प्रयोगात्मक अनुसंधान डिजाइन - experimental research design

प्रयोगात्मक अनुसंधान डिजाइन - experimental research design


प्रयोगात्मक अनुसंधान डिजाइन - यह अनुसंधान प्ररचना का यह प्रारूप है जिसमें किसी समस्या के कारण प्रभाव संबंधों को जानने का प्रयास किया जाता है। इसके अंतर्गत नियन्त्रित दशाओं में निरीक्षण परीक्षण द्वारा विपणन समस्याओं का अध्ययन करने हेतु अनुसंधान प्ररचना बनायी जाती हैं। लक, वाल्स टेलर तथा रुबिन के अनुसार, "एक प्रयोग को वास्तविक अध्ययन या अन्य परिकल्पनाओं की वास्तविक परीक्षा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है ताकि इसके प्रभाव को उद्देश्यपूर्ण रूप से मापा जा सके तथा बाह्र तत्वों के प्रभाव को अलग से पहचाना जा सके। सार रूप में "नियंत्रण दशाओं में निरीक्षण-परीक्षण के द्वारा विपणन समस्याओं का व्यवस्थित अध्ययन करने की रूपरेखा को "प्रयोगात्मक अनुसंधान परचना कहते हैं। जब पैऑफ पर प्रभावों को विश्वसनीय रूप से अलग रखा जा सकता है तो प्रयोगात्मक अनुसंधान प्ररचना का प्रयोग किया जा सकता है।"

उदाहरण के लिए औषधी विज्ञान में एक प्रयोग यह जानने के लिए किया गया था कि प्रस्तावित दवाई एटावीन (परिकल्पना) के प्रयोग से मलेरिया के कीटाणुओं को नाश होता है या नही इसके लिए अनुसंधानकर्ता ने अपनी प्रयोगात्मक अनुसंधान प्ररचना बनी इस परचना के अनुसार मलेरिया से पीड़ित व्यक्तियों को दो पृथक-पृथक समूहों में विभाजित किया, जिसमे एक समूह के रोगियों को एटावीन नामक दवा दी गयी (परीक्षण समूह) और दूसरे समूह को (नियंत्रण समूह) को कोई भी दवा नहीं दी गई। पुनः दोनों समूहों के रोगियों की तुलना करने पर ज्ञात हुआ कि जिस समूह के रोगियों को दवा दी गयी थी, वे दूसरे समूह की अपेक्षा शीघ्र रोगमुक्त हो गये। यहां तर्क तथा प्रयोग दोनों के द्वारा हमारी परिकल्पना सिद्ध होती है।


मन्डेल तथा रोजनबर्ग ने प्रयोगात्मक अनुसंधान पद्धति का अप्र मॉडल प्रस्तुत किया है प्रदर्शित रेखाचित्र से स्पष्ट है कि इसमें सभी दृष्टि से प्राय समान विशेषताओं वाले दो समूह चुने जाते हैं जिनमें से एक समूह नियंत्रण समूह' तथा दूसरा परीक्षण समूह कहलाता है। नियंत्रण समूह में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं लाया जाता है,

जबकि प्रयोगयात्मक समूह में किसी एक कारक के द्वारा परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है।


मन्डेल तथा रोजनबर्ग का मत है कि विपणन अनुसंधान में इस पद्धति का सरलता से प्रयोग नहीं किया जाता है। इसका प्रमुख कारण है प्रयोगों के विकास का खर्च द्वितीय, कई विपणन कारकों की उपस्थिति उदाहरण के लिए एक फर्म मूल्य बढ़ाने के बाद 8 मास में इसका प्रभाव जानने का इच्छुक है। चूँकि मूल्य अन्य प्रभावत्पदकता स्थानीय नागरिकों की क्रय क्षमता में परिवर्तन राष्ट्रीय स्तर पर फैशन की प्रकृति, संस्था की सामान्य छवि आदि पर भी निर्भर है अतः यहां प्रयोग की संरचना में इनमें से किसी एक कारक का प्रभाव जानना अत्याधिक कठिन है फिर भी प्रयोगात्मक पद्धति ही एक ऐसी व्यवस्था है जिसके द्वारा किसी विपणन समस्या का कारण प्रभाव सबंध स्थापित किया जा सकता है। यद्यपि विपणनकर्ता द्वारा इसका गहन प्रयोग नहीं किया जाता है, फिर भी इसके स्पष्ट प्रमाण है कि इसमें परिवर्तन हो रहा है। उल्लेखनीय है कि पाइट तथा स्काट पेपर' जैसी प्रसिद्ध व्यावसायिक संस्थाए अपने विज्ञापन कार्यक्रम की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने में प्रयोगात्मक पद्धति पर बड़े पैमाने पर विश्वास करती है। प्राय प्रयोगात्मक पद्धति का व्यापक प्रयोग बाजार परीक्षण में किया जाता है।


प्रमुख प्रकारों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है-


(i) पश्चात प्रयोग इसमें समान गुणों वाले दो समूह लिये जाते है एक समूह ज्यों का त्यों रहने दिया जाता है तथा उसमे परिवर्तन लाने का प्रयास नही किया जाता है। इसे नियन्त्रित समूह कहा जाता है। दूसरा समूह प्रयोगात्मक समूह होता है जिसमे किसी कारक या चर के प्रभाव में परिवर्तन का प्रयास किया जाता है। यदि प्रयोगात्मक समूह मे नियन्त्रित समूह की तुलना में अधिक परिवर्तन आता है तो इसका कारण वह कारक या चर होता है जिसके द्वारा परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है। 


(ii) पूर्व-पश्चात प्रयोग इस परीक्षण में केवल एक ही समूह लिया जाता है तथा नियन्त्रित समूह को ही नहीं लिया जाता है। इस समूह का पहले किसी तथ्य संकलन की विधि से अध्ययन किया जाता है

तथा उसकी वस्तुस्थिति ज्ञात कर ली जाती है। तत्पश्चात् उस समूह में नवीन कारक या कारकों का प्रभाव डालकर परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है। कुछ समय बाद उस समूह का उसी तथ्य संकलन विधि से पुनः अध्ययन किया जाता है। दोनों अध्ययनों की तुलना की जाती है। यदि अंतर आता है तो उसे नवीन कारक का परिणाम मान लिया जाता है।


(iii) कार्यान्तर तथ्य प्रयोग इस परीक्षण के द्वारा भूतकाल से संबंधित या किसी ऐतिहासिक घटना का अध्ययन किया जाता है भूतकाल की घटना को दोबारा दोहराना संभव नहीं होता है जब किसी संगठन में कोई विपणन घटना पहले कर चुकी है तो उसके कारणों एवं प्रभावों का पता लगाने के लिए कार्यान्तर तथ्य प्रयोग विधि का प्रयोग किया जाता है।


राबर्ट फरबर के अनुसार, "अनुसंधान प्ररचना में निम्न चरण सम्मिलित होते है।"


1. समस्या को परिभापित करना


2. विद्यमान सूचनाओं का प्रयोग एवं मूल्यांकन


3. अतिरिक्त सूचनाओं का मूल्य निर्धारित करना


4 अनुसंधान व्यूहरचना नियोजन


5. समक संश्लेषण एवं समक संग्रहण के लिए नियोजन


लक, वाल्स, टेलर तथा रुबिन का मत है कि अनुसंधान का कार्य बेहतर तरीके से तभी पूरा हो सकता है जबकि चरणों का निर्धारण पहले से ही निर्धारित कर लिया जाता है। ऐसी प्ररचना सुव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है तथा यह निश्चित करने में सहायता करती है कि सभी आवश्यक कदम उचित रूप में पूरे किये गये है। इनका मत है कि निम्न प्रकार की नियोजन क्रमबद्धता किसी भी अनुसंधान परियोजना के कुशल संचालन में सहायक होती है।