांत के अनुसार बचत विनियोग से अधिक होने पर ब्याज दर गिरने लगती है जिससे विनियोग बढ़ता है तथा बचत घटती है और अंत में दोनों बराबर हो जाते हैं। कीन्स के अनुसार यह सब केवल कल्पना है ब्याज दर न बचत व्यवहार में, को तथा न विनियोग को प्रभावित करती है।
7 यह सिद्धांत दीर्घकालीन व्याख्या प्रस्तुत करता हैं अल्पकाल अधिक महत्वपूर्ण हैजबकि इस सिद्धांत से अल्पकाल के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं होता है । अता इस सिद्धांत का कुछ भी महत्व नहीं है
8. कोई भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था स्वचालित एवं स्वयं समायोजित नहीं होती है इस सिद्धांत की मान्यता है कि अर्थव्यवस्था आर्थिक शक्तियों के द्वारा स्वचालित एवं समायोजित होती है जो गलत है क्योंकि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कभी भी वास्तविक रूप में स्वचालित एवं सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं हो सकती है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में धनी एवं निर्धन के मध्य आय का असमान वितरण होता है। धनी के पास अधिक धन होने से वह अपनी सम्पूर्ण आय व्यय नहीं कर सकता है तथा निर्धन धन की कमी होने से धन के अभाव में व्यय करे ऐसा संभव नहीं होता हैपूंजीवादी अर्थव्यवस्था तो अति अतः उत्पादन एवं बेरोजगारी उत्पन्न करने वाली व्यवस्था है।
.9 इस सिद्धांत में मुद्रा को केवल विनिमय का माध्यम माना हैजो इसका अति संक ुचित अर्थ है - क्योंकि व्यवहार में मुद्रा केवल विनिमय का माध्यम ही नहीं हैमुद्रा संचय का बल्कि इसके अतिरिक्त, कार्य भी करती है तथा वर्तमान युग में इस कार्य का महत्व बढ़ता जा रहा है।
10 यह सिद्धांत व्यापार चक्र की व्याख्य नहीं करता है इस सिद्धांत में तो यह कहा गया है कि पूर्ती अपनी मांग स्वयं उत्पन्न कर लेती है। अतः व्यापार चक्र स्वतः ही समाप्त हो जाती हैजबकि व्यवहार में व्यापार चक्र अर्थव्यवस्था को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं।
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