डॉज फलज्ञटन तथा रिक - dodge fruition and rick

डॉज फलज्ञटन तथा रिक - dodge fruition and rick

का मत है कि विज्ञापन अनुसंधान में निम्नलिखित हैं-


(i) यह मान्यता कि विज्ञापन एक सृजनात्मक प्रक्रिया है तथा परीक्षण के द्वारा इसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। विज्ञापन अनुसंधान के द्वारा यह ज्ञात किया जा सकता है कि सृजनकर्ता की बजाय एक उत्पाद के विज्ञापन विशेष के बारे में उपभोक्ता कैसे ज्यादा जान सकते हैं? 


(ii) क्रियान्वयन मुद्दे बनाम प्रकरण की गलतफहमी विज्ञापन अनुसंधान एक विशिष्ट संदेश, न कि अनुसंधान के क्रियान्यन का परीक्षण करता है। 


(iii) अपरीक्षण योग्य का परीक्षण कोई भी परीक्षण उस समय असफल हो जाता है जब दो या अधिक विकल्पों की प्रतिक्रिया में कोई अंतर नही होता है।


(iv) तकनीक तथा जादुई नम्बरो पर जरूरत से ज्यादा विश्वास उदाहरण के लिए, एक विज्ञापन विशेष को 20 अंकों में से अंकन में 14 अंक दिये गये है। यहां प्रतिमानों को जानते हुए भी अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं जिनक समाधान की आवश्यकता होती है ताकि अंकन की विश्वसनीयता ज्ञात की जा सके।


(v) झक्की अनुसंधान तकनीकों का प्रयोग करने की प्रकृति एक अनुसंधानकर्ता प्रायः विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान तकनीक को अपनाने के स्थान पर ऐसी तकनीक अपनाता है जो दूसरे लोग अपना रहे है।


(vi) यह मान्यता देने की असफलता कि विज्ञापन अनुसंधान विपणन अनुसंधान के अन्य हिस्सों से अलग नहीं है। विज्ञापन अनुसंधान उपभोक्ताओं के लिए विपणन योग्यता प्रस्ताव के सृजन का सम्पूर्ण कार्य करता है और इस प्रकार विपणन अनुसंधान का एक प्रमुख हिस्सा होता है। ब्रायड बेस्ट फाल तथा स्टाएच का मत है कि विपणन के अन्य क्षेत्र की बजाय विज्ञापन अनुसंधान पर सर्वाधिक व्यय किया जाता है। यह मुख्यतः तीन प्रकार का होता है -


प्रथम विज्ञापन के उद्देश्यों के निर्धारण से संबंधित है। प्रत्येक व्यक्ति विक्रय या लाभ के रूप में अपनी अदायगी को देखना चाहता है, लेकिन यह अप्रबंधित दशाओं को छोड़कर मापना अत्यधिक जटिल है।

चूंकि विज्ञापन अन्य विपणन अदायों के साथ-साथ अनियंत्रित घरों के साथ ही अन्तः क्रिया करता है, अतः यह मापना जटिल नहीं होता है कि इसका क्या प्रभाव हुआ है। द्वितीय प्रकार विज्ञापन के संदेश से संबंधित है। विज्ञापन का संदेश किस प्रकार प्रस्तुत किया जाना चाहिए. किस प्रतिलिपि का प्रयोग किया जाना चाहिए उसके शीर्षक क्या हो क्या चित्र हो, आदि व्यवहारवादी वैज्ञानिको के द्वारा अनेक अवधारणाओं का विकास किया गया है जो विज्ञापन प्रति तैयार करने में सहायक हो सकते हैं। तृतीय अनुसंधान विज्ञापन हेतु उपयुक्त माध्यम के चयन से संबंधित है जिसमें यह तय करना होता है कि विज्ञापन हेतु रेडियो, टेलीवीजन आदि का प्रयोग किया जाये या अन्य साधनो का ? विज्ञापन कार्यक्रम क्या हो. किस दिन तथा कितनी बार विज्ञापन किया जाये आदि इस प्रकार विज्ञापन अनुसंधान उद्देश्यों के निर्धारण, विज्ञापन संदेश तथा उपयुक्त माध्यम के चयन के संबंध में किये जाने वाले अनुसंधान से संबंधित है।


एडमंड फैसन का मत है कि विज्ञापन कार्यक्रम के विकास में विभिन्न अवस्थाओं पर अनुसंधान किया जा सकता है। इन अवस्थाओं को निम्न रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है।


(i) विज्ञापन व्यूहरचना अनुसंधान


(ii) रफ उत्पादन पूर्व परीक्षण


(iii) माध्यम मूल्यांकन


(iv) विज्ञापन पश्चात् परीक्षण


(v) कार्यक्रम मूल्याकन ।


रिचर्ड डी क्रिस्प ने विज्ञापन अनुसंधान क्षेत्र में निम्नलिखित को सम्मिलित किया है-


(i) विज्ञापन प्रभावशीलता का मूल्यांकन


(ii) प्रतिस्पर्धी विज्ञापन और विक्रय परम्पराओं का विश्लेषण


(iii) विज्ञापन माध्यम का चयन


(iv) अभिप्रेरण या परिणात्मक अध्ययन करना।


चिसनाल के अनुसार, विज्ञापन अनुसंधान, संदेशावाहन तथा प्रोत्साहन पद्धति के रूप में, विज्ञापन के उद्देश्यात्मक मूल्यांकन से संबंधित हैं।

यह अध्ययन परिणामात्मक तथा गुणात्मक दोनों पहलुओं को सम्मिलित करता है और मुख्त तीन शीर्षकों के अंतर्गत इसका अध्ययन किया जा सकता है-


(i) विज्ञापन अनुसंधान


(ii) विज्ञापन माध्यम अनुसंधान, तथा


(iii) विज्ञापन प्रभावशीलता अनुसंधान


प्रभावी अनुसंधान के साथ ही विज्ञापन नियोजन का कार्य प्रारंभ होता है ये अनुसंधान परिणाम प्रबंध की व्यूहरचना निर्णयों की अनुमति देते हैं। जो बाद में चातुर्यपूर्ण रुप परिवर्तित की जाती है, जैसे बजटिंग प्रतिलिपि लेखन अनुसूचियन आदि अन्त में विज्ञापन प्रभावोत्पादकता को मापने के लिए एक प्रतिपुष्टि यंत्र होना चाहिए।