पैमाने की मितव्ययिताएँ एवं अमितव्ययिताएँ - Economics and Diseconomies of Scale
पैमाने की मितव्ययिताएँ एवं अमितव्ययिताएँ - Economics and Diseconomies of Scale
जब कोई व्यावसायिक संस्था अपना उत्पादन अथवा कय-विक्रय बड़े पैमाने पर करती है, तो उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करने के कारण अनेक तरह की आन्तरिक एवं बाह्य बचते प्राप्त होती है। अतः उस संस्था की प्रति इकाई उत्पादन लागत अन्य छोटी फर्मों की तुलना में कम आती है इसी कारण से कम से कम लागत पर अधिक से अधिक उत्पादन करने के लिए संस्था अपने कारोबार का आकार तब तक बढ़ाती जाती है जब तक कि संस्था का कारोबार अनुकुलतम आकार का नहीं हो जाता है। व्यवसाय अथवा फर्म की प्रति इकाई लागत न्यूनतम होती है तथा उत्पादन अधिकतम होता है। यदि संस्था इस अनुकुलतम आकार के बाद भी अपने कारोबार को बढ़ाती है, तो उसकी प्रति इकाई लागत बढ़ने लगती है, क्योंकि संस्था के यहाँ कई तरह की अमितव्ययिताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे वित्तीय प्रबन्धकीय, श्रम एवं विपणन सम्बन्धी कठिनाइयाँ इस अध्याय में हम, व्यवसायी को जो पैमाने की मितव्ययिताएँ एवं अमितव्ययिताएँ प्राप्त होती हैं, उनका विस्तार से अध्ययन करेंगे।
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