भारत में औद्योगिक बीमारी को रोकने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयत्न - Efforts made by the government to prevent industrial disease in India

भारत में औद्योगिक बीमारी को रोकने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयत्न - Efforts made by the government to prevent industrial disease in India


सरकार ने औद्योगिक बीमारी को रोकने के लिए निम्न उपाय या प्रयत्न किए हैं-


(क) औद्योगिक बीमारी का अनुमान सरकार औद्योगिक बीमारी का अनुमान कई तरह से लगाती है। जैसे उद्योग, कर्मचारियों की भविष्य निधि में समय पर अपना हिस्सा जमा करवाते हैं या नहीं, उद्योगों द्वारा बैंकों के ऋणों की किस्तें दी जाती हैं या नहीं, तैयार माल की बिक्री का ना होना, उत्पादन क्षमता का उचित उपयोग ना करना आदि।


(ख) सुदृढ़ इकाइयों के साथ विलय सरकार बीमार इकाइयों को दोबारा आरंभ करना चाहती है। इसलिए बीमार इकाइयों को सृदृढ इकाइयों के साथ मिलाने का प्रयत्न करती है। आवश्यकतानुसार सरकार इन्हें रियायतें भी दे देती है।


(ग) सस्ते ऋण वित्तीय संस्थाएं जैसे भारतीय वित्त निगम, भारतीय औद्योगिक विकास बैंक तथा भारतीय औद्योगिक साख व निवेश निगम लिमिटेड द्वारा बीमार उद्योगों को प्रदान किए जाते हैं, ताकि बीमार उद्योग सुदृढ़ हो सकें।


(घ) बैंकिंग सुविधाए बैंको द्वारा बीमार उद्योगो को सुदृढ़ बनाने के लिए तथा आधुनिकीकरण करने के लिए ऋणों के रूप में सहायता दी जाती है। इसके लिए कम ब्याज पर तथा आसान किश्तों में भुगतान इत्यादि अनेक प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। 


(ङ) औद्योगिक पुनर्निर्माण निगम इसकी स्थापना 1971 में की गई। उसका मुख्य बंद कारखानों का पुनर्निर्माण करना था। 1997 में इसका नाम बदल दिया गया। इसके स्थान पर इसका नाम भारतीय औद्योगिक निवेश बैक रख दिया गया।


(च) कोषों की स्थापना:- पुरानी मशीनों तथा पुरानी तकनीकों का प्रयोग करने से औद्योगिक इकाइयां बीमार हो जाती हैं। इन इकाइयों का आधुनिकीकरण आवश्यक है इसके लिए इन्हें धन की पर्याप्त मात्रा में आवश्यकता रहती है। सरकार ने इसके लिए विभिन्न कोषों जैसे जूट आधुनिकीकरण कोष की स्थापना की है। 


(छ) एक खिडकी प्रणाली- इसका अर्थ है कि लघु उद्योगों को अपनी ऋण की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए केवल एक अधिकारी से संपर्क करना पड़ता है। इस प्रणाली का आरंभ लघु उद्योगों की बीमार इकाइयों को ऋण देने तथा उन्हें सुदृढ बनाने के लिए किया गया।


(ज) बीमार औद्योगिक कंपनी एक्ट 1985 में बीमार औद्योगिक कंपनी एक्ट बनाया गया। बीमार उद्योगों की समस्याओं का समाधान करने के लिए औद्योगिक तथा वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड यह निर्णय कर ले कि कोई औद्योगिक इकाई कानूनी तौर पर बीमार है तो उसे ठीक करने के लिए विभिन्न कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे (i) पूर्ण इकाई को किराये पर देना, (ii) कुछ भाग को बेच देना, (iii) सुदृढ कंपनी के साथ मिला देना, (iv) इकाई के प्रबंध का परिवर्तन करना, (v) आवश्यकता पड़ने पर इकाई को बंद करना, (vi) सस्ती वित्तीय सहायता देना इत्यादि । 


(झ) भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक:- इस बैंक की स्थापना लघु उद्योगों की साख की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए की गई। इस बैंक द्वारा लघु क्षेत्रों की बीमार इकाइयों को उचित समय पर उचित मात्रा में ऋण की सुविधाएं दी जाती है।


(ञ) बीमार इकाइयों का राष्ट्रीयकरण:- सरकार ने 1951 में औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम पास किया। इसके अनुसार सरकार बैंको तथा विभिन्न संस्थाओं से बीमार इकाइयों को ऋण सुविधाएं प्रदान करवाती है। इन बीमार इकाइयों को सुचारू रूप से चलाने का प्रयत्न किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर सरकार इनका राष्ट्रीयकरण कर देती है। अर्थात इनका प्रबंध तथा संचालन स्वयं करती है।


(ट) एन.सी.एल.टी. की स्थापना- बीमार औद्योगिक कंपनी एक्ट तथा औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड के स्थान पर एन.सी.एल.टी. की स्थापना की गई हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बीमार इकाइयों को पुनः स्थापित करने की बजाय उसे समाप्त करना है। आज के विश्वीकरण के युग में बीमार इकाइयों को समाप्त करने पर अधिक बल दिया जा रहा है।